नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की सियासत में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो पद से नहीं, अपनी लगातार मौजूदगी से पहचाने जाते हैं। समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ पार्षद और शहर विधानसभा सीट से पूर्व प्रत्याशी राजेश अग्रवाल ऐसा ही एक नाम हैं। वह सपा के इकलौते ऐसे हिन्दू पार्षद हैं जो पार्टी के चुनाव चिह्न ‘साइकिल’ पर जीतकर नगर निगम पहुंचे। उनके अलावा सपा का कोई भी हिन्दू नेता पार्टी के सिंबल पर पार्षद का चुनाव जीतने में सफल नहीं हुआ। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि राजेश अग्रवाल की राजनीति सिर्फ पार्टी की लहर पर नहीं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत पकड़ और भरोसे पर खड़ी है।
राजेश अग्रवाल रामपुर गार्डन वार्ड से पार्षद हैं। यह इलाका लंबे समय से भाजपा का गढ़ माना जाता है। विधानसभा चुनावों में यहां से भाजपा उम्मीदवारों को बढ़त मिलती रही है। लेकिन जब बात नगर निगम चुनाव की आती है और मुकाबले में राजेश अग्रवाल सपा के टिकट पर होते हैं, तो समीकरण बदल जाते हैं। जनता भाजपा उम्मीदवार को नकार देती है और साइकिल पर भरोसा जताती है। पिछले निगम चुनाव में भी यही हुआ। इतना ही नहीं कैंट से भाजपा विधायक संजीव अग्रवाल के बूथ से भी राजेश अग्रवाल ने भाजपा उम्मीदवार को धूल चटा दी थी। यह सिर्फ एक जीत नहीं, बल्कि एक संदेश था- स्थानीय राजनीति में चेहरा और काम, बड़े राजनीतिक झुकावों पर भारी पड़ सकते हैं।
दिलचस्प यह भी है कि मौजूदा समय में सपा के एक और हिन्दू पार्षद गौरव सक्सेना जरूर हैं, लेकिन वे पार्टी के सिंबल पर नहीं, बल्कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीतकर आए। यानी सपा के अधिकृत चुनाव चिह्न पर हिन्दू समाज से जीत हासिल करने का रिकॉर्ड केवल राजेश अग्रवाल के नाम ही दर्ज है। ऐसे समय में जब सपा को अक्सर मुस्लिम-यादव समीकरण की पार्टी के तौर पर देखा जाता है, राजेश अग्रवाल उस धारणा को जमीन पर चुनौती देते नजर आते हैं।
अब राजेश अग्रवाल की नजर वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव पर है। वह बरेली कैंट विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे हैं। इन दिनों वह सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक सक्रिय हैं। जरूरतमंदों की मदद, स्थानीय समस्याओं पर आंदोलन, प्रशासन के खिलाफ धरना-प्रदर्शन, ये सब उनकी राजनीति का हिस्सा रहे हैं। पिछले लगभग तीन दशकों से वह कैंट विधानसभा क्षेत्र में इसी एजेंडे पर काम कर रहे हैं। यही कारण है कि सिंबल चाहे जो भी हो, वार्ड की जनता राजेश अग्रवाल को ही चुनती रही है।
उनकी सबसे बड़ी ताकत यह मानी जाती है कि उन्होंने कभी पार्टी के सिंबल से दूरी नहीं बनाई। बदलते राजनीतिक दौर में कई नेता परिस्थितियों के हिसाब से दल बदलते रहे, लेकिन राजेश अग्रवाल ने सपा का साथ नहीं छोड़ा। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उनका भरोसा और मजबूत हुआ। उनके चुनावी मैनेजमेंट की चर्चा भी अक्सर होती है। बरेली विकास प्राधिकरण (बीडीए) की कार्यकारिणी के चुनाव में उन्होंने अपने दम पर जीत दर्ज की थी। पिछले कई वर्षों से वह बीडीए का चुनाव जीतते आ रहे हैं। यह बताता है कि उनकी पकड़ सिर्फ एक वार्ड तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक नेटवर्क पर आधारित है।
राजेश अग्रवाल को सियासत का मंझा हुआ खिलाड़ी माना जाता है। पार्टी हाईकमान में उनकी अच्छी पहुंच बताई जाती है, लेकिन उन्होंने कभी इसका सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं किया। पिछले विधानसभा चुनाव में इसका उदाहरण देखने को मिला। शहर विधानसभा सीट से सपा का टिकट पाने के लिए कई दावेदार खुलकर मैदान में थे। पोस्टर, बैनर और शक्ति प्रदर्शन का दौर चल रहा था। लेकिन राजेश अग्रवाल चुपचाप अपनी रणनीति पर काम करते रहे और आखिरकार टिकट उनके नाम हो गया। बरेली के कई नेता आज तक यह समझ नहीं पाए कि बिना शोर-शराबे के उन्होंने टिकट कैसे हासिल कर लिया।
यही वजह है कि इस बार भी कैंट विधानसभा सीट से उन्हें सपा के टिकट का प्रबल दावेदार माना जा रहा है। इस बार उनकी दावेदारी पहले से ज्यादा मजबूत दिखती है। एक तो वह लंबे समय से इसी क्षेत्र में सक्रिय हैं, दूसरे प्रचार-प्रसार के मामले में वह कई अन्य दावेदारों से आगे निकल चुके हैं। सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता, स्थानीय मुद्दों पर लगातार हस्तक्षेप और जनसंपर्क अभियान ने उन्हें चर्चा में बनाए रखा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कैंट विधानसभा सीट को उन्होंने अपना राजनीतिक कर्मक्षेत्र बना लिया है। लगभग तीन दशक से वह इसी क्षेत्र में जनसंपर्क, आंदोलन और संगठनात्मक गतिविधियों के जरिए अपनी जड़ें मजबूत करते रहे हैं। ऐसे में अगर सपा किसी ऐसे चेहरे की तलाश में है जो हिंदू समाज में भी स्वीकार्यता रखता हो और जमीनी स्तर पर सक्रिय हो, तो राजेश अग्रवाल का नाम स्वाभाविक रूप से सामने आता है।
सपा के हिन्दू नेताओं में फिलहाल उनके कद का कोई और जमीनी नेता पार्टी के पास नजर नहीं आता। वह संगठन और जनता के बीच पुल का काम करते हैं। एक तरफ पार्टी हाईकमान तक उनकी पहुंच है, तो दूसरी तरफ बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से उनका सीधा संवाद। यही संतुलन उनकी ताकत है।
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में राजेश अग्रवाल की राजनीति का मॉडल दिलचस्प है। वह वैचारिक रूप से सपा के साथ खड़े रहते हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर विकास, सेवा और संघर्ष को प्राथमिकता देते हैं। यही वजह है कि भाजपा के मजबूत माने जाने वाले इलाके में भी वह जीत दर्ज करते हैं। यह बताता है कि स्थानीय नेतृत्व और निरंतर सक्रियता कई बार बड़ी राजनीतिक लहरों को भी चुनौती दे सकती है।
अब सवाल यह है कि क्या 2027 में सपा कैंट सीट पर ऐसा ही प्रयोग करेगी? क्या पार्टी उस चेहरे पर दांव लगाएगी जिसने वर्षों तक बिना शोर के संगठन और क्षेत्र में काम किया है? अगर पार्टी को हिंदू समाज में अपनी पकड़ मजबूत करनी है और साथ ही जमीनी कार्यकर्ता को आगे बढ़ाने का संदेश देना है, तो राजेश अग्रवाल की दावेदारी को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
फिलहाल इतना तय है कि बरेली की सियासत में ‘साइकिल’ पर सवार यह अकेला हिन्दू पार्षद चेहरा अब वार्ड की सीमाओं से आगे निकलकर विधानसभा की राह देख रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी की रणनीति और स्थानीय समीकरण किस दिशा में करवट लेते हैं। लेकिन इतना जरूर है कि राजेश अग्रवाल ने अपने तीन दशक के सफर से यह साबित कर दिया है कि राजनीति में टिके रहने के लिए सिर्फ लहर नहीं, जमीन पर काम और भरोसा सबसे बड़ी पूंजी होती है।

समाजवादी पार्टी के सिंबल पर निगम चुनाव जीतने वाले एकमात्र हिन्दू नेता हैं राजेश अग्रवाल, पिछली बार खामोशी से ले आए थे शहर का टिकट, अब कैंट विधानसभा सीट फतह करने की कर रहे तैयारी




