इंटरव्यू

फलक पर चमकता जमीं का सितारा, कभी अपना घर भी नहीं था आज हजारों का बन गया सहारा, पढ़ें मेयर डा. उमेश गौतम का स्पेशल इंटरव्यू…

‘मेरे पुख्ता इरादे खुद मेरी तकदीर बदलेंगे
मैं मोहताज नहीं हाथों में किस्मरत की लकीरों का…’
कुछ ऐसी ही दास्तान है बरेली के मेयर डा. उमेश गौतम की। एक दौर था जब मेयर के पास अपना घर तक नहीं था। इंस्पेक्टर पिता से विरासत में उन्हें सिर्फ हालातों से लड़ने का हुनर और कुछ कर गुजरने का जज्बा ही मिला था। अपनी तकदीर की इबारत उन्होंने खुद अपने हाथों से लिखी और आज जमीं का यह सितारा सफलता के फलक पर अपनी चमक बिखेर रहा है। डा. उमेश गौतम के पास आज सब कुछ है लेकिन अपनी ईमानदारी के चलते उनके पिता कभी एक मकान तक नहीं बनवा सके थे। 17 साल के वनवास के बाद मेयर की कुर्सी भाजपा की झोली में जीतकर डालने वाले डा. उमेश गौतम का बचपन किन परिस्थितियों में गुजरा? बेबसी की जमीं से बुलंदियों के आसमान तक का सफर उन्होंने कैसे तय किया? राजनीति में आने का फैसला उन्होंने क्यों लिया? वर्ष 2022 में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों में क्या उमेश गौतम भी मैदान में नजर आएंगे? बतौर मेयर उनके तीन साल की उपलब्धियां क्या हैं? आगामी दो वर्षों के उनका विकास का विजन क्या है? ऐसे कई पहलुओं पर बरेली के मेयर डा. उमेश गौतम ने इंडिया टाइम 24 के संपादक नीरज सिसौदिया के साथ खुलकर बात की। पेश हैं मेयर के साथ बातचीत के मुख्ये अंश…
सवाल : आपका बचपन कहां बीता, पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या रही?
जवाब : मैं एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता हूं। मेरा जन्म उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद शहर में हुआ था। चूंकि मेरे पिता पुलिस में थे और अक्सर उनका तबादला एक शहर से दूसरे शहर में होता रहता था, इसलिए मेरा बचपन भी यूपी के अलग-अलग शहरों में बीता। दो भाईयों में मैं बड़ा हूं। मेरे छोटे भाई संजीव गौतम नोएडा में परफ्यूम इंडस्ट्री चलाते हैं। विभिन्न शहरों से स्कूलिंग करने के बाद मैंने रुहेलखंड यूनिवर्सिटी से मुरादाबाद से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। इसके बाद गाजियाबाद से मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया।
सवाल : आपने करियर की शुरुआत कब और कैसे की? यूनिवर्सिटी तक का सफर कैसे तय किया?
जवाब : मैनेजमेंट में डिप्लोमा करने के बाद नौकरी का दबाव मुझ पर भी उसी तरह से था जिस तरह हर मध्यमवर्गीय परिवार के पढ़े-लिखे बेरोजगार युवा पर होता है। इसके बाद मैंने दिल्ली की एक एक्सपोर्ट फर्म में असिस्टेंट मैनेजर की जॉब कर ली। मेरी लाइफ की यह पहली और आखिरी जॉब थी। जॉब करते वक्त मुझे हमेशा महसूस होता था कि कुछ अलग भी करना है जिससे अपनी एक अलग पहचान बना सकूं।इसी दौरान वर्ष 1996 में गवर्नमेंट की एक पॉलिसी आई कि प्राइवेट एजुकेशन भी कालेजों में लाई जाए और उसे ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ टेक्निकल एजुकेशन {एआईसीटीई} से एफिलिएट किया जाए। तो दो साल बाद वर्ष 1998 में हमने बरेली के सिविल लाइंस में दो कमरों में इनवर्टिस इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज की शुरुआत की। आज उसी जगह हमारा कैंप कार्यालय है। हमने दिन-रात मेहनत की और सफलता मिलती गई। कुछ ही वर्षों में हमारा इंस्टीट्यूट इतना लोकप्रिय हो गया कि हम लखनऊ रोड पर शिफ्ट हो गए। वहां हमने इंजीनियरिंग कालेज की शुरुआत की। फिर वर्ष 2010 में हमने इनवर्टिस इंस्टीट्यूट को इनवर्टिस यूनिवर्सिटी में तब्दील कर दिया। एक बहुत बड़ी और संघर्ष से परिपूर्ण सफर रहा।

इनवर्टिस यूनिवर्सिटी

सवाल : शिक्षा के क्षेत्र में आप सफलता के रोज नए आयाम गढ़ रहे थे। फिर सियासत की गंदगी में उतरने का फैसला क्यों किया?
जवाब : राजनीति में मेरा आना एक्सीडेंटल ही कहा जाएगा। मैं कभी राजनीति में नहीं आना चाहता था लेकिन कुछ सियासतदानों और अफसरशाहों ने मुझे राजनीति में उतरने पर मजबूर कर दिया। बात उन दिनों की है जब हमारा काम बहुत अच्छा चल रहा था। हम शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे थे. लखनऊ रोड पर शिफ्ट हो चुके थे। उसी दौरान तत्कालीन मेयर आईएस तोमर और तत्कालीन नगर आयुक्त शैलेंद्र चौधरी नगर निगम महोत्सव के नाम पर लोगों से वसूली करने लगे थे। इन लोगों ने मुझसे पांच लाख रुपये की डिमांड की। मैंने उनकी यह डिमांड पूरी करने में असमर्थता जताते हुए सिर्फ पचास हजार रुपये का सहयोग देने पर सहमति जताई। इस पर वे नहीं माने और यूनिवर्सिटी के बगल में सॉलिड वेस्टे मैनेजमेंट प्लांट लगा दिया। मैंने उनसे कहा कि यह गलत है, सरासर ब्लैमकमेलिंग है लेकिन मेरी किसी ने नहीं सुनी। फिर मैं माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की शरण में गया और माननीय हाईकोर्ट ने मेरे पक्ष में निर्णय सुनाया। फिर एनजीटी ने भी मेरे पक्ष में निर्णय सुनाया। साथ ही तत्कालीन मेयर आईएस तोमर और तत्कालीन नगर आयुक्त शैलेंद्र चौधरी को एक-एक दिन की जेल की सजा व पांच-पांच लाख रुपये जुर्माने की सजा भी सुनाई गई। वहीं नगर निगम पर भी एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया। मेरा संघर्ष यहीं से शुरू हो गया था। मैंने काफी सोचा कि एक तो तोमर जैसे राजनेता काम नहीं करते हैं और काम करते भी हैं तो दूसरे का काम खराब करने के लिए करते हैं। हजारों बच्चों के बारे में उन्होंने कुछ नहीं सोचा. उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बच्चों का भविष्य बर्बाद हो जायेगा. अफसरों की मनमानी भी चरम पर थी तो मुझे लगा कि इस तस्वीर को राजनीति के माध्यम से ही बदला जा सकता है। इसलिए मैंने राजनीति में आने का निर्णय लिया।

मेयर डा. उमेश गौतम

सवाल : राजनी‍ति का सफर किस पार्टी से शुरू किया? पहली बार चुनाव कब लड़ना हुआ?
जवाब : वैसे तो मेरी आस्था कालेज टाइम से ही भारतीय जनता पार्टी में ही रही है। मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ा रहा पर उस वक्त मेरा मुख्य धारा की राजनीति में आने का कोई विचार नहीं था। कुछ समय बाद की बात है. उस वक्त सूबे में सपा की सरकार थी। तब आजम खां नगर विकास मंत्री थे और आईएस तोमर मेयर थे तो उनसे मेरा काफी मनमुटाव चल रहा था। मैं लगातार उनकी ज्यादतियों के खिलाफ आवाज उठा रहा था। वर्ष 2014 में मैं भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मिला और उनके समक्ष लोकसभा चुनाव लड़ने की अपील की लेकिन वह किसी और से वादा कर चुके थे तो मैं बसपा से चुनाव लड़ा। वह चुनाव मैं हार गया और वापस भाजपा में आ गया। फिर तीन साल बाद वर्ष 2017 में पार्टी ने मुझ पर भरोसा जताया। बरेली में पिछले करीब 17 साल से भाजपा का कोई भी मेयर नहीं बन सका था। मैंने पार्टी के भरोसे को बरकरार रखा और 17 साल बाद मेयर की कुर्सी जीतकर पार्टी की झोली में डाली।

सवाल : जीतने के बाद आपने जनता के लिए सबसे पहले क्या काम किया?
जवाब : मेयर बनते ही मैंने सबसे पहले अपने चुनावी घोषणा पत्र का पहला वादा पूरा किया। उस वक्ता बरेली में आतंकी टैक्स लिया जाता था। यहां गाजियाबाद, आगरा और कानपुर जैसे शहरों से भी ज्यादा अंधाधुंध टैक्स वसूला जा रहा था। चुनाव के दौरान मैंने जनता से वादा किया था कि पहली ही बैठक में टैक्स कम किया जाएगा। मैंने अपना वादा पूरा किया और नगर निगम बोर्ड की पहली ही बैठक में 35 से 50 फीसदी तक टैक्स कम किया।
सवाल : टैक्स कम करने के बाद अगला स्टेप क्या रहा?
जवाब : टैक्स कम करने के बाद हमें शहर के विकास पर फोकस करना था। इसके लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी था कि यहां कि प्रमुख समस्याएं क्या हैं और उनका स्तर क्या है? इसलिए सबसे पहले मैंने सर्वे का काम शुरू कराया। स्ट्रीट लाइटों से लेकर टूटी सड़कों और जलभराव की स्थिति तक का सर्वे कराया गया। इसके बाद विकास का रोडमैप तैयार किया गया और तीन वर्षों में लगभग एक हजार करोड़ रुपये से भी अधिक के विकास कार्य करवाए जो बरेली के इतिहास में आज तक किसी भी मेयर ने अपने कार्यकाल में नहीं करवाए।
(नोट- मेयर के स्पेशल इंटरव्यू के अगले भाग में सोमवार को पढ़ें- शहर के विकास कार्यों का लेखा-जोखा, अगले दो वर्षों के विकास का विजन, विधानसभा चुनाव को लेकर मेयर का नजरिया, समाजसेवी मेयर जिनके दर से कोई खाली हाथ नहीं जाता, साथ ही मेयर की जिंदगी से जुड़े कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में। हमारी वेबसाइट को सब्स क्राइब करें। निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के लिए हमें आर्थिक रूप से सहयोग करें। हमारे नीचे दिए हुए अकाउंट नंबर पर सहयोग राशि जमा करें। आपकी एक रुपये की मदद भी हमारा हौसला बढ़ाएगी-
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