नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली में रक्षाबंधन समारोह के दौरान हुई भगदड़ और एक महिला की मौत का मामला अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं रह गया है, बल्कि समाजवादी पार्टी की स्थानीय राजनीति और उसके जिला नेतृत्व की सक्रियता पर भी सवाल खड़े कर रहा है। जिस मामले में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सार्वजनिक तौर पर मेयर के खिलाफ एफआईआर और गिरफ्तारी की मांग उठाई, उसी मुद्दे पर बरेली के सपा जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव की चुप्पी ने पार्टी कार्यकर्ताओं और राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ दी है। कांग्रेस ने भी प्रतिनिधिमंडल भेजकर कार्रवाई की मांग की, लेकिन सपा का स्थानीय नेतृत्व इस पूरे प्रकरण पर मुखर नजर नहीं आया। यही वजह है कि अब सवाल उठ रहा है कि आखिर बरेली सपा का जिला अध्यक्ष इतना बड़ा जनहित का मुद्दा सामने होने के बावजूद चुप क्यों है?
बता दें कि 27 अगस्त को रक्षाबंधन से एक दिन पहले बरेली में मेयर उमेश गौतम और उनके पुत्र पार्थ गौतम की ओर से आयोजित रक्षाबंधन समारोह में बड़ी संख्या में महिलाएं पहुंचीं। कार्यक्रम के दौरान भगदड़ की स्थिति पैदा हुई। इस घटना में मधु सिंह नाम की एक महिला की मौत होने की बात उनकी ननद लता तोमर और भांजे राजा तोमर ने कही थी। राजा तोमर खुद भाजपा के मंडल अध्यक्ष हैं। वहीं, कई महिलाओं के बेहोश होने की जानकारी भी सामने आई। घटना के बाद आयोजन की व्यवस्थाओं, भीड़ नियंत्रण और प्रशासनिक तैयारियों को लेकर गंभीर सवाल उठे। पुलिस की ओर से भी भगदड़ की स्थिति बनने की बात स्वीकार की गई। साथ ही यह भी कहा गया था कि पुलिस-प्रशासन से कार्यक्रम की कोई पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी और न ही सूचना दी गई थी।

इतनी बड़ी घटना के बाद स्वाभाविक तौर पर राजनीतिक दलों से भी प्रतिक्रिया की उम्मीद थी। खासकर विपक्षी दलों से, क्योंकि विपक्ष का काम ही सरकार और सत्तारूढ़ दल से जुड़े जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करने के लिए सवाल उठाना और जनता की आवाज को मजबूती से सामने रखना है। कांग्रेस ने इस मामले में सक्रियता दिखाई। पार्टी का प्रतिनिधिमंडल बरेली पहुंचा और प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर घटना के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। प्रतिनिधिमंडल में रामपुर के नेता संजय कपूर, बरेली कांग्रेस जिलाध्यक्ष अशफाक सकलैनी, पूर्व जिलाध्यक्ष रामदेव पांडेय, वरिष्ठ नेता डॉक्टर केबी त्रिपाठी सहित कई नेता शामिल रहे।


कांग्रेस नेताओं ने समारोह की व्यवस्थाओं और घटना की जिम्मेदारी तय करने की मांग उठाई। पार्टी की ओर से कई बयान भी सामने आए। यानी विपक्ष के एक प्रमुख दल ने इस घटना को राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही के सवाल के रूप में उठाने की कोशिश की।
लेकिन समाजवादी पार्टी का स्थानीय रुख इस मामले में अलग दिखाई दिया। जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव ने महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी और अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष इंजीनियर अनीस अहमद खां के साथ घटना वाले दिन मृतका के घर जाकर खानापूर्ति कर ली और उसके बाद चुप्पी साध ली। मामला अब भी ठंडा नहीं हुआ है और हर तरफ जनता की ओर से इसका विरोध हो रहा है। सोशल मीडिया तो विरोध से भरा पड़ा है।

सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से मेयर उमेश गौतम के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने और उन्हें जेल भेजने की बात कही। उन्होंने मेयर को लेकर बेहद कड़ी राजनीतिक टिप्पणी भी की। राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का रुख इतना स्पष्ट था कि किसी को यह समझने में दिक्कत नहीं होनी चाहिए थी कि समाजवादी पार्टी इस घटना को किस नजरिए से देख रही है।

यहीं से बरेली सपा के जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव को लेकर सवाल शुरू होते हैं। अगर पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष किसी स्थानीय भाजपा नेता के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहा है तो क्या जिले के पार्टी अध्यक्ष की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह उसी मुद्दे को बरेली में मजबूती से उठाए? क्या जिला अध्यक्ष को प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग नहीं करनी चाहिए थी? क्या उन्हें यह सवाल नहीं पूछना चाहिए था कि 20 हजार लोगों के जुटान वाले इतने बड़े आयोजन में भीड़ प्रबंधन की क्या व्यवस्था थी? क्या उन्हें यह नहीं जानना चाहिए था कि कार्यक्रम के लिए प्रशासनिक स्तर पर क्या अनुमति और सुरक्षा व्यवस्था थी? आयोजकों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई? लापरवाह पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई? बरेली की राजनीति में फिलहाल यही सवाल चर्चा का विषय बने हुए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अखिलेश यादव जिस मुद्दे पर मेयर के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, उसी मुद्दे पर बरेली सपा का जिला संगठन सड़क पर क्यों नहीं दिखाई दिया?
राजनीतिक दलों में जिला अध्यक्ष की भूमिका केवल संगठनात्मक बैठकों और दावतों तक सीमित नहीं होती जिसे शुभलेश यादव ने अपनी कार्यप्रणाली का अहम हिस्सा बना लिया है। जिला अध्यक्ष को पार्टी की नीतियों और राष्ट्रीय नेतृत्व के संदेश को स्थानीय स्तर पर जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ स्थानीय जनसमस्याओं पर आंदोलन और संघर्ष का नेतृत्व भी करना होता है। खासकर तब, जब मामला किसी महिला की मौत और सार्वजनिक कार्यक्रम में सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा हो।
शुभलेश यादव के आलोचक अब इसी को लेकर सवाल उठा रहे हैं। हालांकि, सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में उनके खिलाफ तरह-तरह के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि शुभलेश यादव ने गुपचुप तरीके से समझौता कर लिया है और वह पहले भी भाजपा नेताओं के इशारों पर काम करते रहे हैं। कुछ लोग शुभलेश यादव को बिकाऊ नेता बता रहे हैं और कह रहे हैं कि आवाज न उठाने के लिए उन्होंने संबंधित पक्ष से सौदेबाजी कर ली है, कुछ का कहना है कि शुभलेश यादव खुद भी कई तरह के काले कारनामों में संलिप्त हैं, इसलिए वह योगी और मोदी सरकार पर तो सवाल खड़े कर सकते हैं लेकिन बरेली के किसी भी स्थानीय भाजपा नेता, भाजपा विधायक या मेयर पर न तो सवाल खड़े कर सकते हैं और न ही उनके खिलाफ कभी कोई आंदोलन कर सकते हैं। वह कहते हैं कि जिला अध्यक्ष बनने के बाद शुभलेश यादव ने न तो किसी विधायक की नाकामी को उजागर किया और न ही मेयर की नाकामियों पर कोई आंदोलन करने की हिम्मत जुटा सके। एक तरह से कहा जाए तो उन्होंने भाजपा के स्थानीय विधायकों और नेताओं को क्लीन चिट दे रखी है। तो वहीं कुछ लोगों का कहना है कि बरेली जिले में समाजवादी पार्टी का इतना डरपोक जिला अध्यक्ष आज तक नहीं हुआ।

यही सवाल शुभलेश यादव की राजनीतिक सक्रियता पर भी उठ रहा है। जिला अध्यक्ष बनने के बाद स्थानीय भाजपा नेताओं, विधायकों और मेयर के खिलाफ समाजवादी पार्टी के आंदोलन को लेकर भी पार्टी के भीतर और बाहर चर्चा होती रही है। आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि आखिर स्थानीय भाजपा नेतृत्व के खिलाफ सपा का जिला संगठन कितनी मजबूती से मैदान में उतरा है। हालांकि, किसी भी नेता की राजनीतिक सक्रियता का मूल्यांकन उसके सार्वजनिक बयानों, आंदोलनों और संगठनात्मक गतिविधियों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
बरेली के पुराने समाजवादी नेताओं का दौर याद करने वाले लोग कहते हैं कि पार्टी के पूर्व जिला अध्यक्षों और पदाधिकारियों के समय में स्थानीय मुद्दों को लेकर संगठन सड़क पर दिखाई देता था। वीरपाल सिंह यादव, महेश पांडेय और अरविंद यादव जैसे नेताओं के कार्यकाल को याद करते हुए पार्टी समर्थक कहते हैं कि उस दौर में सत्ता पक्ष के खिलाफ आंदोलन करने में संगठन ज्यादा मुखर नजर आता था। इनमें वीरपाल सिंह यादव जिला अध्यक्ष थे तो महेश पांडेय और अरविंद सिंह यादव महासचिव पद की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।

आज परिस्थितियां बदल चुकी हैं। 2027 का विधानसभा चुनाव सामने है। बरेली की राजनीति में भाजपा और सपा के बीच मुकाबला बेहद महत्वपूर्ण रहने वाला है। ऐसे समय में विपक्षी दल के जिला अध्यक्ष की सक्रियता इसलिए भी मायने रखती है क्योंकि जनता के बीच पार्टी की मौजूदगी केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि पांच साल के संघर्ष से तय होती है।
रक्षाबंधन समारोह की घटना ने सपा के सामने एक बड़ा राजनीतिक अवसर भी पैदा किया था। यदि सपा जिला संगठन इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाता, घटना की निष्पक्ष जांच की मांग करता, पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए प्रशासन पर दबाव बनाता और भीड़ प्रबंधन में हुई कथित लापरवाही पर सवाल उठाता तो इससे पार्टी की विपक्षी भूमिका मजबूत होती। लेकिन स्थानीय नेतृत्व की ओर से अपेक्षित मुखरता दिखाई नहीं देने के कारण अब उल्टा सवाल जिला अध्यक्ष की भूमिका पर खड़ा हो गया है।
राजनीति में चुप्पी भी कई बार एक संदेश देती है। खासकर तब, जब राष्ट्रीय नेतृत्व किसी मुद्दे पर आक्रामक रुख अपना चुका हो और स्थानीय नेतृत्व उसी मुद्दे पर शांत दिखाई दे।
बरेली सपा के लिए यह केवल शुभलेश यादव का व्यक्तिगत सवाल नहीं है। यह पार्टी के जिला संगठन की कार्यशैली और उसकी राजनीतिक दिशा का सवाल भी है। अगर सपा को 2027 में भाजपा को चुनौती देनी है तो उसे केवल लखनऊ के बयानों पर निर्भर रहने के बजाय बरेली की जमीन पर भी सक्रिय दिखाई देना होगा।
फिलहाल रक्षाबंधन समारोह की भगदड़ का मामला पुलिस और प्रशासनिक जांच के दायरे में है। यह जिम्मेदारी जांच के निष्कर्षों और कानून के मुताबिक तय होनी चाहिए। लेकिन विपक्षी दलों के लिए जनता के सवाल उठाना राजनीतिक जिम्मेदारी है। और यहीं शुभलेश यादव से सबसे बड़ा सवाल पूछा जा रहा है- जब अखिलेश यादव ने बरेली के मेयर के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर दी, कांग्रेस ने भी प्रशासन के दरवाजे पर दस्तक दे दी, तो बरेली सपा का जिला अध्यक्ष आखिर चुप क्यों है?
2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन जनता सवाल अभी से पूछ रही है। सपा के जिला अध्यक्ष इन सवालों का जवाब सार्वजनिक रूप से देते हैं या उनकी चुप्पी ही उनका जवाब बनी रहती है, यह आने वाला समय बताएगा।




