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पूर्व पीएम से लेकर कई पूर्व मुख्यमंत्रियों तक की पसंद रहे नवाब मुजाहिद, चंद्रशेखर, शीला दीक्षित, एनडी तिवारी, दिग्विजय सिंह, अनवारा तैमूर और गुलाम नबी आजाद जैसे नेता आ चुके हैं नवाब मुजाहिद के आवास पर, अब सपा-कांग्रेस गठबंधन में चर्चा के केंद्र में नवाब मुजाहिद, पढ़ें क्या कहती है कैंट की सियासत?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे हैं जो सिर्फ चुनाव नहीं लड़ते, बल्कि अपने व्यक्तित्व, रिश्तों और सामाजिक पकड़ के दम पर पूरी राजनीतिक संस्कृति को प्रभावित करते हैं। बरेली कैंट विधानसभा सीट की बात करें तो ऐसा ही एक नाम है नवाब मुजाहिद हसन खां। बरेली की राजनीति में नवाब मुजाहिद हसन खां की पहचान केवल एक नेता की नहीं, बल्कि कांग्रेस की उस परंपरा के प्रतिनिधि के रूप में होती रही है, जहां रिश्ते सिर्फ वोट तक सीमित नहीं रहते बल्कि राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव का स्थायी आधार बन जाते हैं।
बरेली के पुराने राजनीतिक गलियारों में आज भी यह चर्चा आम है कि अगर कांग्रेस का कोई बड़ा नेता शहर आता था तो उसका ठिकाना नवाब मुजाहिद हसन खां का आवास जरूर होता था। उनके यहां आने वालों की सूची सिर्फ स्थानीय नेताओं तक सीमित नहीं रही। देश की राजनीति के कई बड़े नाम उनके घर की चौखट तक पहुंचे। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से लेकर दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी और हरीश रावत, असम की पूर्व सीएम अनवारा तैमूर जैसे दिग्गज नेताओं का उनके आवास पर आना-जाना रहा है। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर और रीता बहुगुणा जोशी भी उनके राजनीतिक और सामाजिक दायरे का हिस्सा रहे हैं।
राजनीति में समय के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। चेहरे बदलते हैं, समीकरण बदलते हैं और कई बार नेताओं का प्रभाव भी खत्म हो जाता है। लेकिन नवाब मुजाहिद हसन खां उन चुनिंदा नेताओं में गिने जाते हैं जिनकी राजनीतिक सक्रियता और प्रभाव आज भी बरकरार है। हाल ही में बरेली दौरे पर आए कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का उनके आवास पर पहुंचना इस बात का संकेत माना गया कि कांग्रेस के भीतर आज भी नवाब साहब का राजनीतिक महत्व कम नहीं हुआ है।
बरेली की राजनीति में मुस्लिम चेहरों की कभी कमी नहीं रही, लेकिन राजनीतिक जानकार मानते हैं कि वर्तमान समय में नवाब मुजाहिद हसन खां जैसा व्यापक स्वीकार्यता वाला मुस्लिम चेहरा शायद ही कोई दूसरा हो। इसकी सबसे बड़ी वजह सिर्फ उनका राजनीतिक अनुभव नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक शैली भी है। उन्हें जानने वाले लोग कहते हैं कि वह राजनीति में रहकर भी आम आदमी से जुड़े हुए नेता हैं। उनके यहां गरीब और अमीर, हिन्दू और मुस्लिम के बीच कोई भेदभाव नहीं देखा जाता। उनके आवास के दरवाजे हर वर्ग के लोगों के लिए खुले रहते हैं। यही वजह है कि उनकी छवि सिर्फ मुस्लिम नेता की नहीं बल्कि सर्वसमाज के नेता की बन चुकी है।


बरेली कैंट विधानसभा सीट पर इस बार समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के संभावित गठबंधन ने राजनीतिक हलचल और बढ़ा दी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव पहले ही संकेत दे चुके हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा जाएगा। ऐसे में बरेली कैंट सीट पर नवाब मुजाहिद हसन खां की दावेदारी स्वाभाविक रूप से मजबूत मानी जा रही है।
दरअसल, इस सीट की राजनीति को समझे बिना नवाब मुजाहिद की ताकत को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। बरेली कैंट विधानसभा सीट पर हिन्दू मतदाताओं की संख्या निर्णायक लगभग 1 लाख 70 हजार है जबकि मुस्लिम 1 लाख 13 हजार हैं। आमतौर पर यह धारणा रही है कि समाजवादी पार्टी का मुस्लिम उम्मीदवार हिन्दू क्षेत्रों में उतनी सहज स्वीकार्यता नहीं बना पाता जितनी कांग्रेस उम्मीदवार। भाजपा ने वर्षों तक इसी धारणा को मजबूत करने की कोशिश भी की है कि सपा केवल यादव और मुस्लिम राजनीति तक सीमित पार्टी है। लेकिन कांग्रेस के साथ गठबंधन इस मानसिकता को काफी हद तक बदल देता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का नाम जुड़ते ही मुस्लिम उम्मीदवार की छवि केवल एक समुदाय के नेता तक सीमित नहीं रह जाती। अगर उम्मीदवार मजबूत हो और उसका सामाजिक व्यवहार संतुलित हो तो हिन्दू मतदाता भी उसे स्वीकार करने में संकोच नहीं करता। बरेली कैंट सीट पर वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव इसका बड़ा उदाहरण माना जाता है।
वर्ष 2017 में जब नवाब मुजाहिद हसन खां सपा-कांग्रेस गठबंधन प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे थे, तब उन्हें सुभाष नगर और मढ़ीनाथ जैसे हिन्दू बाहुल्य इलाकों से भी उल्लेखनीय समर्थन मिला था। यह परिणाम सिर्फ चुनावी आंकड़ा नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि कांग्रेस के साथ आने पर मुस्लिम उम्मीदवार की स्वीकार्यता का दायरा बढ़ जाता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नवाब मुजाहिद की व्यक्तिगत छवि ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई थी।
नवाब मुजाहिद की राजनीति की एक और बड़ी ताकत उनका सामाजिक और पारिवारिक प्रभाव माना जाता है। वह नवाबों के खानदान से आते हैं और बरेली के मुस्लिम समाज में उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है। चुनावों में मुस्लिम वोटों का बंटवारा अक्सर विपक्षी दलों के लिए चुनौती बनता है, कई मुस्लिम निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनावी मैदान उतरवाए जाते हैं और वो मुस्लिम चेहरे भी विपरीत परिस्थितियों में भी कम से कम तीन-चार हजार मुस्लिम वोटों का नुकसान कर देते हैं लेकिन नवाब मुजाहिद जैसे चेहरे उस बिखराव को रोकने की पूरी क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि गठबंधन की राजनीति में उनकी उपयोगिता और बढ़ जाती है क्योंकि समाजवादी पार्टी के पास फिलहाल ऐसा कोई नेता नहीं है।
राजनीतिक गलियारों में आज भी 2017 के चुनाव को लेकर चर्चाएं होती हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि अगर उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर इतनी मजबूत न होती और मतगणना के दौरान परिस्थितियां अलग होतीं तो नवाब मुजाहिद हसन खां शायद विधानसभा पहुंच चुके होते। हालांकि चुनावी राजनीति संभावनाओं से नहीं, परिणामों से तय होती है, लेकिन इतना जरूर है कि उस चुनाव ने यह साबित कर दिया था कि बरेली कैंट सीट पर नवाब मुजाहिद एक गंभीर और मजबूत राजनीतिक खिलाड़ी हैं जो लहरों के विपरीत भी अपना सियासी वजूद कायम रखना जानते हैं।
अब जब उत्तर प्रदेश की राजनीति फिर गठबंधन के दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है तो बरेली कैंट सीट पर नवाब मुजाहिद हसन खां का नाम स्वाभाविक रूप से चर्चा के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी अगर साथ मिलकर चुनाव लड़ती हैं तो यह सीट विपक्ष के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन सकती है। भाजपा जहां हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण की रणनीति पर काम करेगी, वहीं विपक्ष सामाजिक संतुलन और सर्वसमाज की राजनीति के जरिए मुकाबला करने की कोशिश करेगा।
ऐसे में नवाब मुजाहिद हसन खां जैसे नेता विपक्ष के लिए केवल उम्मीदवार नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी बन सकते हैं। एक ऐसा संदेश जिसमें पुरानी कांग्रेस संस्कृति, सामाजिक समरसता, मुस्लिम नेतृत्व की स्वीकार्यता और गठबंधन की नई राजनीति का मिश्रण दिखाई देता है। बरेली की राजनीति में यह भी कहा जाता है कि कुछ नेता चुनाव हारकर भी प्रभाव नहीं खोते। नवाब मुजाहिद हसन खां उन्हीं नेताओं में शामिल हैं। उनके राजनीतिक रिश्ते, सामाजिक व्यवहार और विभिन्न वर्गों में स्वीकार्यता उन्हें आज भी बरेली की राजनीति का बड़ा चेहरा बनाए हुए हैं। आने वाले विधानसभा चुनाव में यह प्रभाव वोटों में कितना बदलता है, यह भविष्य तय करेगा, लेकिन इतना तय है कि बरेली कैंट की राजनीति में नवाब मुजाहिद हसन खां का नाम अभी लंबे समय तक चर्चा में रहने वाला है।

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