नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की कैंट विधानसभा सीट पर जैसे-जैसे चुनावी सरगर्मी बढ़ रही है, वैसे-वैसे संभावित उम्मीदवारों की सक्रियता भी तेज होती जा रही है। समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रत्याशी और इस बार भी टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे राजेश अग्रवाल इन दिनों खास तौर पर चर्चा में हैं। उनकी राजनीतिक शैली, जो खुद को जाति की सीमाओं से परे बताती है, इस सीट के पारंपरिक समीकरणों को चुनौती देती नजर आ रही है।
एक विशेष बातचीत में राजेश अग्रवाल ने साफ शब्दों में कहा कि वे खुद को किसी एक जाति का नेता नहीं मानते। उनका कहना है कि उनकी राजनीति का आधार काम है, न कि जातीय पहचान। वह जनता के काम करते हैं और उसी को अपनी ताकत मानते हैं। उन्होंने कहा, “मैं जाति की राजनीति नहीं करता हूं और मेरी छवि भी जाति विशेष के नेता की नहीं है। मैं हर वर्ग, हर जाति और हर धर्म के लोगों के लिए काम करता हूं और यही मेरी सबसे बड़ी ताकत है। रही बात वैश्य समाज के वोट हासिल करने की तो आपको बता दूं कि मैं एक व्यापारी हूं और कई व्यापार संगठनों में अहम जिम्मेदारी निभा रहा हूं। मैं सिर्फ औपचारिक रूप से व्यापारियों की लड़ाई नहीं लड़ता बल्कि सड़क पर उतरकर उनके लिए आंदोलन करता हूं जो आज से नहीं पिछले लंबे समय से चलते आ रहे हैं।’”
दरअसल, कैंट विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी का लंबे समय से मजबूत आधार रहा है और यहां हमेशा से वैश्य समाज से उम्मीदवार उतारने की परंपरा भी देखी जाती रही है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर समाजवादी पार्टी राजेश अग्रवाल को मैदान में उतारती है, तो क्या वे वैश्य वोटों में सेंध लगा पाएंगे। इस सवाल पर उन्होंने बिना किसी हिचक के जवाब दिया कि उनकी पहचान केवल एक व्यापारी या किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि वे व्यापक समाज के प्रतिनिधि के तौर पर काम करते हैं।
उन्होंने बताया कि वे व्यापारियों के मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरकर आंदोलन भी करते रहे हैं। उनका कहना है कि यह सिलसिला कोई नया नहीं है, बल्कि लंबे समय से वे व्यापारी वर्ग की समस्याओं को लेकर सक्रिय रहे हैं। यही वजह है कि व्यापारियों के बीच उनकी एक अलग पहचान बनी हुई है।
राजेश अग्रवाल ने यह भी स्पष्ट किया कि वे सिर्फ वैश्य समाज तक सीमित नहीं हैं। अन्य समुदायों के कार्यक्रमों में भी बराबर भागीदारी निभाते हैं। उन्होंने कहा कि वे पंजाबियों के आयोजनों में भी शामिल होते हैं और दलित समाज के कार्यक्रमों में भी उतनी ही सक्रियता से भाग लेते हैं। उनके अनुसार, यही उनकी राजनीति की असली पहचान है—हर वर्ग के बीच पहुंच और संवाद।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से अहम भूमिका निभाते रहे हैं। खासकर विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों का चयन भी कई बार जातीय गणित को ध्यान में रखकर किया जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह भी देखा गया है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले और सभी वर्गों से संपर्क रखने वाले नेताओं को भी जनता का समर्थन मिलता है, चाहे वे किसी भी जाति से आते हों।
कैंट सीट के संदर्भ में देखें तो यहां शहरी और अर्ध-शहरी मतदाताओं का बड़ा वर्ग है, जिसमें व्यापारी, मध्यम वर्ग, कर्मचारी और विभिन्न जातियों के लोग शामिल हैं। ऐसे में कोई भी उम्मीदवार अगर खुद को केवल एक जाति तक सीमित रखता है तो उसकी पहुंच सीमित हो सकती है। शायद यही वजह है कि राजेश अग्रवाल खुद को एक समावेशी नेता के तौर पर पेश कर रहे हैं।
उनकी रणनीति साफ नजर आती है—वे हर समुदाय के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। छोटे-छोटे सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में भागीदारी, व्यापारियों के मुद्दों पर सक्रियता और विभिन्न वर्गों के साथ लगातार संवाद उन्हें एक व्यापक जनाधार बनाने में मदद कर रहा है। हालांकि, यह भी सच है कि चुनावी मैदान में उतरने के बाद असली परीक्षा होती है, जहां समर्थन को वोट में बदलना सबसे बड़ी चुनौती होती है।
राजेश अग्रवाल के दावे अपनी जगह मजबूत हैं, लेकिन यह भी देखना होगा कि समाजवादी पार्टी उन्हें टिकट देती है या नहीं। अगर उन्हें मौका मिलता है, तो उनकी यह ‘सबको साथ लेकर चलने’ वाली राजनीति भाजपा के पारंपरिक समीकरणों को कितनी चुनौती दे पाएगी, यह आने वाला समय ही बताएगा।
फिलहाल, कैंट विधानसभा सीट पर एक बात साफ है—यहां मुकाबला केवल जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि विकास, पहुंच और व्यक्तिगत छवि भी अहम भूमिका निभाएंगे। और इसी मोर्चे पर राजेश अग्रवाल खुद को मजबूत दावेदार के रूप में पेश कर रहे हैं।

‘मैं जाति की राजनीति नहीं करता और मेरी छवि जाति वाले नेता की नहीं हैं, मैं हर वर्ग के काम करता हूं और यही मेरी ताकत है’, पढ़ें कैंट विधानसभा सीट से सपा के टिकट के प्रबल दावेदार और पूर्व प्रत्याशी राजेश अग्रवाल से विशेष बातचीत?




