नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले एक दशक से हिन्दुत्व केवल एक वैचारिक मुद्दा नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का सबसे मजबूत हथियार बन चुका है। भारतीय जनता पार्टी ने राम मंदिर, काशी, मथुरा, सनातन संस्कृति और धार्मिक पहचान को केंद्र में रखकर लगातार चुनावी सफलताएं हासिल की हैं। ऐसे माहौल में विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसे नेताओं की तलाश है, जो हिन्दुत्व के मुद्दे पर रक्षात्मक होने के बजाय अपनी सामाजिक और धार्मिक स्वीकार्यता के दम पर मुकाबला कर सकें। बरेली की सुरक्षित फरीदपुर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के संभावित उम्मीदवारों में पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर का नाम इस वजह से भी सुर्खियां बटोर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फरीदपुर का चुनाव केवल जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रहेगा। भाजपा यदि वर्ष 2027 में भी हिन्दुत्व को चुनावी मुद्दा बनाती है तो समाजवादी पार्टी को ऐसे चेहरे की जरूरत होगी, जिसकी धार्मिक आस्था और सामाजिक स्वीकार्यता पर सवाल खड़ा करना आसान न हो। चंद्रसेन सागर की राजनीतिक यात्रा का सबसे मजबूत पक्ष यही माना जा रहा है।
चंद्रसेन सागर का धार्मिक जुड़ाव चुनावी मौसम की उपज नहीं है। करीब ढाई दशक पहले वर्ष 1999 में उन्होंने बरेली की रामवाटिका कॉलोनी में मंदिर का निर्माण कराया था। इसके बाद भी उनका धार्मिक गतिविधियों से जुड़ाव लगातार बना रहा। फरीदपुर विधानसभा के ग्राम गोपालपुर स्थित प्रसिद्ध पाकड़ वाले महाराज मंदिर परिसर में उन्होंने हाल ही में राधा-कृष्ण मंदिर के भव्य निर्माण का शिलान्यास किया। उल्लेखनीय है कि इसी परिसर में वर्षों पहले वह अपने दिवंगत बड़े भाई स्वर्गीय सियाराम सागर के साथ मिलकर भी मंदिर निर्माण करा चुके हैं। इसके अलावा मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठा, भंडारे और धार्मिक आयोजनों में उनकी नियमित भागीदारी क्षेत्र के लोगों के बीच पहले से ही चर्चा का विषय रही है। वह हर साल 10 मौकों पर बरेली के वृद्ध आश्रम में भोजन की व्यवस्था करवाने का काम भी करते हैं।

यही वजह है कि भाजपा यदि हिन्दुत्व के मुद्दे पर चुनावी बढ़त बनाने की कोशिश करती है तो फरीदपुर में चंद्रसेन सागर का रिकॉर्ड उस रणनीति की धार को काफी हद तक कमजोर कर सकता है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसी नेता की धार्मिक विश्वसनीयता भाषणों से नहीं, बल्कि वर्षों के सार्वजनिक जीवन से बनती है और चंद्रसेन सागर इसी कसौटी पर खरे उतरते दिखाई देते हैं।

हाल ही में उनकी जम्मू-कश्मीर यात्रा भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी। उन्होंने श्री माता वैष्णो देवी भवन पहुंचकर मां वैष्णो देवी की आरती में भाग लिया। इसके बाद श्रीनगर स्थित हजरतबल दरगाह जाकर भी उन्होंने श्रद्धा अर्पित की। यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं थी, बल्कि उनके उस सार्वजनिक व्यक्तित्व की झलक थी, जिसमें सनातन परंपरा के प्रति गहरी आस्था के साथ-साथ सभी धर्मों के प्रति सम्मान भी दिखाई देता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि समाजवादी पार्टी केवल एक विशेष वर्ग की राजनीति करती है। ऐसे माहौल में चंद्रसेन सागर जैसे नेता की मौजूदगी पार्टी के लिए एक अलग संदेश देने का अवसर बन सकती है। उनकी छवि ऐसे नेता की रही है, जो मंदिर में भी उतनी ही सहजता से दिखाई देते हैं और दूसरे धर्मों के धार्मिक स्थलों पर भी सम्मानपूर्वक पहुंचते हैं। यही संतुलन उन्हें केवल समाजवादी पार्टी का नेता नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता वाला जननेता बनाने की क्षमता रखता है।
फरीदपुर विधानसभा की सामाजिक बनावट भी इस विश्लेषण को मजबूती देती है। यहां अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, सवर्ण और मुस्लिम मतदाता सभी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में केवल जातीय समीकरण चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त नहीं होंगे। जिस उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि विभिन्न वर्गों में स्वीकार्य होगी, उसकी चुनावी स्थिति स्वाभाविक रूप से मजबूत मानी जाएगी। चंद्रसेन सागर लंबे समय से सामाजिक, धार्मिक और सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से इसी व्यापक स्वीकार्यता को मजबूत करते रहे हैं।

समाजवादी पार्टी भी 2027 के चुनाव को केवल पारंपरिक राजनीति के सहारे नहीं लड़ सकती। पार्टी नेतृत्व ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देना चाहेगा जो स्थानीय स्तर पर मजबूत हों, जिनकी अपनी जनस्वीकार्यता हो और जिनके सामने भाजपा के वैचारिक मुद्दों की धार कमजोर पड़ सके। फरीदपुर में चंद्रसेन सागर का नाम इसी कसौटी पर सबसे मजबूत दावेदारों में शामिल होता दिखाई देता है।
यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेजी से हो रही है कि यदि समाजवादी पार्टी फरीदपुर में जीत को प्राथमिकता देती है, तो उसे ऐसे चेहरे पर दांव लगाना होगा जो भाजपा के हिन्दुत्व नैरेटिव का मुकाबला किसी बयान से नहीं, बल्कि अपने वर्षों पुराने सामाजिक और धार्मिक जीवन से कर सके। इस नजरिए से देखा जाए तो चंद्रसेन सागर की दावेदारी केवल संगठनात्मक सक्रियता के कारण नहीं, बल्कि उनकी धार्मिक विश्वसनीयता, सामाजिक स्वीकार्यता और सर्वधर्म समभाव की छवि के कारण भी लगातार मजबूत होती दिखाई दे रही है।



