विचार

एक, दो, तीन, महंगाई ने बजा दी बीन…

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एक, दो, तीन
महंगाई ने बजा दी बीन
चार, पांच, छह
ज्यादा पैसे देकर कम सामान ले
सात, आठ, नौ
महंगाई कहती है तू चैन से मत सो
दस, ग्यारह, बारह
पैसा बन चुका है सबका सहारा
इसके बिना नहीं हो रहा गुजारा
मैं कहती हूं टैक्स घटाओ
आम आदमी को महंगाई में न जलाओ
बढ़ रहा है भ्रष्टाचार
क्या करेगा लाचार
जमाखोरों को करो सलाखों के पीछे
आखिर क्यों बैठी है सरकार आंखें मीचे
इस सोई हुई सरकार को जगाओ
महंगाई को दूर भगाओ
भारत सोने की है चिड़िया, इसे मत बेचो
अपना ही देश है यारों इसके बारे में कुछ तो सोचो।

    प्रस्तुति   -निष्ठा शर्मा

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