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‘राशन नहीं, अधिकार चाहिए’, कंबल-राशन की राजनीति से कहीं आगे निकले सपा नेता राजेश अग्रवाल, बरेली में हक की राजनीति का नया चेहरा बने सपा नेता राजेश अग्रवाल, सफाईकर्मियों के हक की लड़ाई ने बदले समीकरण

नीरज सिसौदिया, बरेली

बरेली कैंट विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी की राजनीति इन दिनों एक नए मोड़ पर दिखाई दे रही है। पार्टी के पूर्व विधानसभा प्रत्याशी और टिकट के प्रबल दावेदार राजेश अग्रवाल ने सफाई कर्मचारियों के मुद्दे को जिस तरह जोरदार तरीके से उठाया है, उसने उन्हें सिर्फ एक राजनीतिक दावेदार नहीं बल्कि शोषित वर्ग की आवाज के रूप में स्थापित करना शुरू कर दिया है।
बरेली में लंबे समय से सफाई कर्मचारियों के शोषण की बातें होती रही हैं, लेकिन पहली बार कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा खुलकर उनके समर्थन में सड़क से लेकर प्रशासन तक लड़ाई लड़ता दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि राजेश अग्रवाल का यह आंदोलन अब सिर्फ मजदूरी का मुद्दा नहीं रह गया, बल्कि सामाजिक सम्मान और राजनीतिक जागरूकता की लड़ाई बनता जा रहा है।
बताया जा रहा है कि नगर क्षेत्र में काम कर रहे कई सफाई कर्मचारियों को सरकारी मानकों के अनुसार तय न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिल रही। ठेकेदारी व्यवस्था के तहत काम करने वाले इन कर्मचारियों को मात्र 6000 रुपये महीने में काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। महंगाई के इस दौर में इतने कम पैसे में परिवार चलाना उनके लिए बेहद मुश्किल हो गया है।
राजेश अग्रवाल ने इस पूरे मुद्दे को जिस अंदाज में उठाया है, उसने पारंपरिक राजनीति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने साफ कहा है कि सफाई कर्मचारियों को दया या एहसान नहीं, बल्कि उनका कानूनी अधिकार मिलना चाहिए। बता दें कि वर्षों से दलित समाज से आने वाले इन सफाईकर्मियों का इस्तेमाल केवल वोट बैंक के रूप में किया गया। चुनाव आते ही कुछ नेता राशन बांटते हैं, कुछ कंबल देकर फोटो खिंचवाते हैं और कुछ छोटे-मोटे कार्यक्रमों में चाय समोसा बांटकर खुद को समाजसेवी साबित करने की कोशिश करते हैं, लेकिन किसी ने भी उनकी स्थायी आर्थिक मजबूती के लिए आंदोलन नहीं किया।
राजेश अग्रवाल ने इस राजनीति से अलग रास्ता अपनाने की कोशिश की है। उन्होंने सफाई कर्मचारियों को राहत सामग्री देने के बजाय उन्हें उनका हक दिलाने का अभियान शुरू किया है। यही वजह है कि उनके आंदोलन को सफाई कर्मचारियों के बीच तेजी से समर्थन मिल रहा है।

6000 से बढ़ाकर 13 हजार रुपए मासिक दिलाने का वादा

राजेश अग्रवाल ने सार्वजनिक रूप से ऐलान किया है कि वह सफाई कर्मचारियों का मानदेय 6000 रुपए से बढ़ाकर 13 हजार रुपए से अधिक कराकर रहेंगे। उनका कहना है कि यह सिर्फ मांग नहीं, बल्कि सरकारी नियमों के अनुसार कर्मचारियों का अधिकार है।
उन्होंने जिलाधिकारी, श्रम विभाग और प्रदेश सरकार तक यह मुद्दा पहुंचाया है। साथ ही शोषण करने वाले ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की है। राजेश अग्रवाल ने साफ कहा है कि जब तक सफाई कर्मचारियों को न्यूनतम तय मानदेय नहीं मिलता और दोषी ठेकेदारों पर कार्रवाई नहीं होती, तब तक उनका आंदोलन जारी रहेगा।

दलित समाज में तेजी से बढ़ रही पकड़

बरेली कैंट विधानसभा क्षेत्र में सफाईकर्मियों और उनके परिवारों के करीब 18 से 20 हजार वोट बताए जाते हैं। वहीं, पिछले विधानसभा चुनाव में सपा उम्मीदवार को यहां से लगभग 10 हजार वोटों से शिकस्त झेलनी पड़ी थी। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह वोट बैंक चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। ऐसे में राजेश अग्रवाल का इस वर्ग के बीच लगातार सक्रिय होना उनकी राजनीतिक स्थिति को मजबूत कर रहा है। खास बात यह है कि सफाई कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा दलित समाज से आता है और लंबे समय से खुद को राजनीतिक रूप से उपेक्षित महसूस करता रहा है।


राजेश अग्रवाल ने जिस तरह उनके मुद्दों को प्रमुखता से उठाया है, उससे इस समाज में उनके प्रति भरोसा बढ़ता दिखाई दे रहा है। कई जगह सफाई कर्मचारियों ने खुलकर उनके समर्थन में आवाज उठानी शुरू कर दी है।

यूनियनों की चुप्पी पर भी सवाल

इस पूरे आंदोलन के दौरान सफाई कर्मचारियों की यूनियनों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। कर्मचारियों के बीच यह चर्चा है कि उनकी यूनियनें भी उनकी आवाज उतनी मजबूती से नहीं उठातीं, जितनी उठानी चाहिए। दरअसल, अगर सफाई कर्मचारी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गए और उन्हें सम्मानजनक वेतन मिलने लगा, तो कई नेताओं और ठेकेदारों की राजनीति कमजोर पड़ जाएगी। यही वजह है कि अब यह आंदोलन केवल मजदूरी तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक चेतना का रूप लेता दिखाई दे रहा है।

शहर के दूसरे लोग भी जुड़ने लगे

राजेश अग्रवाल द्वारा यह मुद्दा उठाने के बाद अब शहर के दूसरे वर्गों के लोग भी इस आंदोलन से जुड़ने लगे हैं। सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों का एक हिस्सा भी सफाई कर्मचारियों की मांगों को जायज बता रहा है। अगर यह आंदोलन इसी तरह बढ़ता रहा, तो यह बरेली कैंट की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है। इससे समाजवादी पार्टी को भी राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना जताई जा रही है।

टिकट की दौड़ में मजबूत होती दावेदारी

समाजवादी पार्टी में बरेली कैंट विधानसभा सीट को लेकर कई नाम चर्चा में हैं, लेकिन मौजूदा समय में राजेश अग्रवाल की सक्रियता उन्हें सबसे अलग पहचान दे रही है। अन्य टिकट के दावेदारों की तुलना में वह सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जमीन पर आंदोलन करते दिखाई दे रहे हैं। यही वजह है कि पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय राजनीतिक हलकों में उनकी दावेदारी को काफी मजबूत माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि समाजवादी पार्टी इस बार ऐसे चेहरे को प्राथमिकता दे सकती है, जिसकी जनता के बीच सक्रिय मौजूदगी हो और जो सामाजिक मुद्दों पर खुलकर संघर्ष करता दिखाई दे।

सिर्फ चुनाव नहीं, सामाजिक संदेश भी

राजेश अग्रवाल का यह अभियान केवल चुनावी रणनीति नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे सामाजिक न्याय और सम्मान की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है। उन्होंने जिस तरह “राशन-कंबल” की राजनीति से अलग हटकर “अधिकार और आत्मनिर्भरता” की बात की है, उसने उन्हें अलग पहचान दी है। बरेली की राजनीति में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि सफाई कर्मचारियों के मुद्दे को जिस गंभीरता से राजेश अग्रवाल उठा रहे हैं, वह आने वाले विधानसभा चुनाव में बड़ा राजनीतिक असर डाल सकता है। अगर यह समर्थन इसी तरह बढ़ता रहा, तो बरेली कैंट सीट पर समाजवादी पार्टी के भीतर उनकी स्थिति और मजबूत हो सकती है।

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