पंजाब

अकाली-भाजपा गठबंधन टूटने से पन्नू को होगा फायदा, कमजोर हुए केडी भंडारी, कालिया को राहत, कैंट जाएंगे राठौर, पढ़ें कैसे बदलेगी जालंधर की सियासत

नीरज सिसौदिया, जालंधर
पंजाब में अकाली-भाजपा गठबंधन टूटने का दोआबा की सियासत पर भी गहरा असर पड़ेगा. खासतौर पर जालंधर की सियासत में काफी बदलाव देखने को मिलेंगे. अब तक अकालियों के दम पर सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने वाले नेता कमजोर होंगे तो वहीं अकालियों की चार सीटें बढ़ने से कुछ अच्छे नेताओं को भी आगे बढ़ने का मौका मिलेगा. सबसे पहले बात करते हैं जालंधर नॉर्थ की सियासत में लंबे समय तक भाजपा की धुरी रहे पूर्व विधायक केडी भंडारी की. भंडारी को अब तक गुरदीप सिंह नागरा, अमरजीत सिंह किशनपुरा जैसे अकाली नेताओं का पूरा साथ मिलता था. भाजपा नेताओं से कभी उनकी बनी ही नहीं. पूर्व जिला अध्यक्ष रमन पब्बी हों, पूर्व पार्षद रवि महेंद्रू हों, गोपाल पेठे वाले रहे हों, किशनलाल शर्मा हों या फिर कोई और दिग्गज, केडी भंडारी कभी इनका विश्वास नहीं जीत सके. इतना ही नहीं जिस सुनील ज्योति को मेयर बनवाने के लिए केडी भंडारी ने पूरी ताकत झोंक दी थी उनका विश्वास भी भंडारी पूरी तरह से हासिल नहीं कर पाए और पहली बार चुनावी मैदान में उतरे बावा हैनरी ने भंडारी जैसे दिग्गज को धूल चटा दी तो भंडारी समर्थक हार का ठीकरा सुनील ज्योति पर फोड़ने लगे. अब वही सुनील ज्योति भाजपा से नॉर्थ विधानसभा सीट पर भंडारी के मुकाबले में खड़े नजर आ रहे हैं. अविनाश राय खन्ना को केंद्रीय नेतृत्व द्वारा दरकिनार करने के बाद भंडारी की सियासी नैय्या भी डूबती नजर आ रही है. दरअसल, अहंकार भंडारी को ले डूबा और यही अहंकार अब भंडारी के गले की फांस बनने वाला है. अकाली-भाजपा गठबंधन टूटने के बाद जिन अकाली नेताओं के दम पर भंडारी चुनावी जंग जीतते रहे हैं अब वही अकाली नेता भंडारी के मुकाबले खड़े नजर आ रहे हैं. गुरदीप सिंह नागरा और परमजीत सिंह रेरू जैसे नेता जो डेढ़ दशक से पार्षद बनते आ रहे हैं वे अब खुद विधायक पद के प्रबल दावेदारों में शामिल हो चुके हैं. भाजपा में तो भंडारी इतने विरोधी तैयार कर चुके हैं कि इस बार भंडारी को टिकट मिलना भी नामुमकिन सा नजर आ रहा है. अगर भंडारी किसी तरह टिकट ले भी आते हैं तो जीत हासिल करना बेहद मुश्किल होगा.
अकाली भाजपा गठबंधन टूटने से भले ही भंडारी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हों लेकिन पूर्व मंत्री मनोरंजन कालिया को बड़ी राहत मिलती नजर आ रही है. दरअसल, कालिया जिस सेंट्रल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते आ रहे हैं उस पर पूर्व मेयर राकेश राठौर की नजर थी. राठौर कैंट सीट से भी लड़ सकते थे लेकिन कैंट सीट अकाली दल के खाते में
होने के चलते राठौर सेंट्रल से ही दावा ठोक रहे थे. अब जबकि अकाली-भाजपा गठबंधन टूट चुका है तो कैंट सीट पर राकेश राठौर का रास्ता साफ हो चुका है. भाजपा भी अगर कैंट सीट से राकेश राठौर जैसे साफ सुथरी छवि वाले नेता को मैदान में उतारती है तो उसे नुकसान की संभावना न के बराबर ही होगी क्योंकि यहां से चुनाव लड़ते आ रहे दबंग अकाली नेता सरबजीत सिंह मक्कड़ से जनता डरने लगी है. मक्कड़ से सवाल पूछने तक की हिम्मत जनता नहीं जुटा पाती. यही वजह है कि लोग उनका समर्थन तो करते हैं मगर वोट नहीं देते. अगर मक्कड़ की जगह परमिंदर कौर पन्नू को यह सीट मिलती है तो निश्चित तौर पर अकाली दल की राह आसान होगी और मक्कड़ की सीट बदलकर जालंधर की दूसरी किसी सीट पर अकाली दल काबिज हो सकता है. कैंट की जनता वैसे भी मक्कड़ को नकार चुकी है. ऐसे में खुद अकाली दल भी नहीं चाह रहा कि इस बार भी मक्कड़ पर दांव खेला जाए. ऐसे में परमिंदर कौर पन्नू का रास्ता साफ नजर आ रहा है. दरअसल, पन्नू को पूर्व अकाली जिला अध्यक्ष गुरचरण सिंह चन्नी गुट का पूरा समर्थन प्राप्त है. अगर मक्कड़ किसी दूसरी सीट से चुनावी मैदान में उतरते हैं तो उनका साथ भी पन्नू को मिलेगा. कैंट सीट से विधायक चुने गए कांग्रेस नेता परगट सिंह पन्नू के बहनोई हैं. अगर पन्नू कैंट से मैदान में उतरती हैं तो रिश्तेदारी के जाे वोट अभी तक परगट सिंह की झोली में गिरते रहे हैं उनमें से कम से कम आधे वोट तो पन्नू जरूर ले उड़ेंगी. पन्नू अकाली दल की महिला मोर्चा की दोबारा प्रधान बनाई गई हैं. इतिहास गवाह है कि अकाली दल ने इस सीट से आज तक कभी भी किसी महिला उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा है. अगर पन्नू मैदान में उतरती हैं तो अकाली दल निश्चित तौर पर इतिहास रच सकता है. पन्नू के साथ सबसे प्लस प्वाइंट यह है कि वह उन महिला नेत्रियों में से नहीं हैं जो नाम की नेत्री होती हैं और शासन उनके पति चलाते हैं बल्कि पन्नू उन महिला नेत्रियों में से हैं जो नगर निगम के सदन में अपनी आवाज बुलंद करना भी जानती हैं और सड़कों पर उतरकर सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन का नेतृत्व भी करती हैं. कुल मिलाकर पन्नू कोई कठपुतली नेत्री नहीं हैं. साफ सुथरी छवि वाली पन्नू अकाली दल की झोली में एक सीट का इजाफा करने का दम तो रखती ही हैं.
पन्नू की जगह अगर अकाली दल एचएस वालिया को मैदान में उतारता है तो यह सीट जीतना उसके लिए नामुमकिन हो जाएगा. इसके कई कारण हैं. पहला यह कि मक्कड़ और वालिया की निजी रंजिश किसी से छिपी नहीं है. मक्कड़ एकबारगी पन्नू का तो समर्थन कर सकते हैं लेकिन वालिया का समर्थन किसी कीमत पर नहीं करने वाले. वहीं, वालिया को टिकट मिली तो पन्नू गुट भी अकाली दल से किनारा कर सकता है.
बहरहाल, जालंधर का सियासी संग्राम इस बार बेहद दिलचस्प होने वाला है. नए चेहरों की मौजूदगी नए समीकरण बनाती नजर आएगी.

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