नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली शहर की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प और अलग तरह की हलचल देखने को मिल रही है। जहां आमतौर पर चुनावी तैयारियों का मतलब बड़े-बड़े होर्डिंग, रैलियां, फोटो सेशन और भीड़ जुटाने से लगाया जाता है, वहीं भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ पार्षद और शहर विधानसभा सीट से प्रबल दावेदार माने जा रहे सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ ‘मम्मा’ ने इस परंपरा को पूरी तरह बदल दिया है। उन्होंने चुनावी मैदान में उतरने से पहले एक ऐसी रणनीति अपनाई है, जिसमें न तो शोर-शराबा है और न ही दिखावे की राजनीति, बल्कि पूरी तरह से जमीनी स्तर पर लोगों से सीधा संवाद है।
पिछले करीब पांच महीनों से मम्मा लगातार शहर विधानसभा क्षेत्र के अलग-अलग मोहल्लों में जाकर बेहद सीमित और शांत तरीके से चुनावी पंचायत कर रहे हैं। उनका तरीका भी अनोखा है- हर दिन वह किसी एक मोहल्ले के पांच प्रबुद्ध लोगों के घर पहुंचते हैं, वहां बैठकर बातचीत करते हैं और उस इलाके की समस्याओं को गहराई से समझते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में न तो मीडिया को बुलाया जाता है और न ही कोई फोटो या वीडियो बनवाया जाता है। यह एक ऐसा अभियान है, जो पूरी तरह से विश्वास और व्यक्तिगत संपर्क पर आधारित है।
दरअसल, शहर विधानसभा सीट की राजनीति इस बार कई कारणों से खास हो गई है। मौजूदा विधायक और मंत्री अरुण कुमार सक्सेना की उम्र 75 वर्ष से अधिक हो चुकी है। ऐसे में यह कयास लगाए जा रहे हैं कि पार्टी इस बार नए चेहरे को मौका दे सकती है क्योंकि बरेली के पूर्व सांसद संतोष गंगवार का टिकट भी इसी उम्र सीमा के आधार पर काटा गया था। हालांकि, अरुण कुमार सक्सेना खुद भी इस सीट से टिकट के दावेदार हैं, लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच नए चेहरों की संभावनाएं भी मजबूत होती दिख रही हैं।
इस सीट की एक खास बात यह भी है कि यहां परंपरागत रूप से कायस्थ समाज का उम्मीदवार ही उतारा जाता रहा है। इसी वजह से सतीश कातिब मम्मा की दावेदारी स्वाभाविक रूप से मजबूत मानी जा रही है। लंबे समय से राजनीति में सक्रिय रहने और संगठन के भीतर मजबूत पकड़ रखने के कारण भी वह एक प्रभावशाली दावेदार के रूप में उभर रहे हैं।
मम्मा का चुनावी अभियान जितना सादा दिखता है, उतना ही प्रभावी भी माना जा रहा है। वह रोज सुबह करीब 6 बजे अपनी स्कूटी लेकर अकेले ही निकल पड़ते हैं। किसी भी तरह का काफिला या समर्थकों की भीड़ उनके साथ नहीं होती। वह सीधे उन लोगों के घर पहुंचते हैं, जिनसे उन्होंने पहले फोन पर संपर्क किया होता है। वहां बैठकर वह स्थानीय समस्याओं जैसे पानी, सड़क, बिजली, सफाई और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करते हैं।
इन बैठकों में सिर्फ समस्याओं को सुनना ही नहीं होता, बल्कि समाधान के रास्तों पर भी बातचीत होती है। साथ ही मम्मा अपनी चुनावी रणनीति को लेकर भी लोगों की राय लेते हैं। इस तरह वह न सिर्फ अपनी छवि को मजबूत कर रहे हैं, बल्कि एक ऐसा नेटवर्क भी तैयार कर रहे हैं, जो चुनाव के समय उनके लिए मजबूत आधार बन सकता है।
पिछले पांच महीनों में मम्मा शहर विधानसभा क्षेत्र के करीब 30 प्रतिशत हिस्से को कवर कर चुके हैं। बानखाना, चाहबाई, रहपुरा चौधरी, राजेंद्र नगर जैसे कई प्रमुख इलाकों में वह अपनी पहुंच बना चुके हैं। इस दौरान उन्होंने सैकड़ों परिवारों से सीधे संपर्क स्थापित किया है। यह संपर्क सिर्फ औपचारिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर भरोसे का रिश्ता बनाने वाला है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह का अभियान आमतौर पर कम ही देखने को मिलता है। जहां दूसरे दावेदार बड़े कार्यक्रमों और प्रचार पर ध्यान दे रहे हैं, वहीं मम्मा का फोकस पूरी तरह से ‘माइक्रो लेवल’ पर है। यही वजह है कि उनका यह अभियान बाकी दावेदारों से अलग नजर आता है।
हालांकि, मम्मा यह भी अच्छी तरह समझते हैं कि सिर्फ जमीनी स्तर पर मजबूत पकड़ बना लेना ही काफी नहीं है। भारतीय राजनीति में पार्टी का टिकट मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने संगठन के उच्च स्तर पर भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। वह लखनऊ से लेकर दिल्ली तक पार्टी के बड़े नेताओं से लगातार संपर्क में हैं और अपनी दावेदारी को मजबूती से पेश कर रहे हैं।
उनका लंबा राजनीतिक अनुभव भी उनके पक्ष में जाता है। वर्षों से संगठन में सक्रिय रहने के कारण उन्हें पार्टी की कार्यप्रणाली और चुनावी रणनीतियों की अच्छी समझ है। यही कारण है कि उनके विरोधी दावेदार भी उन्हें हल्के में लेने की गलती नहीं कर रहे हैं। कई दावेदारों के बीच मम्मा की मजबूत जमीनी पकड़ और अनुभव उन्हें एक अलग पहचान दिला रहा है।
इस पूरी रणनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि मम्मा अपने अभियान को पूरी तरह से ‘लो प्रोफाइल’ रख रहे हैं। वह जानते हैं कि ज्यादा प्रचार कभी-कभी उल्टा भी पड़ सकता है। इसलिए उन्होंने अपनी मेहनत को चुपचाप जारी रखने का रास्ता चुना है। उनका मानना है कि असली ताकत लोगों के दिल में जगह बनाने से आती है, न कि सिर्फ पोस्टर और बैनर लगाने से। हालांकि, वह इसमें भी पीछे नहीं हैं।
बहरहाल, विधानसभा चुनाव में अभी करीब 10 महीने का समय बाकी है। इस दौरान राजनीतिक समीकरण कई बार बदल सकते हैं। टिकट वितरण से लेकर गठबंधनों तक, हर स्तर पर नए मोड़ आ सकते हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि मम्मा की यह खामोश रणनीति उन्हें कितना आगे ले जाती है।
एक बात साफ है कि आज की राजनीति में सिर्फ भीड़ जुटाना ही काफी नहीं है, बल्कि मतदाताओं के साथ सीधा संवाद और विश्वास बनाना भी उतना ही जरूरी हो गया है। सतीश कातिब मम्मा इसी रास्ते पर चलते नजर आ रहे हैं। अब यह आने वाला वक्त ही बताएगा कि उनकी यह ‘खामोश मेहनत’ चुनावी शोर में कितना असर दिखा पाती है।

खामोशी से बिछती चुनावी बिसात, न शोर-शराबा, न कोई दिखावा, 5 महीने से शहर विधानसभा सीट के 5 घरों में 5-5 प्रबुद्धजनों के साथ चुनावी पंचायत कर रहे भाजपा नेता सतीश कातिब मम्मा, महासंग्राम से पहले कर रहे बड़ी तैयारी




