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जमीनी नेटवर्क और बहुजातीय समर्थन, मुस्लिम-जाटव-यादव समीकरण के सहारे टिकट की महाभारत जीतने की तैयारी कर रहे पूर्व ब्लॉक प्रमुख और वरिष्ठ सपा नेता चंद्रसेन सागर, जानिए क्या कहते हैं सियासी समीकरण?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की फरीदपुर विधानसभा सीट पर चुनावी हलचल धीरे-धीरे तेज हो रही है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए सभी राजनीतिक दल संभावित उम्मीदवारों का आकलन कर रहे हैं। इसी बीच समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर का नाम इस सीट से पार्टी टिकट के सबसे प्रबल दावेदार के रूप में तेजी से उभरकर सामने आ रहा है। स्थानीय राजनीतिक समीकरण, जातीय संतुलन और संगठन में सक्रियता को देखते हुए पार्टी के अंदर तथा कार्यकर्ताओं के बीच उनकी दावेदारी मजबूत मानी जा रही है।
फरीदपुर सीट अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित है और यहां का चुनावी गणित पूरी तरह सामाजिक संरचना पर टिका रहता है। स्थानीय चुनावी आकलनों के मुताबिक इस सीट पर दलित मतदाता लगभग 34 से 38 प्रतिशत के आसपास माने जाते हैं। इनमें जाटव समुदाय अकेले करीब 18 से 20 प्रतिशत तक माना जाता है, जबकि धोबी, पासी, वाल्मीकि और अन्य दलित समूह मिलाकर करीब 14 से 18 प्रतिशत के आसपास बैठते हैं। यही कारण है कि किसी भी उम्मीदवार के लिए दलित आधार मजबूत होना सबसे पहली शर्त माना जाता है।
इसके बाद ओबीसी मतदाता लगभग 32 से 36 प्रतिशत के बीच माने जाते हैं। इनमें कश्यप, निषाद, मौर्य, शाक्य, लोधी, कुर्मी और यादव समुदाय प्रमुख हैं। यादव वोट अकेले लगभग 5 से 6 प्रतिशत, कश्यप-निषाद समूह लगभग 6 से 7 प्रतिशत और अन्य पिछड़े वर्ग मिलाकर बड़ी निर्णायक संख्या बनाते हैं। मुस्लिम मतदाता भी करीब 16 से 18 प्रतिशत तक माने जाते हैं, जबकि सवर्ण समुदाय लगभग 9 से 11 प्रतिशत के बीच रहता है।
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि इस सीट पर जीत का फॉर्मूला अक्सर “मजबूत दलित आधार + मुस्लिम समर्थन + चुनिंदा ओबीसी वोट” से बनता है। जो उम्मीदवार जाटव, मुस्लिम और ओबीसी के किसी बड़े हिस्से को साथ जोड़ लेता है, उसकी स्थिति काफी मजबूत हो जाती है।
यही वह बिंदु है जहां चंद्रसेन सागर की दावेदारी बाकी नेताओं से अलग नजर आती है। स्थानीय स्तर पर उन्हें लंबे समय से सक्रिय नेता माना जाता है और ब्लॉक प्रमुख रहने के दौरान उन्होंने गांव-गांव में संगठनात्मक नेटवर्क तैयार किया। बताया जाता है कि उनके संपर्क केवल एक जाति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मुस्लिम, जाटव, यादव, साहू, निषाद, कश्यप और धोबी समाज में भी उनका जनसंपर्क मजबूत है।
स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि जाटव समाज, जो इस सीट का सबसे निर्णायक वोट बैंक माना जाता है, उसमें सागर की स्वीकार्यता खास तौर पर इसलिए अच्छी बताई जाती है क्योंकि वे खुद इसी समाज से आते हैं। उनके परिवार की राजनीतिक पहचान भी पुरानी बताई जाती है और उनके बड़े भाई स्वर्गीय सियाराम सागर कई बार इसी सीट से विधायक रह चुके थे। पंचायत स्तर की बैठकों, सामाजिक कार्यक्रमों और स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता ने उन्हें इस समाज में मजबूत पहचान दी है।
धोबी समाज के बीच भी उनका प्रभाव बताया जाता है। समर्थकों के अनुसार उन्होंने रोजगार, प्रमाणपत्र, स्थानीय योजनाओं और सामाजिक मदद से जुड़े मामलों में इस समाज के लोगों की मदद की। हाल के महीनों में वे धोबी समाज के पारिवारिक समारोहों, खासकर बेटियों की शादियों में शामिल होते दिखाई दिए। कई जगह वे बिना औपचारिक निमंत्रण के भी पहुंचकर परिवारों को सहयोग और आशीर्वाद देते रहे। इससे इस समाज के साथ उनका भावनात्मक संबंध और मजबूत हुआ बताया जा रहा है।
मुस्लिम मतदाताओं के बीच भी उनकी स्वीकार्यता को मजबूत माना जा रहा है। मुस्लिम समाज पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी का अहम वोट बैंक माना जाता है और व्यक्तिगत स्तर पर भी सागर के रिश्ते इस समाज से बेहतर बताए जाते हैं। कस्बाई और ग्रामीण इलाकों में धार्मिक-सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी और स्थानीय समस्याओं पर हस्तक्षेप ने उन्हें इस वर्ग में पहचान दिलाई है।
यादव वोट बैंक भी इस सीट पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह वर्ग पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ा माना जाता है और संगठन के पुराने कार्यकर्ता होने के कारण इस वर्ग में भी सागर को समर्थन मिलने की संभावना जताई जा रही है। इसके अलावा कश्यप समाज, जो कई गांवों में प्रभावशाली है और करीब 6-7 प्रतिशत माना जाता है, वहां भी उनके पुराने राजनीतिक संबंध बताए जाते हैं।
इसी वजह से स्थानीय चर्चा यह है कि जाटव (18-20%), मुस्लिम (16-18%), यादव (5-6%), कश्यप-निषाद (6-7%) और धोबी सहित अन्य दलित वोटों के हिस्से को जोड़ने की क्षमता फिलहाल किसी दूसरे दावेदार में इतनी मजबूत नहीं दिखती। यही सामाजिक संतुलन उन्हें टिकट की दौड़ में आगे ले जाता दिख रहा है।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि टिकट वितरण में केवल जातीय गणित ही नहीं, बल्कि संगठनात्मक सक्रियता, चुनाव लड़ने की तैयारी, संसाधन जुटाने की क्षमता और स्थानीय पहचान भी देखी जाती है। इन मानकों पर भी सागर को मजबूत माना जा रहा है। वे लंबे समय से क्षेत्र में सक्रिय हैं, कार्यकर्ताओं से लगातार संपर्क में रहते हैं और स्थानीय मुद्दों पर खुलकर बोलते रहे हैं।
फरीदपुर सीट का चुनावी इतिहास भी बताता है कि यहां बाहरी या कमजोर संगठन वाले उम्मीदवार अक्सर संघर्ष करते हैं। गांवों में व्यक्तिगत संपर्क, पंचायत स्तर की पकड़ और बूथ मैनेजमेंट यहां जीत का बड़ा आधार बनता है। सागर के समर्थकों का दावा है कि उनके पास बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क मौजूद है, जो चुनाव के समय बड़ा फायदा दे सकता है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि टिकट के कई दावेदार जरूर हो सकते हैं, लेकिन सामाजिक समर्थन और संगठनात्मक पकड़ के मामले में फिलहाल चंद्रसेन सागर का पलड़ा भारी दिखाई देता है। हालांकि अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व को ही लेना है और चुनाव नजदीक आने पर समीकरण बदल भी सकते हैं।
कुल मिलाकर, फरीदपुर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के संभावित उम्मीदवारों की दौड़ में चंद्रसेन सागर फिलहाल सबसे आगे नजर आ रहे हैं। मजबूत दलित आधार, मुस्लिम समर्थन की संभावना, यादव और कश्यप समाज से संपर्क तथा लंबे समय की संगठनात्मक सक्रियता उन्हें टिकट की दौड़ में सबसे प्रबल दावेदार बनाती दिख रही है। आने वाले समय में पार्टी नेतृत्व का फैसला चाहे जो हो, फिलहाल क्षेत्र की राजनीति में चर्चा का केंद्र वही बने हुए हैं।

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