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समाजवादी पार्टी फिर चली दो फाड़ होने की राह पर, अगम मौर्य के नेतृत्व पर उठने लगे सवाल

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नीरज सिसौदिया, बरेली
समाजवादी पार्टी में बढ़ती अंतर्कलह थमने का नाम नहीं ले रही है. शनिवार की मासिक बैठक में जिस तरह से पूर्व मंत्री भगवत शरण गंगवार के आते ही कमेंटबाजी को लेकर हंगामा हुआ और पूर्व जिला उपाध्यक्ष एवं पूर्व विधायक के बीच धक्का मुक्की की नौबत आ गई उससे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ही आम जनता के बीच भी अच्छा संदेश नहीं गया है. आए दिन सपा के अंदर गुटबाजी की खबरों को जिस तरह से हवा मिल रही है उससे स्पष्ट होता है कि बरेली में समाजवादी पार्टी एक बार फिर बिखराव की राह पर चलने लगी है.
दरअसल, सपा में अंतर्कलह का बीज तो उसी दिन से प्रस्फुटित होने लगा था जिस दिन बसपा के टिकट से चुनाव लड़ने वाले अगम मौर्य को पार्टी में शामिल होते ही जिला अध्यक्ष पद की कमान सौंप दी गई. चूंकि अगम मौर्य पहले कभी सपा का हिस्सा नहीं रहे, इसलिए पैराशूट नेतृत्व को पुराने सपाई बर्दाश्त नहीं कर पा रहे. वैसे भी समाजवादी पार्टी में अगम मौर्य से पहले जिला अध्यक्ष पद की कमान संभालने वाले वीरपाल सिंह यादव हरफनमौला सियासतदान थे. यही वजह रही कि जब से सपा का गठन हुआ तब से 25 साल तक बरेली में जिला अध्यक्ष का पद वीरपाल की है झोली में रहा.
वीरपाल सिंह दबंग भी थे, शिवपाल यादव और मुलायम सिंह यादव के करीबी भी थे और ढाई दशक तक पार्टी के वफादार भी थे. भगवत शरण को समेत कई दिग्गज नेताओं को सपा में शामिल कराने का क्रेडिट भी वीरपाल सिंह को ही जाता है. यही वजह रही कि वीरपाल की खिलाफत कभी कोई मुखर होकर नहीं कर पाया. जब सपा दो फाड़ हुई तो शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के सिपहसालार अपने-अपने खेमे में चले गए. इसका असर बरेली पर भी पड़ा. ढाई दशक से सपा को सींचकर बड़ा करने वाले वीरपाल सिंह ने सपा से दामन छुड़ा लिया और सपा की अंतर्कलह सतह पर आ गई. एक तरफ अताउर्रहमान और धर्मेंद्र यादव ने अगम मौर्य के सिर पर हाथ रख दिया तो दूसरी तरफ भगवत शरण गंगवार तो पहले से ही शमीम खां सुल्तानी पर मेहरबान थे. चूंकि अगम मौर्य बसपा से आए थे इसलिए दिग्गज सपाइयों की आंखों में खटकने लगे. धर्मेंद्र यादव ने जिस उद्देश्य से अगम मौर्य को सपा में शामिल करवाया था वह उद्देश्य फिलहाल पूरा होता नजर नहीं आ रहा है. लेकिन बरेली में पार्टी एक बार फिर दो फाड़ होती नजर आ रही है. संभव है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पूर्व यह बिखराव सड़क पर आ जाए. सपा की बैठकों में धक्का मुक्की तो अब आम बात हो चुकी है, कहीं मामला मारपीट तक न पहुंच जाए. अगर अखिलेश यादव ने अभी भी बरेली की बिखरती सपा की सियासत को सहेजने का प्रयास नहीं किया तो इसका खामियाजा आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को उठाना पड़ सकता है.

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