दिल्ली

आखिर दिल्ली के सरकारी स्कूलों का रिजल्ट निजी स्कूलों से बेहतर कैसे हो गया?

नीरज सिसौदिया

नई दिल्ली में बदलाव की बयार बहने लगी है| शिक्षा व्यवस्था में सुधार के दिल्ली सरकार के दावे हकीकत में बदलने लगे हैं| इस बार दिल्ली के सरकारी स्कूलों के बच्चों ने वह कर दिखाया जो पहले कभी नहीं हुआ| CBSE के 12वीं परीक्षा के परिणामों में दिल्ली कि सरकारी स्कूलों के बच्चों ने न सिर्फ निजी स्कूलों को पछाड़ा बल्कि देश भर के सरकारी स्कूलों में दूसरा स्थान भी हासिल किया|
दिल्ली के सरकारी स्कूलों का परीक्षा परिणाम इस बार 90.68% रहा जो पिछले साल की तुलना में लगभग 2% से भी अधिक बेहतर था| देशभर के सरकारी स्कूलों में सबसे बेहतर रिजल्ट तिरुअनंतपुरम की सरकारी स्कूलों का रहा| तिरुवनंतपुरम के सरकारी स्कूलों का परीक्षा परिणाम 99.11 पर्सेंट था जो पिछली बार के सौ फ़ीसदी परिणाम से कम रहा| वहीं, बात अगर दिल्ली के निजी स्कूलों की करें तो निजी स्कूलों का एवरेज परीक्षा परिणाम 88.35 पर्सेंट रहा| ऐसे में इसका अंदाजा आप ही लगाया जा सकता है कि दिल्ली के निजी स्कूलों के मुकाबले सरकारी स्कूलों की शिक्षा अब बेहतर हो रही है| यहां एक डीटीसी ड्राइवर के बेटे प्रिंस कुमार ने 97 परसेंट नंबर लाकर टॉप किया| प्रिंस को गणित में 100 में से 100 अर्थशास्त्र में 99 और केमिस्ट्री में 98 नंबर मिले हैं| निश्चित तौर पर यह दिल्ली सरकार की भी एक उपलब्धि है| दिल्ली रीजन में कुल 1000 स्कूल हैं जिनमें से 168 स्कूलों का सौ फ़ीसदी रिजल्ट रहा|
ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब दिल्ली के सरकारी स्कूल बेहतर परफॉर्मेंस दे सकते हैं तो अन्य राज्यों के स्कूलों की शिक्षा विभाग प्रणाली को ग्रहण कैसे लग रहा है| दिल्ली के सरकारी स्कूलों की बदहाल शिक्षा व्यवस्था में सुधार का श्रेय दिल्ली सरकार और शिक्षा मंत्री की पूर्व सलाहकार आतिशी मार्लेना को जाता है| अरविंद केजरीवाल सरकार जब सत्ता में आई थी तो शिक्षा और स्वास्थ्य को उसने प्राथमिकताओं में रखा था| इतना ही नहीं शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए दिल्ली सरकार ने लगभग एक चौथाई बजट सिर्फ शिक्षा के लिए ही आवंटित किया| इससे स्कूलों में इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर अन्य व्यवस्थाएं दुरुस्त की गई| नतीजतन दिल्ली के सरकारी स्कूलों के बच्चों को भी वह सुविधाएं उपलब्ध हो सके जो निजी स्कूलों के बच्चों को उपलब्ध होती हैं| जबकि अन्य राज्यों में इसके विपरीत सरकारी स्कूल भगवान भरोसे चल रहे हैं| जिस तरीके से डिप्टी सीएम और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया लगातार दिल्ली के सरकारी स्कूलों का औचक निरीक्षण करते रहे वह इन स्कूलों की व्यवस्था सुधारने में काफी कारगर साबित हुए| लेकिन अन्य राज्यों के सरकारी स्कूलों में ऐसा नहीं होता| अन्य राज्यों में सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था को राज्य सरकारें और खुद शिक्षा मंत्री तक गंभीरता से नहीं लेते| अगर कभी शिक्षा मंत्री स्कूलों में जाते भी हैं तो वह औचक निरीक्षण नहीं होता बल्कि भव्य समारोह होता है| शिक्षा मंत्री जब भी किसी स्कूल में जाते हैं तो भारी तामझाम और लाव लश्कर के साथ शक्ति प्रदर्शन करने जाते हैं| सारे अधिकारी और शिक्षक मंत्री जी की आवभगत में जुट जाते हैं और मंत्री जी कुछ बच्चों को मेडल पहनाकर प्रशस्ति पत्र देकर और खुद स्मृति चिह्न लेकर चलते बनते हैं| ऐसे में शिक्षा व्यवस्था सुधारने का सवाल ही नहीं उठता| इसके उलट मनीष सिसोदिया ने दिल्ली के सरकारी स्कूलों में सुधार के लिए सबसे अलग रणनीति अपनाई| मिड डे मील से लेकर पढ़ाई तक की एक-एक व्यवस्था को उन्होंने खुद अपने से जांचा और परखा| कुछ कड़े फैसले भी लिए जिसका नतीजा सकारात्मक निकला| अतः अन्य राज्यों के सरकारी स्कूलों और उन स्कूलों का संचालन करने वाले सरकार को दिल्ली सरकार से सबक लेना चाहिए| अगर हर राज्य के सरकारी स्कूल के बच्चों को सही शिक्षा और मार्गदर्शन के साथ सुविधाएं भी मुहैया कराई जाए तो निश्चित तौर पर वहां के छात्र भी अपना परचम लहराने से नहीं चूकेंगे|

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