नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की 11 विधानसभा सीटों के लिए हुए चुनावों में समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन पूरे प्रदेश में पिछली बार की तुलना में बेहतर रहा है। सपा ने पिछली बार जहां 3 सीटें जीती थीं वहीं इस बार उसके खाते में 5 सीटें आई हैं। लेकिन सबसे निराशाजनक तस्वीर बरेली-मुरादाबाद खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की सामने आई है। यहां समाजवादी पार्टी को अब तक की संभवतया सबसे शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। यहां भाजपा प्रत्याशी डॉ. हरि सिंह ढिल्लों ने 21,672 वोट हासिल कर जीत दर्ज की, जबकि सपा के हाजी दानिश अख़्तर 4 हजार वोटों का आंकड़ा भी नहीं छू सके। उन्हें महज 3,996 वोट मिले। दोनों के बीच हार-जीत का अंतर 17,676 मतों का रहा।

दरअसल, इस चुनाव को महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी और उनकी टीम को छोड़कर किसी भी नेता ने गंभीरता से लिया ही नहीं। खास तौर पर प्रभारी बनाए गए संजीव सक्सेना ने। जमीनी काम करने की जगह वह प्रभारी के तौर पर अपनी ब्रांडिंग करने में अधिक जुटे रहे। पार्टी सूत्रों का दावा है कि वह अखिलेश यादव और प्रोफेसर रामगोपाल यादव जैसे वरिष्ठ नेताओं से मुलाकातों में सक्रिय रहे, लेकिन शिक्षक मतदाताओं तक पहुंच बनाने और संगठन के कामकाज की नियमित समीक्षा में अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखी। स्थानीय सपा नेताओं के बीच चर्चा है कि चुनाव प्रभारी के रूप में संजीव सक्सेना को संगठन को सक्रिय करने और चुनावी तैयारियों की निगरानी करने की जिम्मेदारी मिली थी।

आरोप है कि उन्होंने इस अवसर का इस्तेमाल जमीनी स्तर पर काम करने के बजाय पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से संपर्क बढ़ाने और आगामी विधानसभा चुनाव में बरेली कैंट सीट के लिए अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में अधिक किया। पार्टी सूत्रों की मानें तो उनकी लापरवाही का ही नतीजा रहा कि पार्टी कार्यालय में 250 फॉर्म ऐसे पड़े रहे जिन पर स्कूल प्रिंसिपल के हस्ताक्षर भी नहीं हाे सके। अगर इन फॉर्मों पर हस्ताक्षर हो जाते तो पार्टी के 250 वोट बन सकते थे। यह स्थिति दर्शाती है कि प्रभारी संजीव सक्सेना इस चुनाव को लेकर कितने गंभीर थे।

बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती। लापरवाही का चरम तो अभी बाकी था। मतगणना के दिन की भूमिका को लेकर भी संजीव सक्सेना पर सवाल उठ रहे हैं।
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सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रदेश के नेताओं को मतगणना के दौरान सतर्क रहने और किसी भी गड़बड़ी की स्थिति में तत्काल आपत्ति दर्ज कराने के निर्देश दिए थे। लेकिन जिस दिन चुनावी नतीजे तय हो रहे थे, उस दिन भी संजीव सक्सेना बरेली में मतगणना की निगरानी करने के बजाय लखनऊ में सपा में शामिल हो रहे पूर्व भाजपा सांसद धर्मेंद्र कश्यप और उनकी पुत्री कीर्ति कश्यप के काफिले की भीड़ का हिस्सा बनकर लखनऊ पहुंच गए। वहां वरिष्ठ नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाने में व्यस्त रहे। इतना ही नहीं अपने इस कृत्य पर उन्हें गर्व महसूस हुआ और उन्होंने अपनी फेसबुक पर इसका एक वीडियो भी पोस्ट किया है। इस वीडियो में वह धर्मेंद्र कश्यप, कीर्ति कश्यप और अन्य पार्टी नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवाते नजर आ रहे हैं।

प्रभारी होने के बावजूद मतगणना स्थल पर मौजूद न होना संगठनात्मक जिम्मेदारी के लिहाज से गंभीर सवाल है। इतना ही नहीं मतगणना एजेंट भी महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी और उनकी टीम ने बनाए।
बरेली जिले के कुछ दिग्गज समाजवादी नेताओं का कहना है कि दानिश अख्तर की जीत भले ही नहीं हो पाती लेकिन संजीव सक्सेना की लापरवाही ने इस हार को रिकॉर्ड हार बनाने में अहम भूमिका निभाई।

समाजवादी पार्टी ने संजीव सक्सेना को एक जिम्मेदार नेता मानते हुए एक मौका दिया था खुद को साबित करने का लेकिन संजीव सक्सेना इस जिम्मेदारी को निभाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए। अगर वह चाहते तो इंजीनियर अनीस अहमद खां की तरह इस मौके का लाभ उठा सकते थे। इंजीनियर अनीस अहमद खां को जब रामपुर लोकसभा सीट का प्रभार सौंपा गया था तो उन्होंने जी-तोड़ मेहनत कर पार्टी को जिताने का काम किया था जिसके लिए अखिलेश यादव की नजरों में आज तक उनकी एक अलग जगह बनी हुई है। लेकिन संजीव सक्सेना की दुनिया तो बस सपा के जिला महासचिव प्रमोद बिष्ट और जिला उपाध्यक्ष हैदर अली जैसे कुछ चुनिंदा नेताओं तक ही सीमित बताई जाती है। विगत नगर निगम चुनाव में पार्टी ने संजीव सक्सेना को मेयर पद का उम्मीदवार बनाया था लेकिन बाद में पार्टी ने निर्दलीय उम्मीदवार डॉक्टर आईएस तोमर को समर्थन दे दिया और संजीव सक्सेना को बिठा दिया गया। तोमर भी चुनाव नहीं जीत सके थे। बता दें कि हैदर अली वही नेता हैं जिन्होंने पिछले लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को मुस्लिम विरोधी बताया था। साथ ही लोगों से यह अपील भी की थी कि मुस्लिमों को समाजवादी पार्टी को वोट नहीं देना चाहिए। फिलहाल हैदर अली को जिला उपाध्यक्ष बना दिया गया।

अब पार्टी के सामने यह समीक्षा करने का अवसर है कि चुनाव की तैयारी कब शुरू हुई, कितने पात्र मतदाताओं से संपर्क किया गया, कितने नए वोट बनवाने के प्रयास हुए, लंबित फॉर्म की निगरानी किसने की और मतगणना के दौरान संगठन की क्या व्यवस्था थी। इन सवालों के जवाब सामने आने पर ही यह स्पष्ट होगा कि हार का कारण केवल किसी एक नेता की कथित लापरवाही थी या संगठनात्मक स्तर पर कई कमियां एक साथ काम कर रही थीं।




