नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की फरीदपुर विधानसभा सीट पर इस बार सियासी हलचल कुछ अलग ही दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है। यहां समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर एक ऐसे समीकरण को मजबूत करने में जुटे हैं, जो आने वाले चुनाव में निर्णायक साबित हो सकता है। लंबे समय से सपा की राजनीति का आधार माने जाने वाले एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण को अब एक नए रूप- एम-वाई-डी (मुस्लिम-यादव-दलित) में ढालने की कोशिश तेज हो गई है। बता दें कि फरीदपुर विधानसभा सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग 60,000 से 80,000 (करीब 18–22%) है। दलित मतदाता लगभग 70,000 से 90,000 (करीब 22–26%) और यादव मतदाता लगभग 40,000 से 55,000 (करीब 12–16%) हैं। ऐसे में जो पार्टी इन तीन वर्गों को साध लेती है, वही जीत का परचम लहराती है। पार्टी ने भी इसी आधार पर पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का नारा दिया है। लेकिन अखिलेश यादव ने इसमें ए से अल्पसंख्यकों के साथ ही ए से अगड़ों (शोषित) को भी जोड़ दिया है।
चंद्रसेन सागर की इस कोशिश की झलक ईद-उल-फितर के मौके पर साफ तौर पर देखने को मिली, जब चंद्रसेन सागर ने फरीदपुर क्षेत्र के लगभग आधा दर्जन से अधिक गांवों में जाकर मुस्लिम समुदाय के बीच समय बिताया, उन्हें गले लगाया और त्योहार की खुशियां साझा कीं।
ईद के दिन चंद्रसेन सागर ने जिस तरह से गांव-गांव जाकर लोगों से मुलाकात की, वह सिर्फ एक औपचारिक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव की कोशिश भी थी। उन्होंने ग्राम बाहनपुर, नौगवां, गौसगंज, मझौआ, टिसुआ और फतेहगंज पूर्वी जैसे इलाकों में घर-घर जाकर लोगों को ईद की मुबारकबाद दी। इन गांवों में बड़ी संख्या में मुस्लिम मतदाता रहते हैं और पारंपरिक रूप से यह तबका समाजवादी पार्टी का समर्थक माना जाता है। हालांकि, कई बार उम्मीदवार की पसंद के आधार पर यही वोटर अन्य दलों या निर्दलीय उम्मीदवारों की ओर भी रुख कर लेते हैं। ऐसे में चंद्रसेन सागर का यह प्रयास इन मतदाताओं को फिर से मजबूती के साथ जोड़ने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
ईद के मौके पर जब एक हिंदू नेता मुस्लिम समुदाय के बीच पहुंचकर उन्हें गले लगाता है और उनके साथ बैठकर खुशियां बांटता है, तो उसका असर सिर्फ उस दिन तक सीमित नहीं रहता। यह एक संदेश देता है- आपसी भरोसे और साझी संस्कृति का। यही कारण था कि जिन गांवों में चंद्रसेन सागर पहुंचे, वहां लोगों के चेहरों पर खुशी साफ झलक रही थी। कई बुजुर्गों और युवाओं ने उन्हें खुले दिल से अपनाया। यह दृश्य केवल एक त्योहार का नहीं, बल्कि बदलते सियासी समीकरणों का भी संकेत दे रहा था।
दरअसल, समाजवादी पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक मुस्लिम और यादव समुदाय पर आधारित रहा है। लेकिन बदलते राजनीतिक परिदृश्य में सिर्फ इस समीकरण के भरोसे जीत हासिल करना आसान नहीं रह गया है। खासतौर पर उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में दलित वोट निर्णायक भूमिका निभाने लगे हैं। ऐसे में सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने पुराने आधार को बनाए रखते हुए नए वर्गों को भी अपने साथ जोड़े। फरीदपुर सीट पर चंद्रसेन सागर इसी रणनीति पर काम करते नजर आ रहे हैं।
चंद्रसेन सागर की खास बात यह है कि उनकी छवि एक सरल, सहज और विवादों से दूर रहने वाले नेता की है। वह खुद दलित समाज से आते हैं, लेकिन उनकी स्वीकार्यता सिर्फ एक वर्ग तक सीमित नहीं है। यादव समुदाय में भी उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है और मुस्लिम समाज में भी उनके व्यक्तिगत संबंध काफी मजबूत बताए जाते हैं। यही वजह है कि वह इन तीनों वर्गों- मुस्लिम, यादव और दलित को एक मंच पर लाने की क्षमता रखते हैं। यही एम-वाई-डी समीकरण सपा के लिए इस सीट पर गेमचेंजर बन सकता है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि फरीदपुर विधानसभा सीट पर जीत का रास्ता अब इसी नए सामाजिक संतुलन से होकर गुजरता है। यदि मुस्लिम मतदाता एकजुट रहते हैं, यादव समाज का पारंपरिक समर्थन बना रहता है और दलित वोट भी बड़ी संख्या में साथ आता है, तो यह गठजोड़ किसी भी मुकाबले को आसान बना सकता है। लेकिन यह काम उतना आसान नहीं है, जितना सुनने में लगता है। जरा सी चूक या असंतोष वोटों के बिखराव की वजह बन सकता है।
यही कारण है कि चंद्रसेन सागर हर छोटे-बड़े मौके को राजनीतिक संवाद में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। ईद जैसे बड़े त्योहार पर उनकी सक्रियता इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। वह जानते हैं कि सिर्फ भाषण देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि लोगों के बीच जाकर, उनके सुख-दुख में शामिल होकर ही भरोसा जीता जा सकता है। यही वजह है कि उन्होंने इस मौके को सिर्फ औपचारिकता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि पूरे दिल से लोगों के बीच जाकर संवाद किया। हालांकि, उनके लिए यह कोई नई बात नहीं है। पिछले चार दशक से उनकी राजनीति का आधार यही है। चूंकि उन्हें पार्टी ने कभी विधानसभा का टिकट नहीं दिया इसलिए उनके संबंधों को परखा नहीं जा सका लेकिन बीडीसी चुनावों में चंद्रसेन सागर ने खुद को साबित किया है।

इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि मुस्लिम समाज के भीतर भी एक तरह की राजनीतिक जागरूकता बढ़ी है। अब यह मतदाता केवल परंपरागत आधार पर वोट नहीं करता, बल्कि उम्मीदवार की छवि, उसकी पहुंच और उसके व्यवहार को भी महत्व देता है। ऐसे में चंद्रसेन सागर की यह पहल उन्हें इस वर्ग के बीच और मजबूत बना सकती है। खासकर तब, जब कुछ सीटों पर मुस्लिम वोटों के बंटवारे की स्थिति बनती रही है।
फरीदपुर की सियासत में यह नया प्रयोग आने वाले चुनाव के लिहाज से काफी दिलचस्प हो गया है। एक तरफ जहां पुराने समीकरणों को बचाने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर नए सामाजिक गठजोड़ बनाने की जरूरत भी है। चंद्रसेन सागर इसी संतुलन को साधने की कोशिश कर रहे हैं।

कुल मिलाकर, ईद के मौके पर गांव-गांव जाकर लोगों से मिलना, उन्हें गले लगाना और उनके साथ त्योहार मनाना केवल एक सामाजिक पहल नहीं, बल्कि एक गहरी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी है। यह रणनीति अगर सफल होती है, तो फरीदपुर विधानसभा सीट पर सपा के लिए नई संभावनाओं के दरवाजे खुल सकते हैं। अब देखना यह होगा कि यह “एम-वाई-डी” का नया समीकरण चुनावी नतीजों पर कितना असर दिखाता है।





