नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली ने रविवार को सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं देखा, बल्कि एक ऐसा ऐतिहासिक क्षण जिया, जिसने इस शहर की पहचान को नई मजबूती दी। बरेली कैंट विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के प्रबल दावेदार और प्रख्यात बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अनीस बेग द्वारा आयोजित ‘आओ गले मिलें- जश्न-ए-ईद व होली मिलन महोत्सव’ ने यह साबित कर दिया कि सामाजिक समरसता कोई नारा नहीं, बल्कि जमीन पर उतारी जा सकने वाली सच्चाई है। हमारा देश एक गुलदस्ता है और विभिन्न धर्म, जाति, संप्रदाय इस गुलदस्ते के रंग-बिरंगे फूल हैं। इन्हीं फूलों को रविवार की शाम एक गुलदस्ते के रूप में सहेजा डॉक्टर अनीस बेग ने। मानो मिनी हिन्दुस्तान जश्न-ए-ईद और होली मिलन महोत्सव के मंच पर उतर आया हो।

डोहरा रोड स्थित आईएमए फार्म उस शाम सिर्फ एक आयोजन स्थल नहीं था, बल्कि वह एक जीवंत प्रतीक बन गया था—एक ऐसे भारत का, जहां विविधता टकराती नहीं, बल्कि एक-दूसरे में घुलकर नई पहचान बनाती है। हजारों की भीड़, उत्साह से भरे चेहरे और हर तरफ गूंजती तालियां इस बात की गवाही दे रही थीं कि यह आयोजन सिर्फ भीड़ जुटाने का प्रयास नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने की एक ईमानदार कोशिश है।


मंच पर जो तस्वीर उभरकर सामने आई, वह किसी भी राजनीतिक या सामाजिक भाषण से कहीं अधिक प्रभावशाली थी। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई—हर धर्म, हर जाति और हर वर्ग के लोग एक साथ बैठे थे। यह दृश्य किसी आदर्श समाज का सपना नहीं, बल्कि बरेली की जमीन पर साकार होती हकीकत था। जिस दौर में पहचान की राजनीति अक्सर समाज को खांचों में बांट देती है, उस दौर में यह आयोजन उन खांचों को तोड़ता हुआ नजर आया।
इस महोत्सव की आत्मा उसकी अवधारणा में थी। एक ओर ईद की सेवइयों की खुशबू थी, जो अपनापन और मिठास का एहसास कराती है, तो दूसरी ओर होली की गुजियों की मिठास थी, जो रंगों और रिश्तों को और गहरा करती है। यह सिर्फ दो त्योहारों का मेल नहीं था, बल्कि दो संस्कृतियों के दिलों का संगम था—एक ऐसा संगम, जो बिना किसी शोर के समाज को जोड़ने का काम करता है।

नवरात्र के पावन अवसर को ध्यान में रखते हुए महिलाओं के लिए जो विशेष इंतजाम किए गए, वह इस आयोजन की संवेदनशीलता को दर्शाते हैं। मुफ्त मेकअप, बिंदी, चूड़ी और मेहंदी के स्टॉल महज आकर्षण नहीं थे, बल्कि यह संदेश थे कि समाज की आधी आबादी को केंद्र में रखे बिना कोई भी सामाजिक आयोजन पूर्ण नहीं हो सकता। महिलाओं की बड़ी भागीदारी ने इस कार्यक्रम को और भी जीवंत बना दिया।

कार्यक्रम का सांस्कृतिक आयाम भी बेहद प्रभावशाली रहा। मशहूर गायक सलमान अली की मौजूदगी ने इस आयोजन को एक अलग ऊंचाई पर पहुंचा दिया। उनके सुरों ने न सिर्फ माहौल को संगीत से सराबोर किया, बल्कि लोगों के दिलों को एक साझा भाव में बांध दिया। जब हजारों लोग एक साथ एक ही धुन पर झूमते हैं, तो वह सिर्फ मनोरंजन नहीं होता, वह एक सामूहिक अनुभूति बन जाता है।

इस आयोजन की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि इसने राजनीति की दीवारों को भी नरम कर दिया। समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस—हर दल के नेता यहां मौजूद रहे। यह दृश्य अपने आप में एक संदेश था कि जब बात समाज को जोड़ने की हो, तो राजनीतिक मतभेद भी पीछे छूट सकते हैं। यह आयोजन एक तरह से उस संभावना का प्रतीक बना, जहां संवाद और सह-अस्तित्व की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।

कार्यक्रम में शहर के मेयर उमेश गौतम की मौजूदगी ने इसकी गरिमा को और बढ़ाया। इसके अलावा विभिन्न धर्मों के धर्मगुरु—गिरजाघरों के फादर, बिशप, गुरुद्वारों के ग्रंथी, दरगाह कमेटियों के पदाधिकारी—सभी एक मंच पर नजर आए। यह दृश्य अपने आप में एक सामाजिक दस्तावेज था, जो बताता है कि बरेली की आत्मा अभी भी समावेशी है।

भीड़ का जो आलम था, वह इस आयोजन की लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण था। मैदान के भीतर जगह कम पड़ गई और बाहर खड़े लोग भी उसी उत्साह के साथ कार्यक्रम का हिस्सा बनने की कोशिश कर रहे थे। यह भीड़ किसी राजनीतिक रैली की भीड़ नहीं थी, यह वह भीड़ थी जो अपने भीतर एक साझा भावना लेकर आई थी—एक साथ होने की भावना।
इस आयोजन की जड़ें 2025 में पड़ी थीं, जब डॉ. अनीस बेग ने पहली बार इस परंपरा की शुरुआत की थी। उस समय यह एक पहल थी, लेकिन आज यह एक परंपरा बन चुकी है। इस बार के आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह परंपरा अब सिर्फ जारी ही नहीं रहेगी, बल्कि हर साल और व्यापक होती जाएगी।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा भेजा गया बधाई संदेश इस आयोजन के महत्व को और रेखांकित करता है। यह दर्शाता है कि यह पहल अब स्थानीय दायरे से निकलकर व्यापक राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का हिस्सा बन चुकी है।

सोशल मीडिया पर इस आयोजन की गूंज अपने आप में एक अलग कहानी कहती है। तस्वीरें, वीडियो और लोगों की प्रतिक्रियाएं यह बता रही थीं कि यह कार्यक्रम लोगों के दिलों को छूने में सफल रहा। आज के डिजिटल दौर में जब किसी आयोजन की सफलता उसके ऑनलाइन प्रभाव से भी मापी जाती है, तब यह महोत्सव उस कसौटी पर भी खरा उतरा।
स्थानीय लोगों की जुबान पर एक ही बात थी—यह आयोजन सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक संदेश है। एक ऐसा संदेश, जो बताता है कि समाज को जोड़ने के लिए बड़े-बड़े भाषणों की नहीं, बल्कि सच्चे इरादों की जरूरत होती है। डॉ. अनीस बेग ने वही सच्चाई जमीन पर उतारकर दिखाई है।

डॉ. अनीस बेग का व्यक्तित्व भी इस आयोजन में झलकता है—एक डॉक्टर, जो बच्चों का इलाज करता है, वही समाज के जख्मों को भी भरने की कोशिश करता नजर आता है। उन्होंने यह साबित किया कि अगर कोई व्यक्ति ठान ले, तो वह सिर्फ अपने पेशे तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव का वाहक भी बन सकता है।

खुद डॉ. अनीस बेग ने इस मौके पर साफ शब्दों में कहा कि यह परंपरा तब तक जारी रहेगी, जब तक उनकी सांसें चलेंगी। यह सिर्फ एक वादा नहीं, बल्कि एक संकल्प है—एक ऐसा संकल्प, जो आने वाले समय में बरेली की पहचान का हिस्सा बन सकता है।

आज के समय में, जब समाज को बांटने वाली आवाजें अक्सर तेज हो जाती हैं, ऐसे में यह आयोजन एक संतुलन की तरह सामने आता है। यह बताता है कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता में है, और उस विविधता को बनाए रखने के लिए ऐसे प्रयास बेहद जरूरी हैं।
डॉ. अनीस बेग ने न सिर्फ एक आयोजन किया, बल्कि उन्होंने एक विचार को जन्म दिया—एक ऐसा विचार, जो आने वाले वर्षों तक लोगों को जोड़ता रहेगा, प्रेरित करता रहेगा और यह याद दिलाता रहेगा कि असली ताकत साथ रहने में है, न कि अलग-अलग खड़े होने में।
कार्यक्रम में ये रहे मौजूद
सहारनपुर से समाजवादी पार्टी के विधायक आशु मलिक, बरेली के महापौर और भाजपा नेता डॉ. उमेश गौतम, बरेली के पूर्व महापौर डॉ. आईएस तोमर, ज्ञानी काले सिंह, मशहूर दिवंगत शायर मुनव्वर राणा की पुत्री और सपा नेत्री सुमैया राणा, प्रमोद बिष्ट, समाजवादी पार्टी के महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी, फरीदपुर के पूर्व विधायक विजयपाल सिंह, वरिष्ठ सपा नेता चंद्रसेन सागर, राशिद खान, खुसरो मिर्जा, राशिद खान, अरविंद यादव, डॉक्टर जीराज सिंह यादव, गौरव सक्सेना, स्मिता यादव, सुहैल रजा खान, राजेश मौर्य, गजल अंसारी और अन्य नेता प्रमुख रूप से उपस्थित हुए।






