नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की फरीदपुर विधानसभा सीट पर समाजवादी राजनीति का माहौल गर्म होने लगा है। आगामी चुनाव को देखते हुए टिकट की दौड़ तेज हो चुकी है और अलग-अलग दावेदार अपनी सक्रियता दिखाने में जुट गए हैं। इसी बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का साफ संदेश सामने आया है कि पार्टी उसी व्यक्ति को उम्मीदवार बनाएगी जिसकी जनता में साफ-सुथरी छवि हो, जिसने क्षेत्र में लगातार जनता की सेवा की हो और संगठन के निर्देशों का ईमानदारी से पालन किया हो। पार्टी का यह भी कहना है कि अन्य दलों की तरह समाजवादी पार्टी में टिकट के बदले धन नहीं लिया जाता, बल्कि जमीनी काम और जनसमर्थन को प्राथमिकता दी जाती है। इस बयान के बाद फरीदपुर सीट की सियासत और ज्यादा दिलचस्प हो गई है, क्योंकि अब चर्चा सिर्फ दावेदारी की नहीं बल्कि काम और छवि की होने लगी है। इनमें तीन चेहरे प्रमुख रूप से सामने आ रहे हैं।
फिलहाल इस सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट के लिए जिन नामों की चर्चा सबसे ज्यादा है उनमें चन्द्रसेन सागर, विजयपाल सिंह और शालिनी सिंह प्रमुख बताए जा रहे हैं। तीनों नेता सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय दिखाई दे रहे हैं और अपने-अपने समर्थकों के साथ क्षेत्रीय कार्यक्रमों, जनसंपर्क और बैठकों की तस्वीरें साझा कर रहे हैं। हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टिकट की दौड़ में सिर्फ यही तीन नाम अंतिम नहीं हैं, बल्कि संगठन के भीतर या क्षेत्र में सक्रिय कोई और चेहरा भी अचानक मजबूत दावेदार बन सकता है। समाजवादी पार्टी की परंपरा रही है कि अंतिम फैसला संगठन की रिपोर्ट, जमीनी फीडबैक और जीत की संभावना देखकर ही लिया जाता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि इन सभी दावेदारों में जनता के बीच सबसे साफ छवि किसकी है। निश्चित तौर पर चंद्रसेन सागर और शालिनी सिंह की छवि विजयपाल सिंह की तुलना में कहीं बेहतर है। हालांकि शालिनी सिंह ने पिछले विधानसभा चुनाव में सपा की हार में मुख्य भूमिका निभाई थी। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा हो रही है कि सिर्फ पोस्टर, बैनर या सोशल मीडिया की सक्रियता से टिकट तय नहीं होगा, बल्कि जनता के बीच वर्षों से किए गए काम और भरोसे को देखा जाएगा। पार्टी कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिस नेता पर जनता को ईमानदारी का भरोसा हो, जिसने क्षेत्र में लोगों की समस्याओं को उठाया हो और जिसने कभी जनता के साथ अन्याय या आर्थिक शोषण का आरोप न झेला हो, वही वास्तविक दावेदार माना जाएगा। इसी कारण अब स्थानीय पंचायतों, चौपालों और सामाजिक बैठकों में भी यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बन गया है।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक संगठन ने यह भी संकेत दिया है कि PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत करने के लिए क्षेत्र में पंचायतें और चौपाल आयोजित करने वाले नेताओं को प्राथमिकता मिल सकती है। ऐसे में यह भी देखा जा रहा है कि किस उम्मीदवार ने वास्तव में कितनी PDA पंचायतें की हैं, कितने गांवों में जाकर बैठकें की हैं और किसने बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय किया है। चुनावी राजनीति में बूथ प्रबंधन सबसे अहम माना जाता है, इसलिए यह भी जांच का विषय बन गया है कि किस नेता ने कितने बूथ लेवल एजेंट यानी BLA नियुक्त किए हैं और संगठन को जमीन पर कितना मजबूत किया है।
इसी के साथ एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि चुनाव आयोग से जुड़ी व्यवस्थाओं और मतदाता सूची की समीक्षा जैसे कार्यों में किस दावेदार ने खुद जाकर बूथों पर स्थिति देखी है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जो नेता सिर्फ चुनाव के समय दिखाई देता है और जो नेता लगातार क्षेत्र में घूमकर मतदाता सूची, बूथ व्यवस्था और स्थानीय समस्याओं पर काम करता है, दोनों की छवि में जमीन-आसमान का फर्क होता है। समाजवादी पार्टी इस बार ऐसे उम्मीदवार की तलाश में बताई जा रही है जो सिर्फ चुनाव लड़ने वाला चेहरा न होकर संगठन को लंबे समय तक मजबूत करने वाला नेता भी हो।
फरीदपुर क्षेत्र के कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का कहना है कि पार्टी नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि टिकट उसी को मिलेगा जिसने पार्टी के सभी निर्देशों का पालन किया हो, हर आंदोलन और कार्यक्रम में हिस्सा लिया हो और अपने काम के फोटो या साक्ष्य भी प्रस्तुत कर सके। यानी सिर्फ दावेदारी जताने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीन पर किए गए काम का रिकॉर्ड भी दिखाना होगा। इस वजह से टिकट चाहने वाले नेताओं के बीच अब अपनी सक्रियता साबित करने की होड़ तेज हो गई है। कई नेता पुराने कार्यक्रमों की तस्वीरें और जनसंपर्क के वीडियो फिर से साझा कर रहे हैं ताकि संगठन तक अपनी मेहनत का संदेश पहुंचा सकें।
राजनीतिक माहौल को देखकर यह भी साफ है कि फरीदपुर सीट पर मुकाबला आसान नहीं होने वाला। क्षेत्र की सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण और पिछले चुनावों का अनुभव बताते हैं कि जीत के लिए सिर्फ पार्टी का नाम काफी नहीं होता, बल्कि मजबूत स्थानीय चेहरा जरूरी होता है। यही कारण है कि समाजवादी पार्टी इस बार उम्मीदवार चयन में ज्यादा सतर्क दिखाई दे रही है। पार्टी चाहती है कि ऐसा चेहरा सामने आए जो न केवल चुनाव जीत सके बल्कि लंबे समय तक क्षेत्र में पार्टी का जनाधार भी बढ़ा सके।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि पार्टी वास्तव में साफ छवि, ईमानदारी और जनता की सेवा को आधार बनाकर टिकट देती है तो इससे संगठन को बड़ा फायदा मिल सकता है। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बढ़ेगा और जनता के बीच सकारात्मक संदेश जाएगा कि पार्टी में मेहनत और सेवा का सम्मान होता है। फिलहाल सभी दावेदार अपने-अपने स्तर पर सक्रिय हैं, लेकिन अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व के हाथ में है। आने वाले समय में संगठन की रिपोर्ट, कार्यकर्ताओं की राय और जनता का फीडबैक तय करेगा कि फरीदपुर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार कौन होगा।
स्पष्ट है कि इस बार टिकट की लड़ाई सिर्फ नामों की नहीं बल्कि छवि, सेवा, संगठन और जमीनी ताकत की परीक्षा बन चुकी है। यही वजह है कि पूरे क्षेत्र की निगाहें अब समाजवादी पार्टी के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं, जो आने वाले चुनाव की दिशा भी तय करेगा और फरीदपुर की सियासत का नया समीकरण भी।

फरीदपुर विधानसभा सीट : उम्मीदवार नहीं, राजनीतिक भरोसे की तलाश, पीडीए पंचायत, बीएलए नियुक्ति और एसआईआर बनेंगे उम्मीदवारी के आधार, जानिए व्यक्तिगत छवि, जनाधार और संगठन को मजबूत करने में विजयपाल सिंह, शालिनी सिंह और चंद्रसेन सागर में कौन है सबसे आगे?




