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धीरे-धीरे भाजपा के वोटों में सेंध लगा रहे सपा नेता डॉ. जीराज सिंह यादव, ठाकुरों को जोड़ने की कवायद में जुटे, जानिये कैसे

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली जिले की आंवला विधानसभा सीट पर इस बार सियासी हलचल कुछ अलग ही नजर आ रही है। समाजवादी पार्टी के नेता डॉ. जीराज सिंह यादव धीरे-धीरे अपने राजनीतिक कदम इस तरह बढ़ा रहे हैं कि उनका असर सीधे भारतीय जनता पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ता दिख रहा है। खास तौर पर ठाकुर बिरादरी के बीच उनकी बढ़ती सक्रियता ने स्थानीय राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं।
डॉ. जीराज सिंह यादव को आंवला सीट से सपा का मजबूत दावेदार माना जा रहा है और वे इस दावे को जमीन पर मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। पहले जहां उनका फोकस पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण पर था, वहीं अब उन्होंने अपनी रणनीति को और व्यापक बनाते हुए ठाकुर समाज की ओर भी कदम बढ़ा दिए हैं। यही वजह है कि हाल के दिनों में उनकी मौजूदगी उन आयोजनों में भी बढ़ी है, जो पारंपरिक रूप से भाजपा के प्रभाव वाले माने जाते रहे हैं।


मंगलवार रात को ग्राम पंचायत पिपरिया उपराला में आयोजित श्री सुंदरकांड पाठ में उनकी मौजूदगी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। यह आयोजन अनिल ठाकुर की ओर से किया गया था। पहली नजर में यह एक सामान्य धार्मिक कार्यक्रम लगता है, लेकिन स्थानीय राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि ऐसे आयोजनों में नेताओं की भागीदारी का सीधा संबंध जनसंपर्क और सामाजिक स्वीकार्यता से होता है। डॉ. जीराज सिंह यादव ने वहां पहुंचकर न सिर्फ प्रसाद ग्रहण किया, बल्कि लोगों से घुल-मिलकर बातचीत भी की, जिससे उनका जुड़ाव और मजबूत होता दिखा।
दरअसल, आंवला विधानसभा सीट पर ठाकुर वोटों का खासा प्रभाव है। यह बिरादरी लंबे समय से भाजपा का मजबूत आधार मानी जाती रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी ठाकुर बहुल इलाकों में भाजपा को अच्छी बढ़त मिली थी और उसके उम्मीदवार धर्मपाल सिंह सैनी ने जीत दर्ज की थी, जबकि समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आरके शर्मा को हार का सामना करना पड़ा था। ऐसे में यह साफ है कि अगर सपा को इस सीट पर मजबूत चुनौती पेश करनी है, तो उसे पीडीए के साथ ही ठाकुर वोटों में सेंध लगानी ही होगी।


यही बात डॉ. जीराज सिंह यादव भी अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए वे बड़े मंचों के बजाय छोटे-छोटे आयोजनों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। गांवों में होने वाले धार्मिक कार्यक्रम, सामाजिक बैठकों और स्थानीय आयोजनों में उनकी लगातार मौजूदगी उन्हें लोगों के करीब ला रही है। खास बात यह है कि ठाकुर बिरादरी के लोग भी उन्हें नजरअंदाज नहीं कर रहे, बल्कि कई जगहों पर उनका स्वागत होता दिख रहा है। यह संकेत देता है कि उनकी कोशिशें पूरी तरह सफल हो रही हैं।
हालांकि राजनीति में केवल मौजूदगी या स्वागत ही जीत की गारंटी नहीं होती। असली चुनौती यह है कि इस बढ़ते संपर्क को वोटों में कैसे बदला जाए। क्योंकि चुनाव के समय अक्सर जातीय और राजनीतिक वफादारियां फिर से सक्रिय हो जाती हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि जो समर्थन अभी सामाजिक स्तर पर दिख रहा है, क्या वह मतदान के दिन भी कायम रह पाएगा।


डॉ. जीराज सिंह यादव की रणनीति का एक और पहलू यह है कि वे किसी एक वर्ग तक खुद को सीमित नहीं रख रहे। पीडीए के पारंपरिक आधार को मजबूत करते हुए वे सवर्ण समाज, खासकर ठाकुरों को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। यह एक संतुलित रणनीति मानी जा रही है, क्योंकि इससे वे एक व्यापक सामाजिक गठजोड़ तैयार करने की दिशा में बढ़ रहे हैं।
वहीं भाजपा के लिए यह एक चेतावनी भी हो सकती है। अगर उसके पारंपरिक वोट बैंक में इस तरह की हलचल बढ़ती है, तो आने वाले चुनाव में मुकाबला पहले से ज्यादा कड़ा हो सकता है। खास तौर पर तब, जब विपक्षी उम्मीदवार जमीनी स्तर पर लगातार सक्रिय रहे और लोगों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करता रहे।


फिलहाल आंवला की राजनीति में डॉ. जीराज सिंह यादव की सक्रियता चर्चा का विषय बनी हुई है। वे धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी को हर वर्ग में दर्ज करा रहे हैं और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनती जा रही है। लेकिन अंतिम फैसला तो चुनाव के दिन ही होगा, जब यह साफ हो पाएगा कि उनकी यह रणनीति कितनी कारगर साबित हुई और क्या वे सच में भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब हो पाए या नहीं। हालांकि, उससे पहले सबसे बड़ी लड़ाई उन्हें अपनी ही पार्टी के लोगों से लड़नी है और वह लड़ाई है टिकट की जिसका फैसला सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव को करना है।

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