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नसीमुद्दीन के दौरे ने खोली सपा की अंदरूनी कलह, बसपा से आए नेताओं के बीच ही सिमटी राजनीति, दिग्गज यादव नेताओं ने बनाई दूरी, क्या सपा में ‘बसपाई बनाम समाजवादी’ खाई बढ़ा गए नसीमुद्दीन सिद्दीकी?

नीरज सिसौदिया, बरेली
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और बहुजन समाज पार्टी सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके नसीमुद्दीन सिद्दीकी का गुरुवार को हुआ बरेली दौरा राजनीतिक गलियारों में चर्चा और विवाद का बड़ा कारण बन गया। जिस दौरे को संगठनात्मक मजबूती और आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा था, वह दौरा उल्टा समाजवादी पार्टी के भीतर गुटबाजी और असंतोष की नई तस्वीर सामने लेकर आया। पूरे दिन चले इस राजनीतिक दौरे में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की रही कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी केवल उन्हीं नेताओं के संपर्क में दिखाई दिए, जो कभी बहुजन समाज पार्टी का हिस्सा रहे थे और बाद में समाजवादी पार्टी में शामिल हुए। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के पारंपरिक यादव नेतृत्व ने उनके कार्यक्रमों से लगभग पूरी तरह दूरी बनाए रखी। जिला अध्यक्ष होने के नाते शुभलेश यादव और वर्ष 2022 में सपा से बगावत करके आंवला विधानसभा सीट से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव लड़ने वाले डॉ. जीराज यादव जरूर नजर आए।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह केवल एक सामान्य राजनीतिक दौरा नहीं था, बल्कि इसके जरिए बरेली मंडल की सपा राजनीति में नए शक्ति संतुलन की झलक भी दिखाई दी। जिस तरह पार्टी के प्रभावशाली यादव नेताओं ने नसीमुद्दीन के कार्यक्रमों में भाग नहीं लिया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। माना जा रहा है कि सपा के भीतर अब टिकट वितरण और संगठनात्मक प्रभाव को लेकर अंदरखाने खींचतान तेज हो चुकी है।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी के दौरे की शुरुआत फरीदपुर से हुई। यहां उनका स्वागत फरीदपुर के पूर्व बसपा विधायक और समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रत्याशी विजयपाल सिंह ने किया। विजयपाल सिंह पहले बहुजन समाज पार्टी में रहे हैं और बाद में सपा में शामिल हुए थे। राजनीतिक हलकों में इस बात की खूब चर्चा रही कि फरीदपुर में समाजवादी पार्टी के कई बड़े चेहरे इस कार्यक्रम से पूरी तरह गायब रहे।
फरीदपुर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट के प्रबल दावेदार और समाजवादी बाबा साहेब अंबेडकर वाहिनी के राष्ट्रीय सचिव चंद्रसेन सागर कार्यक्रम में नजर नहीं आए। इसके अलावा 5 बार विधायक रहे स्वर्गीय सियाराम सागर की पुत्रवधु और संभावित टिकट दावेदार कल्पना सागर भी दूरी बनाए रहीं। टिकट की एक अन्य दावेदार शालिनी सिंह भी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुईं। इतना ही नहीं, फरीदपुर के स्थानीय यादव नेताओं ने भी नसीमुद्दीन के स्वागत से दूरी बनाई। सूत्रों के अनुसार स्थानीय यादव नेताओं में विजयपाल सिंह को लेकर पहले से नाराजगी बनी हुई है, जिसका असर इस कार्यक्रम में साफ दिखाई दिया।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि फरीदपुर का यह दृश्य समाजवादी पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को खुलकर सामने लाने वाला था। एक ओर बसपा पृष्ठभूमि से आए नेताओं का समूह दिखाई दिया, तो दूसरी ओर पारंपरिक समाजवादी खेमे की गैरमौजूदगी ने कई संकेत दिए।
फरीदपुर के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष और प्रदेश कार्यकारिणी के विशेष आमंत्रित सदस्य इंजीनियर अनीस अहमद खां के आवास पहुंचे। अनीस अहमद खां भी एक समय बसपा का हिस्सा रह चुके हैं। इसके अलावा वह पूर्व विधायक सुल्तान बेग के यहां भी गए। सुल्तान बेग भी बसपा से ही सपा में आए थे। इसके अलावा नसीमुद्दीन पूर्व मंत्री और बहेड़ी विधायक अता उर रहमान का हालचाल जानने भी पहुंचे। अता उर रहमान भी पहले बसपा में थे और बाद में समाजवादी पार्टी में शामिल हुए। नसीमुद्दीन के साथ भोजीपुरा विधायक शहजिल इस्लाम भी दिखे। शहजिल इस्लाम भी एक समय बसपा में थे। बाद में वह सपा में शामिल हुए थे।
पूरे दौरे में एक बात समान रूप से दिखाई दी कि जिन नेताओं से नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने मुलाकात की, उनमें अधिकांश का राजनीतिक अतीत बहुजन समाज पार्टी से जुड़ा रहा है। इससे राजनीतिक चर्चाओं को और बल मिला कि उनका यह दौरा संगठनात्मक एकता से ज्यादा बसपा पृष्ठभूमि वाले नेताओं के साथ राजनीतिक समन्वय स्थापित करने पर केंद्रित था।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी सेंथल में आयोजित एक पीडीए पंचायत में भी शामिल हुए। इस पंचायत का आयोजन अली अब्बास रकमी की ओर से किया गया था। अली अब्बास भी कभी बसपा का हिस्सा रहे हैं। इस कार्यक्रम को समाजवादी पार्टी के पीडीए अभियान से जोड़कर देखा गया, लेकिन यहां भी पारंपरिक समाजवादी चेहरों की गैरमौजूदगी चर्चा का विषय बनी रही।
सबसे ज्यादा राजनीतिक संदेश उस तस्वीर ने दिया जिसमें समाजवादी पार्टी के प्रमुख यादव नेताओं ने नसीमुद्दीन से दूरी बनाए रखी। राष्ट्रीय सचिव वीरपाल सिंह यादव, पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव और उनके पुत्र, प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य अरविंद यादव, निवर्तमान जिला महासचिव संजीव यादव, पूर्व ब्लॉक प्रमुख आदेश यादव गुड्डू, बिथरी विधानसभा सीट से सपा टिकट के प्रबल दावेदार डॉक्टर देवेंद्र यादव और सूरज यादव जैसे बड़े नाम पूरे दौरे से नदारद रहे। राजनीतिक हलकों में इसे सामान्य संयोग नहीं माना जा रहा। हालांकि इनकी गैरमौजूदगी की क्या वजह रही यह स्पष्ट नहीं हो है लेकिन चुनावी मौसम में एकसाथ इन नेताओं की गैरमौजूदगी कई सवाल छोड़ गई है।
दरअसल, समाजवादी पार्टी लंबे समय से यादव-मुस्लिम समीकरण की राजनीति पर खड़ी रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पार्टी ने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फार्मूले पर जोर बढ़ाया है। ऐसे में बसपा से आए नेताओं की सक्रियता और पुराने समाजवादी नेताओं की नाराजगी अब खुलकर सामने आने लगी है। बरेली में नसीमुद्दीन के दौरे ने इसी अंदरूनी संघर्ष को सार्वजनिक कर दिया।
सूत्रों का कहना है कि समाजवादी पार्टी के कई पुराने नेता यह मानते हैं कि पार्टी में लगातार बाहरी नेताओं को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि वर्षों से संगठन के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं और नेताओं की उपेक्षा हो रही है। यही वजह रही कि नसीमुद्दीन के कार्यक्रमों से यादव नेताओं ने दूरी बनाकर अपना राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले टिकट की राजनीति अब तेजी पकड़ रही है। बरेली मंडल की कई सीटों पर टिकट को लेकर कई दावेदार मैदान में हैं। ऐसे में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का यह दौरा संभावित टिकट वितरण से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक, बसपा में रहते हुए नसीमुद्दीन सिद्दीकी पर टिकट दिलाने के नाम पर पैसे लेने के आरोप लगते रहे हैं और इसी छवि को लेकर समाजवादी पार्टी के अंदर भी एक वर्ग असहज दिखाई देता है। हालांकि इन आरोपों की कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस चर्चा ने हमेशा जगह बनाई। अब उनके बरेली दौरे को लेकर भी ऐसी चर्चाएं तेज हैं कि वह आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अपने करीबी नेताओं की पैरवी मजबूत करने में जुटे हैं।
बताया जा रहा है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी आगामी चुनाव में उन नेताओं के लिए ज्यादा सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं, जो बसपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में आए हैं। यही कारण है कि उनके पूरे दौरे को बसपा पृष्ठभूमि वाले नेताओं की एक राजनीतिक गोलबंदी के रूप में भी देखा जा रहा है।
दूसरी ओर समाजवादी पार्टी का एक वर्ग इसे संगठन के लिए नुकसानदायक मान रहा है। पार्टी के कई पुराने नेताओं का मानना है कि यदि टिकट वितरण में केवल बाहरी नेताओं को प्राथमिकता दी गई, तो इसका सीधा असर कार्यकर्ताओं के मनोबल और चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है। खासतौर पर यादव नेताओं की नाराजगी को हल्के में लेना पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।
बरेली की राजनीति में यह दौरा इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यहां समाजवादी पार्टी पहले से ही कई गुटों में बंटी हुई दिखाई देती है। एक ओर पुराने समाजवादी नेता हैं, तो दूसरी ओर बसपा से आए नेताओं का मजबूत नेटवर्क तैयार हो चुका है। ऐसे में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का यह दौरा इन दोनों खेमों के बीच की दूरी को और ज्यादा उजागर कर गया।
फिलहाल समाजवादी पार्टी की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि बरेली में पार्टी की अंदरूनी राजनीति अब खुलकर सतह पर आने लगी है। आने वाले दिनों में टिकट वितरण और संगठनात्मक जिम्मेदारियों को लेकर यह खींचतान और तेज हो सकती है।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का यह दौरा भले ही राजनीतिक शिष्टाचार और मुलाकातों के तौर पर पेश किया गया हो, लेकिन जिस तरह की तस्वीरें और संदेश इससे निकलकर सामने आए, उन्होंने यह साफ कर दिया कि समाजवादी पार्टी के भीतर सबकुछ सामान्य नहीं है। आगामी विधानसभा चुनाव से पहले बरेली की सियासत में यह दौरा लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहने वाला है।

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