नीरज सिसौदिया, बरेली
रक्षाबंधन के पावन पर्व से ठीक एक दिन पहले बरेली क्लब के मेला मैदान में आयोजित एक बड़े रक्षाबंधन समारोह में मची अफरा-तफरी ने 45 वर्षीय मधु सिंह की जान ले ली। कार्यक्रम में करीब 20 हजार महिलाओं के पहुंचने की बात सामने आई है। साड़ी और अन्य उपहारों के वितरण के दौरान भीड़ बढ़ने के बाद भगदड़ जैसी स्थिति बनी, जिसमें कई महिलाओं के बेहोश होने और कुछ के घायल होने की खबर सामने आई। मधु सिंह को अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित किए जाने की जानकारी विभिन्न रिपोर्टों में सामने आई है। शुक्रवार को सोशल मीडिया पर घटना से संबंधित पीड़ितों के कई वीडियो वायरल हो रहे थे। इन वीडियोज में महिलाएं भगदड़ की पूरी कहानी बताती नजर आ रही थीं। एक युवती बता रही थी कि उसके साथ आई एक छोटी बच्ची मरते-मरते बची और वह खुद बेहोश हो गई थी। इसी प्रकार अन्य लोगों ने भी आपबीती सुनाई।

कार्यक्रम का आयोजन बरेली के मेयर उमेश गौतम और उनके बेटे पार्थ गौतम से जुड़े आयोजन के रूप में बताया गया है। घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी थी और यदि पहले से पुलिस-प्रशासन को इसकी जानकारी नहीं थी तो आखिर 20 हजार लोगों का यह आयोजन उसकी नजर से कैसे बच गया?
यह मामला सिर्फ एक आयोजन में हुई अव्यवस्था का नहीं है। यह आयोजकों की जिम्मेदारी के साथ-साथ पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

एक महिला की मौत, लेकिन जिम्मेदार कौन?
मधु सिंह रक्षाबंधन समारोह में शामिल होने पहुंची थीं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक भीड़ में उनकी तबीयत बिगड़ी और उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी जान नहीं बच सकी। वह 45 वर्ष की थीं और उनके पति पूर्व सैनिक बताए गए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि कार्यक्रम में हजारों लोगों के पहुंचने की उम्मीद थी तो भीड़ नियंत्रण की पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
क्या प्रवेश और निकास के लिए अलग-अलग रास्ते बनाए गए थे? क्या बैरिकेडिंग की गई थी? क्या प्रशिक्षित सुरक्षाकर्मी और स्वयंसेवक लगाए गए थे? क्या मेडिकल टीम और एंबुलेंस मौके पर मौजूद थी? क्या उपहार और साड़ी वितरण के लिए ऐसा सिस्टम बनाया गया था जिससे एक स्थान पर अचानक हजारों लोगों का दबाव न बने?
इन सवालों के जवाब जांच से ही सामने आएंगे, लेकिन मधु सिंह की मौत ने व्यवस्था की खामियों की जांच को अनिवार्य बना दिया है।
‘पुलिस को जानकारी नहीं थी’ तो सवाल और बड़ा है
इस मामले में पुलिस की ओर से यह कहा गया कि उसे कार्यक्रम की पूर्व सूचना नहीं थी। यही बयान अब सबसे बड़े सवाल का कारण बन गया है। अगर वास्तव में पुलिस को इतने बड़े आयोजन की जानकारी नहीं थी तो सवाल है कि स्थानीय पुलिस और लोकल इंटेलिजेंस यूनिट क्या कर रही थी?
बरेली जैसे बड़े शहर में किसी सार्वजनिक मैदान में हजारों लोगों को जुटाने वाला कार्यक्रम आयोजित हो और पुलिस को इसकी जानकारी तक न हो—यह सामान्य स्थिति नहीं मानी जा सकती।
आखिर 20 हजार लोगों को आमंत्रित करने के लिए प्रचार हुआ होगा, लोगों को कार्यक्रम स्थल तक पहुंचाने की व्यवस्था हुई होगी, वाहनों की आवाजाही हुई होगी और मैदान में बड़े स्तर पर तैयारी की गई होगी। फिर भी यदि पुलिस को भनक तक नहीं लगी तो यह पुलिस की सूचना प्रणाली की प्रभावशीलता पर सवाल खड़ा करता है।

आज रक्षाबंधन था, कल कोई संवेदनशील आयोजन हुआ तो?
यह सवाल और भी गंभीर इसलिए है क्योंकि यह केवल रक्षाबंधन का कार्यक्रम था। कल्पना कीजिए कि इसी तरह 15-20 हजार लोग किसी राजनीतिक विरोध, धार्मिक तनाव, आंदोलन या किसी संवेदनशील मुद्दे को लेकर अचानक एकत्र हो जाएं। अगर उस भीड़ में कुछ उपद्रवी या असामाजिक तत्व घुस जाएं तो स्थिति कितनी भयावह हो सकती है? क्या तब भी पुलिस-प्रशासन के अधिकारी यही कहेंगे कि ‘हमें आयोजन की जानकारी नहीं थी’?
पुलिस का काम केवल घटना होने के बाद मौके पर पहुंचना नहीं है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़े आयोजनों, जुलूसों और संभावित भीड़ की जानकारी जुटाना और जोखिम का आकलन करना भी पुलिस की जिम्मेदारी का हिस्सा है।
इसलिए इस घटना की जांच में यह सवाल भी शामिल होना चाहिए कि स्थानीय खुफिया तंत्र को इतने बड़े आयोजन की जानकारी क्यों नहीं मिली। यदि जानकारी मिली थी तो अधिकारियों ने क्या कदम उठाए और यदि नहीं मिली तो सूचना तंत्र कहां विफल हुआ?
अनुमति नहीं थी तो प्रशासन की जिम्मेदारी भी बनती है
यदि आयोजकों ने इतने बड़े कार्यक्रम के लिए पुलिस या प्रशासन से अनुमति नहीं ली थी, तो यह भी जांच का विषय है कि क्या कार्यक्रम सार्वजनिक स्थान पर बिना आवश्यक अनुमति आयोजित किया गया।
यदि अनुमति जरूरी थी और नहीं ली गई, तो आयोजकों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन यहां प्रशासन के सामने दूसरा सवाल भी खड़ा होता है- बिना अनुमति इतने बड़े आयोजन की तैयारी आखिर प्रशासन की नजर से कैसे बची? यदि किसी सार्वजनिक मैदान में हजारों लोगों का कार्यक्रम हो रहा है तो स्थानीय प्रशासन, पुलिस, ट्रैफिक पुलिस और अन्य संबंधित विभागों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। और यदि अनुमति ली गई थी तो फिर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि अनुमति किस संख्या के लिए दी गई थी और सुरक्षा व्यवस्था के क्या मानक तय किए गए थे।

सिर्फ एफआईआर नहीं, पूरी जांच जरूरी
मधु सिंह की मौत के मामले में एफआईआर दर्ज होती है या नहीं, यह पुलिस की जांच और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करेगा। लेकिन यदि प्रथम दृष्टया किसी की आपराधिक लापरवाही से मौत होने का आधार सामने आता है तो भारतीय न्याय संहिता के तहत लापरवाही से मौत संबंधी प्रावधानों की जांच की जा सकती है।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 106 लापरवाही से मौत से संबंधित है। हालांकि इस धारा को लागू करने के लिए यह स्थापित करना जरूरी होगा कि संबंधित व्यक्ति की ऐसी लापरवाही थी जिसका मौत से प्रत्यक्ष संबंध था। इसीलिए इस मामले में किसी व्यक्ति को जांच पूरी होने से पहले दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा। लेकिन निष्पक्ष जांच से बचना भी उतना ही गलत होगा।
जांच में कार्यक्रम की अनुमति, आयोजन की क्षमता, सुरक्षा व्यवस्था, बैरिकेडिंग, प्रवेश-निकास, सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल वीडियो, आयोजकों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, मेडिकल रिकॉर्ड तथा पोस्टमार्टम रिपोर्ट जैसे सभी पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए।

सोशल मीडिया पर फूट रहा लोगों का गुस्सा
घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों में नाराजगी देखने को मिली। फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप ग्रुपों में लोगों ने कार्यक्रम की व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण और महिला की मौत को लेकर सवाल उठाए। कई लोगों का सवाल है कि यदि हजारों महिलाओं को एक कार्यक्रम में बुलाया गया था तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी। लोग यह भी पूछ रहे हैं कि इतनी बड़ी घटना के बाद जिम्मेदारी तय करने में देरी क्यों हो रही है।
हालांकि सोशल मीडिया पर प्रसारित हर वीडियो या दावा स्वत: प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। लेकिन वायरल वीडियो, फोटो और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान जांच के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य या सुराग बन सकते हैं। पुलिस को इनका सत्यापन कर घटनाक्रम की वास्तविक तस्वीर सामने लानी चाहिए।
मेयर और आयोजकों की भूमिका भी जांच के दायरे में आए
कार्यक्रम मेयर उमेश गौतम और उनके बेटे पार्थ गौतम से जुड़े आयोजन के रूप में बताया जा रहा है। ऐसे में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कार्यक्रम का वास्तविक आयोजक कौन था, आयोजन की अनुमति किसके नाम से थी, स्थल किसने बुक कराया था, सुरक्षा व्यवस्था किस एजेंसी या व्यक्ति के जिम्मे थी और भीड़ नियंत्रण की जिम्मेदारी किसे दी गई थी। यह स्पष्ट करना इसलिए जरूरी है क्योंकि **किसी राजनीतिक या सार्वजनिक व्यक्ति से जुड़ा होना किसी को कानून से ऊपर नहीं करता और न किसी व्यक्ति को केवल राजनीतिक पहचान के आधार पर दोषी माना जा सकता है। जांच का सिद्धांत बिल्कुल सीधा होना चाहिए- जिसकी जितनी जिम्मेदारी थी, उसकी उतनी ही जवाबदेही तय हो।

मधु सिंह की मौत को ‘हादसा’ कहकर भूलना सबसे आसान रास्ता होगा
बड़े आयोजनों में हादसे कभी-कभी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों के कारण भी होते हैं। लेकिन हर हादसे के बाद यह पता लगाना जरूरी होता है कि क्या उसे रोका जा सकता था। यदि सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम थे, आयोजकों ने सभी नियमों का पालन किया था और फिर भी अचानक अप्रत्याशित घटना हुई तो जांच के बाद यह तथ्य सामने आना चाहिए। लेकिन यदि भीड़ का अनुमान पहले से था और उसके बावजूद पर्याप्त पुलिस, सुरक्षा कर्मी, बैरिकेडिंग, निकासी व्यवस्था या मेडिकल सुविधा नहीं थी, तो इसे महज हादसा कहकर छोड़ना पीड़ित परिवार के साथ अन्याय होगा। और अगर पुलिस-प्रशासन को वास्तव में इतने बड़े आयोजन की जानकारी नहीं थी तो यह सवाल भी अनुत्तरित नहीं रहना चाहिए कि बरेली की लोकल इंटेलिजेंस और स्थानीय पुलिस व्यवस्था आखिर किस काम के लिए है?

न्याय का मतलब किसी को निशाना बनाना नहीं, सच सामने लाना है
मधु सिंह को न्याय दिलाने का मतलब यह नहीं कि बिना जांच किसी आयोजक, अधिकारी या नेता को दोषी घोषित कर दिया जाए। न्याय का अर्थ है- निष्पक्ष जांच, सभी जिम्मेदार पक्षों की भूमिका की पड़ताल और दोषी पाए जाने पर बिना किसी दबाव के कानूनी कार्रवाई।
मधु सिंह एक नागरिक थीं। वह रक्षाबंधन के एक समारोह में शामिल होने गई थीं। उन्हें यह भरोसा रहा होगा कि जिस कार्यक्रम में हजारों लोग जुट रहे हैं, वहां उनकी सुरक्षा का इंतजाम होगा। अगर उस भरोसे की कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है तो उनकी मौत का जवाब मिलना चाहिए। इस घटना को राजनीतिक बयानबाजी में दबाने के बजाय प्रशासन को खुद आगे आकर पूरी तस्वीर सामने रखनी चाहिए।




