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दंगा हो या धार्मिक आयोजन, आला हजरत के उर्स से कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा तक, दंगा पीड़ितों की मदद से जनआंदोलनों तक… बरेली में विपक्ष की सबसे मुखर आवाज बन चुके हैं सपा के पूर्व विधानसभा प्रत्याशी राजेश अग्रवाल, पढ़ें ‘सबका साथ’ वाली सियासत के सबसे बड़े चेहरे की सबसे अलग कहानी

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नीरज सिसौदिया, बरेली

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच बरेली कैंट विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के संभावित उम्मीदवारों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होती जा रही हैं। इस सीट पर कई दावेदार अपनी-अपनी तरह से जमीन मजबूत करने में जुटे हैं, लेकिन वरिष्ठ समाजवादी पार्षद और पूर्व विधानसभा प्रत्याशी राजेश अग्रवाल की राजनीति का एक अलग पहलू लगातार चर्चा में है। वह धार्मिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी से लेकर सामाजिक कार्यक्रमों, व्यापारियों की समस्याओं और शहर में संकट के समय लोगों की मदद तक अपनी मौजूदगी दर्ज कराते आ रहे हैं। हाल ही में सावन माह में कांवड़ियों के लिए भंडारे, पुष्प वर्षा, सम्मान से और आला हजरत के उर्स के दौरान जायरीनों के लिए बिरयानी, पुष्प वर्षा और शॉल ओढ़ाकर सम्मान के साथ ही अंजुमनों के स्वागत तक राजेश अग्रवाल का सर्वधर्म समभाव वाला रूप देखने को मिला।


राजेश अग्रवाल की राजनीतिक शैली को समझने के लिए उनके समर्थक जिस बात को सबसे ज्यादा रेखांकित करते हैं, वह है जाति और धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर लोगों के बीच पहुंच बनाने की कोशिश। यही वजह है कि एक तरफ जहां वह सावन में कांवड़ियों के स्वागत और भंडारों में दिखाई देते हैं, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम समाज से जुड़े धार्मिक आयोजनों में भी उनकी सक्रिय भागीदारी नजर आती है। सिखों और ईसाइयों के त्योहार भी वह खुलकर मनाते हैं।


आगामी चुनाव को देखते हुए यह गतिविधियां महज सामाजिक भागीदारी हैं या इनके पीछे राजनीतिक रणनीति भी है, यह अलग बहस का विषय है। लेकिन इतना जरूर है कि कैंट सीट पर अपनी दावेदारी को सबसे अधिक मजबूत करने वाले राजेश अग्रवाल ने पिछले कुछ समय में खुद को किसी एक समुदाय तक सीमित रखने के बजाय व्यापक सामाजिक संपर्क की राजनीति पर जोर दिया है।

आला हजरत उर्स में मुस्लिम समाज के बीच मौजूदगी

आला हजरत उर्स के दौरान पुराने शहर में आयोजित कार्यक्रमों में राजेश अग्रवाल की मौजूदगी चर्चा में रही। नॉवल्टी टॉकीज के सामने उन्होंने वेज बिरयानी और मिठाई का वितरण कराया। जुलूस के दौरान लोगों का स्वागत करने के साथ फूलों की मालाएं, शॉल और अन्य सम्मान सामग्री भी वितरित की गई।
कोहाड़ापीर और पुराने शहर से जुड़े जुलूसों में भी उनके स्तर पर खाद्य पदार्थों के वितरण और स्वागत की व्यवस्था की गई। बड़ी मात्रा में बिरयानी बांटे जाने के अलावा लोगों का फूल-मालाओं और शॉल आदि से स्वागत किया गया।


राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह गतिविधि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बरेली कैंट सीट का सामाजिक समीकरण काफी विविध है। ऐसे में किसी संभावित प्रत्याशी के लिए केवल अपने परंपरागत समर्थक वर्ग तक सीमित रहने के बजाय अलग-अलग समुदायों के बीच संपर्क बनाना चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।

सावन में कांवड़ियों का स्वागत, भंडारों में भी भागीदारी

राजेश अग्रवाल की गतिविधियों का दूसरा पहलू सावन के दौरान दिखाई देता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार उन्होंने शहर में कई स्थानों पर कांवड़ियों का स्वागत किया। कई जगह भंडारों का आयोजन कराया और स्वयं भी विभिन्न भंडारों में शामिल हुए। कांवड़ियों पर पुष्पवर्षा करने के साथ उनके लिए भोजन और अन्य सुविधाओं की व्यवस्था में भी भागीदारी की।


एक तरफ आला हजरत उर्स के दौरान मुस्लिम समाज से जुड़े आयोजन में सक्रियता और दूसरी तरफ सावन में कांवड़ियों के स्वागत की तस्वीर उनकी राजनीति के उस संदेश को सामने लाती है, जिसे उनके समर्थक ‘सर्वधर्म समभाव’ के रूप में पेश करते हैं।
2027 के चुनाव में यह छवि उनके लिए कितनी उपयोगी साबित होगी, इसका जवाब आने वाले समय में मिलेगा, लेकिन कैंट जैसे मिश्रित सामाजिक संरचना वाले क्षेत्र में यह रणनीति उन्हें दूसरे दावेदारों से अलग पहचान जरूर दे रही है।

सितम्बर 2025 की घटना ने बनाई अलग छवि?

राजेश अग्रवाल के समर्थक उनकी राजनीतिक सक्रियता का सबसे मजबूत उदाहरण सितंबर 2025 में शहर में पैदा हुए तनाव और उसके बाद की परिस्थितियों को मानते हैं। उनके अनुसार उस समय जब शहर में तनाव और अव्यवस्था का माहौल था, तब राजेश अग्रवाल प्रभावित लोगों की मदद के लिए अधिकारियों के पास लगातार पहुंच रहे थे।


बताया जाता है कि उस दौरान उन्होंने मुस्लिम समाज के प्रभावित लोगों की समस्याओं को लेकर संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया और समाधान के लिए प्रयास किए। बरेली विकास प्राधिकरण में सदस्य होने के कारण प्रशासनिक स्तर पर उनकी पहुंच का इस्तेमाल भी लोगों की मदद के लिए किए जाने की बात कही जाती है।


यहां राजनीतिक विश्लेषण का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संकट की घड़ी में किसी नेता की भूमिका उसकी सामान्य राजनीतिक गतिविधियों से अलग होती है। जब हालात सामान्य हों तो किसी धार्मिक आयोजन में शामिल होना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन तनाव के समय किसी समुदाय के प्रभावित लोगों के बीच खड़े होना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा भी हो सकता है। राजेश अग्रवाल के समर्थक इसी आधार पर दावा करते हैं कि सितम्बर 2025 की घटना के दौरान उन्होंने जातीय या धार्मिक पहचान देखने के बजाय लोगों की मदद को प्राथमिकता दी।
हालांकि, इस दावे को व्यापक राजनीतिक निष्कर्ष में बदलने से पहले संबंधित घटनाओं और प्रशासनिक रिकॉर्ड से स्वतंत्र पुष्टि जरूरी होगी। लेकिन राजनीतिक रूप से यह नैरेटिव राजेश अग्रवाल की संभावित उम्मीदवारी के लिए महत्वपूर्ण जरूर है।

व्यापारियों, एलीट क्लास से लेकर आम लोगों तक पहुंच वाले एकमात्र नेता

राजेश अग्रवाल की राजनीति का एक अन्य आधार व्यापारी वर्ग और आम जनता के बीच सक्रियता को बताया जाता है। बरेली शहर में व्यापारियों से जुड़े मुद्दों पर उनकी मौजूदगी और विभिन्न जनआंदोलनों में भागीदारी को उनके समर्थक उनकी सक्रिय राजनीति का हिस्सा मानते हैं।


उनका दावा है कि जब व्यापारी किसी समस्या को लेकर आंदोलन करते हैं या शहर की जनता से जुड़ा कोई मुद्दा सामने आता है तो राजेश अग्रवाल वहां मौजूद रहते हैं। समर्थकों के अनुसार उनकी राजनीति केवल चुनाव के दौरान लोगों के बीच पहुंचने तक सीमित नहीं है। यही बिंदु 2027 की दावेदारी में उनके लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। विधानसभा चुनाव में टिकट पाने वाले दावेदारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल संगठन के भीतर अपनी जगह बनाना नहीं, बल्कि यह साबित करना भी होती है कि उनका जनाधार लगातार सक्रिय है।

मुसीबत में परिवारों के साथी

राजेश अग्रवाल की छवि को उनके समर्थक केवल राजनीतिक या धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं रखते। उनका कहना है कि जब किसी परिवार पर व्यक्तिगत त्रासदी आती है, तब भी वह सहायता के लिए आगे आते हैं।
बंदर के काटने से जगदीश नामक व्यक्ति की मौत का मामला हो या हरुनगला में एक व्यक्ति की बिच्छू के डंक से मौत की घटना, ऐसे मामलों में पीड़ित परिवारों के साथ खड़े होने और उनकी मदद करने की कोशिश का दावा किया गया है। ऐसी घटनाएं राजनीतिक भाषणों में भले छोटी लगें, लेकिन स्थानीय राजनीति में इनका असर लंबे समय तक रह सकता है। किसी नेता की पहचान अक्सर बड़े कार्यक्रमों से ज्यादा उन परिवारों की यादों में बनती है, जिनके मुश्किल समय में वह उनके घर तक पहुंचा हो।

राजेश अग्रवाल की सक्रियता केवल किसी एक वर्ग या समाज तक सीमित नहीं है। वह सिख और ईसाई समुदाय के धार्मिक एवं सामाजिक आयोजनों में भी बढ़-चढ़कर शामिल होते रहे हैं। गुरुपर्व, नगर कीर्तन और अन्य सिख धार्मिक आयोजनों में उनकी मौजूदगी के साथ-साथ क्रिसमस, ईस्टर और ईसाई समाज के सामाजिक कार्यक्रमों में भी उनकी सहभागिता देखने को मिलती है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राजेश अग्रवाल लगातार सर्वधर्म सद्भाव और सामाजिक समरसता का संदेश देने की कोशिश करते रहे हैं। विभिन्न धार्मिक समुदायों के आयोजनों में उनकी सक्रिय भागीदारी उनकी उस राजनीतिक शैली को दर्शाती है, जिसमें समाज के हर वर्ग से संवाद और जुड़ाव को प्राथमिकता दी जाती है।

2027 के लिए सबसे बड़ा सवाल- टिकट या जनाधार?

बरेली कैंट में समाजवादी पार्टी के टिकट के लिए कई दावेदार हैं लेकिन राजेश अग्रवाल के मुकाबले कोई भी दावेदार कहीं नहीं ठहरता। इसकी वजह आम जनता से लेकर वह एलीट क्लास भी है जिनके बीच समाजवादी पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं की एंट्री नहीं हो पाती। खास तौर पर मुस्लिम नेताओं के लिए इस वर्ग के बीच जगह बनाना बेहद मुश्किल रहा है। राजेश अग्रवाल बरेली कैंट विधानसभा सीट से ऐसे एकमात्र टिकट के दावेदार हैं जिनकी न सिर्फ मौजूदगी इस वर्ग के बीच है बल्कि उनके कार्यक्रमों में अक्सर राजेश अग्रवाल बतौर मुख्य अतिथि या विशिष्ट अतिथि भागीदारी करते नजर आते हैं। ये वही वोट बैंक है जो भाजपा का कोर वोटर कहा जाता है लेकिन बात जब राजेश अग्रवाल की आती है तो वह भाजपा से दूरी बना लेता है। यह स्पष्ट करता है कि अलग-अलग सामाजिक वर्गों में उनकी कितनी स्वीकार्यता है।


उनकी मौजूदा गतिविधियों को देखें तो रणनीति काफी स्पष्ट नजर आती है- धार्मिक आयोजनों में भागीदारी, सामाजिक कार्यक्रम, व्यापारियों के मुद्दे, जनआंदोलन और संकट में लोगों की मदद। यह रणनीति उन्हें किसी एक वोट बैंक के नेता की छवि से बाहर निकालने की कोशिश करती है। आला हजरत उर्स में सहभागिता और सावन में कांवड़ियों का स्वागत इसके सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं।


हालांकि चुनावी राजनीति में सामाजिक गतिविधियों को सीधे वोट में बदलना आसान नहीं होता। अंतिम फैसला स्थानीय संगठन, पार्टी नेतृत्व, उम्मीदवार की जीतने की क्षमता, सामाजिक समीकरण और चुनाव के समय बने राजनीतिक माहौल पर निर्भर करेगा। फिर भी राजेश अग्रवाल की दावेदारी का सबसे मजबूत पक्ष यही दिखाई देता है कि वह खुद को केवल किसी एक समुदाय या वर्ग के नेता के रूप में स्थापित करने के बजाय ‘सबके काम आने वाले नेता’ के तौर पर पहचान बना चुके हैं।
2027 का चुनाव अब दूर नहीं है। ऐसे में आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजेश अग्रवाल की यह सामाजिक सक्रियता कितनी व्यापक होती है और क्या समाजवादी पार्टी नेतृत्व इसे टिकट के लिए उनकी सबसे बड़ी ताकत के रूप में देखता है। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि धार्मिक आयोजनों से लेकर संकट की घड़ी तक लगातार दिखाई देने वाली उनकी मौजूदगी ने उन्हें कैंट की संभावित राजनीतिक लड़ाई में चर्चा का एक महत्वपूर्ण चेहरा बना दिया है।

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