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थाने के गेट पर आग: बरेली में डिलीवरी ब्वॉय ने किया आत्मदाह का प्रयास, सवालों के घेरे में पुलिस, सामने आईं व्यवस्था की अदृश्य दरारें, आखिर कब सुधरेंगे ‘वर्दी वाले गुंडे’?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली में एक डिलीवरी कर्मी ने थाने के गेट पर खुद पर पेट्रोल डालकर आत्मदाह का प्रयास किया। अपर पुलिस अधीक्षक (नगर क्षेत्र) मानुष पारीक ने बताया कि मंगलवार की रात करीब साढ़े 10 बजे फतेहगंज पश्चिमी नगर पंचायत क्षेत्र निवासी अक्षय कश्यप नामक कंपनी प्रतिनिधि ने थाने के गेट पर अपने ऊपर पेट्रोल डालकर आग लगा ली। पारीक ने बताया कि कश्यप को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। उन्होंने बताया कि उसका पेट, पीठ, चेहरा और हाथ बुरी तरह झुलस गए हैं मगर उसकी हालत खतरे से बाहर बताई जाती है।
इस घटना ने बरेली पुलिस को सवालों के घेरे में तो खड़ा कर ही दिया है, साथ ही व्यवस्था की अदृश्य दरारों को भी उजागर किया है। यह कोई अलग-थलग आपराधिक या भावनात्मक घटना नहीं है। यह उस धीमी, लेकिन लगातार बढ़ती हुई संस्थागत दूरी का विस्फोट है जो भारत में नागरिक और पुलिस तंत्र के बीच मौजूद है। लोकतंत्र में पुलिस स्टेशन नागरिक के लिए सबसे सुलभ न्याय संस्था माना जाता है, लेकिन जब वही जगह किसी व्यक्ति को अंतिम उम्मीद की बजाय अंतिम निराशा का मंच लगने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या घटना से बड़ी है और व्यक्ति से कहीं ज्यादा गहरी है।
इस पूरे प्रकरण की शुरुआत एक दुर्घटना से जुड़ी मोटरसाइकिल की जब्ती से हुई। कागज़ों में यह एक सामान्य प्रक्रिया है। दुर्घटना, जांच, सबूत, वाहन जब्ती — सब कुछ कानून के भीतर। लेकिन प्रशासनिक इतिहास हमें बार-बार यह सिखाता है कि व्यवस्थाएँ केवल नियमों से नहीं चलतीं, बल्कि इस बात से चलती हैं कि वे नागरिक की वास्तविक जिंदगी से कितनी जुड़ी हुई हैं। जिस मोटरसाइकिल को पुलिस एक केस की वस्तु के रूप में देख रही थी, वही वाहन उस युवक के लिए रोज़ी-रोटी की मशीन था। भारत में करोड़ों लोग औपचारिक वेतनभोगी नहीं बल्कि दैनिक आय पर निर्भर हैं। उनके लिए काम रुकना केवल असुविधा नहीं, अस्तित्व का संकट होता है।
यहीं भारतीय पुलिस मॉडल की पहली गहरी समस्या सामने आती है — कानूनी प्रक्रिया का सामाजिक प्रभाव समझने की संस्थागत कमी। पुलिस प्रशिक्षण नियम लागू करना सिखाता है, लेकिन नियम लागू होने से किसी की आर्थिक धुरी टूट जाए, इस संवेदनशीलता का औपचारिक प्रशिक्षण लगभग नहीं के बराबर है। परिणाम यह होता है कि कागज़ पर सही निर्णय, जमीन पर विनाशकारी प्रभाव पैदा कर देता है।
इस घटना को केवल संवेदनशीलता की कमी कह देना भी अधूरा होगा। असली संकट प्रशासनिक संवाद संरचना का है। भारतीय थानों में आज भी नागरिक को केस की स्थिति लिखित रूप में देने की बाध्यता नहीं है। सूचना मौखिक रहती है, और मौखिक सूचना प्रशासनिक अनिश्चितता पैदा करती है। जब किसी व्यक्ति को बार-बार यह कहा जाए कि “देखेंगे”, “प्रक्रिया चल रही है”, “शिकायत होगी तो कोर्ट से छुड़वाओ”, तो तकनीकी रूप से पुलिस सही हो सकती है, लेकिन नागरिक के लिए यह जवाब शून्य के बराबर होता है। क्योंकि उसे समय नहीं बताया गया, विकल्प नहीं बताया गया, और यह भी नहीं बताया गया कि उसकी आर्थिक स्थिति को देखते हुए क्या कोई अंतरिम समाधान संभव है।
प्रशासनिक मनोविज्ञान का एक स्थापित सिद्धांत है कि अनिश्चितता, समस्या से ज्यादा खतरनाक होती है। व्यक्ति गरीबी झेल सकता है, नुकसान झेल सकता है, लेकिन अनिश्चित इंतजार अक्सर मानसिक टूटन में बदल जाता है। यही अनिश्चितता इस घटना की असली जड़ लगती है।
भारत की पुलिस संरचना अभी भी औपनिवेशिक प्रशासनिक ढांचे की विरासत ढो रही है, जिसका मूल उद्देश्य जनता की सेवा नहीं बल्कि नियंत्रण था। इस ढांचे में नागरिक “स्टेकहोल्डर” नहीं बल्कि “सब्जेक्ट” माना जाता था। आज संविधान बदल चुका है, लोकतंत्र परिपक्व हो चुका है, लेकिन थानों की प्रशासनिक संस्कृति कई जगह उसी मानसिकता में अटकी दिखती है। इसीलिए नागरिक को समाधान नहीं, प्रक्रिया सुनाई जाती है; सहानुभूति नहीं, औपचारिकता मिलती है।
इस घटना का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम आर्थिक न्याय से जुड़ा है। भारतीय आपराधिक प्रक्रिया में वाहन जब्ती को अक्सर केवल सबूत सुरक्षा के नजरिये से देखा जाता है। लेकिन आधुनिक न्यायशास्त्र में “प्रोपोर्शनैलिटी” यानी अनुपातिकता का सिद्धांत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका मतलब है कि राज्य की कार्रवाई अपराध की जांच के लिए जरूरी हो, लेकिन उससे नागरिक पर अनावश्यक असंगत नुकसान न हो। यदि किसी दुर्घटना में शामिल वाहन को महीनों थाने में खड़ा रखने से एक गरीब व्यक्ति की आय पूरी तरह बंद हो जाए, तो यह कानूनी रूप से सही होते हुए भी सामाजिक न्याय की कसौटी पर सवाल खड़ा करता है।
दुनिया के कई देशों में अब डिजिटल एविडेंस मॉडल अपनाया जा चुका है, जहाँ वाहन की विस्तृत फोटो, वीडियो, मैकेनिकल रिपोर्ट और जीपीएस रिकॉर्ड लेकर उसे सशर्त छोड़ दिया जाता है। इससे जांच भी सुरक्षित रहती है और नागरिक की आजीविका भी नहीं रुकती। भारत में यह तकनीकी रूप से पूरी तरह संभव है, लेकिन संस्थागत जड़ता और प्रक्रिया-प्रधान सोच इसे व्यापक रूप से लागू होने से रोकती है।
इस पूरे मामले का तीसरा और शायद सबसे गंभीर पहलू पुलिस-जन विश्वास का संकट है। किसी व्यक्ति का थाने के सामने आत्मदाह का प्रयास करना केवल न्याय पाने का प्रयास नहीं होता, बल्कि यह एक सार्वजनिक संदेश होता है कि उसकी आवाज कहीं भी नहीं सुनी जा रही। यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए सबसे खतरनाक संकेतों में से एक है। राज्य की शक्ति कानून से आती है, लेकिन उसकी वैधता जनता के भरोसे से आती है। जब भरोसा टूटता है, तो कानून की मौजूदगी भी व्यवस्था को स्थिर नहीं रख पाती।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि घटना के बाद पुलिसकर्मियों ने तुरंत आग बुझाई और अस्पताल पहुँचाया। इसका मतलब है कि व्यक्तिगत स्तर पर मानवीय प्रतिक्रिया मौजूद थी। लेकिन आधुनिक प्रशासन की कसौटी व्यक्तिगत संवेदनशीलता नहीं, संस्थागत संवेदनशीलता होती है। सवाल यह नहीं कि संकट के बाद क्या किया गया; सवाल यह है कि संकट बनने से पहले क्या रोका गया।
भारत में पुलिस सुधार की बहस अक्सर संसाधनों पर अटक जाती है — ज्यादा पुलिस, बेहतर हथियार, आधुनिक वाहन, डिजिटल कंट्रोल रूम। लेकिन बरेली जैसी घटनाएँ बताती हैं कि सबसे बड़ा सुधार संसाधनों में नहीं, प्रक्रिया में है। यदि हर जब्ती के साथ अनिवार्य लिखित स्टेटस दिया जाए, यदि हर नागरिक आवेदन का डिजिटल ट्रैकिंग नंबर हो, यदि जीविका प्रभावित मामलों के लिए प्राथमिक सुनवाई तंत्र बने, तो बिना एक भी अतिरिक्त पुलिसकर्मी भर्ती किए व्यवस्था का चेहरा बदल सकता है।
इस घटना को प्रशासनिक भाषा में “लो-इंटेंसिटी ट्रिगर, हाई-इंटेंसिटी आउटकम” कहा जा सकता है — छोटा विवाद, लेकिन विस्फोटक परिणाम। यही वे घटनाएं होती हैं जो बताती हैं कि सिस्टम की शुरुआती प्रतिक्रिया कितनी कमजोर थी। बड़े अपराधों में व्यवस्था की परीक्षा नहीं होती; असली परीक्षा ऐसे छोटे मामलों में होती है जहाँ एक साधारण नागरिक थाने के दरवाजे पर खड़ा होता है।
अंततः बरेली की यह घटना पुलिस के लिए आलोचना से ज्यादा चेतावनी है। यह याद दिलाती है कि कानून की ताकत उसकी सख्ती में नहीं, उसकी पारदर्शिता में होती है। और प्रशासन की असली सफलता अपराध कम करने में नहीं, बल्कि नागरिक को चरम कदम उठाने से रोकने में होती है।
क्योंकि लोकतंत्र में न्याय केवल अदालत के फैसले से नहीं बनता; न्याय उस क्षण से बनना शुरू हो जाता है जब कोई नागरिक पहली बार थाने के दरवाजे पर दस्तक देता है। यदि उस दस्तक का जवाब समय, सम्मान और स्पष्टता से मिले, तो आग कभी नहीं लगती — न शरीर में, न व्यवस्था में।

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