यूपी

कई बार काटी है जेल, तीन जजों को करा चुके हैं बर्खास्त, सत्ता के खिलाफ लड़ने से भी पीछे नहीं हटे, शहर विधानसभा सीट से सपा के टिकट के ये हैं सबसे बड़े हकदार…

नीरज सिसौदिया, बरेली
वर्ष 2022 की चुनावी दौड़ शुरू हो चुकी है. टिकट के दावेदार लखनऊ दरबार में हाजिरी लगाने लगे हैं लेकिन समाजवादी पार्टी इस बार सिर्फ जिताऊ चेहरे पर ही दांव खेलना चाहती है. तुष्टिकरण की नीति को आलाकमान पूरी तरह त्याग चुका है. हर विधानसभा सीट पर कद्दावर और जिताऊ प्रत्याशी की तलाश तेज हो रही है. प्रमुख दावेदारों से भी बस एक ही बात पूछी जा रही है कि सीट कैसे जीती जाएगी.
बात अगर बरेली शहर विधानसभा सीट की करें तो भाजपा ने हमेशा यहां से पुराने चेहरे को ही तरजीह दी है. पहले राजेश अग्रवाल फिर डा. अरुण कुमार. ऐसे में बरेली शहर विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी को भी ऐसे पुराने कद्दावर नेता की तलाश है जो सोच-समझ में डा. अरुण कुमार के बराबर का कद रखता हो. फिलहाल ऐसा एक चेहरा समाजवादी पार्टी के पूर्व जिला महासचिव एवं जिला सहकारी संघ के पूर्व चेयरमैन महेश पांडेय के रूप में पार्टी के पास मौजूद तो है लेकिन इस चेहरे ने अब तक टिकट के लिए कोई दावेदारी नहीं की है. महेश पांडेय वही शख्स हैं जो न सिर्फ पिछले करीब 42 साल से मुलायम सिंह यादव और उनके बाद अखिलेश यादव के वफादार बने हुए हैं बल्कि पार्टी के लिए कई बार जेल यात्राएं भी कर चुके हैं. वर्तमान में जब कोई भी स्थानीय नेता सत्ताधारी दल की गलत नीतियों को लेकर सार्वजनिक तौर पर कुछ भी कहने से घबरा रहा है ऐसे में महेश पांडेय एकमात्र ऐसे नेता हैं जो डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या से सीधी लड़ाई लड़ रहे हैं. यह महेश पांडेय की वफादारी का ईनाम ही था जो सपा सरकार में उन्हें लगातार तीन बार जिला सहकारी संघ का चेयरमैन बनाया गया. डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या के खिलाफ केस दायर करने और उन्हें दोषी साबित करने का ही नतीजा था कि उनके खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज कर जेल भेज दिया गया. लेकिन विरोधी यह नहीं जानते थे कि जेल की दीवारें उनके इरादों को कभी कैद नहीं कर पाईं. दशकों पहले बागपत के माया त्यागी कांड को लेकर आंदोलन करने पर भी उन्हें जेल में डाल दिया गया था. उस वक्त उन्होंने 22 दिन की जेल काटी थी. उसके बाद कई बार जेल भरो आंदोलन में भी जेल यात्रा की. अब जेल से वापस आते ही महेश पांडेय ने उन अधिकारियों के खिलाफ भी मुकदमा दायर कर दिया जिन्होंने उन्हें झूठे मामलों में जेल भेजा था.
इतना ही नहीं हाल ही में कोरोना काल में जब विरोधियों के अस्पतालों के काले कारनामे सामने आए तो एकमात्र महेश पांडेय ही थे जिन्होंने मुख्य चिकित्सा अधिकारी से लिखित शिकायत करने की हिम्मत दिखाई थी वरना सपा के अन्य नेता तो लिखित शिकायत देने की हिम्मत तक नहीं जुटा सके. इस दौर में जब विपक्ष सहमा हुआ है तो सपा के महेश पांडेय ही एकमात्र ऐसे नेता हैं जो भाजपा के खिलाफ मोर्चा संभाले हुए हैं.

एमएलसी जगजीवन प्रसाद साहू के लखनऊ स्थित आवास पर उनके साथ विधानसभा चुनाव को लेकर चर्चा करते महेश पांडेय.

विपक्ष की यह जिम्मेदारी होती है कि वह सत्ता पक्ष को निरंकुश न होने दे. उसकी गलत नीतियों का खुलकर विरोध करे लेकिन बरेली में यह काम अकेले महेश पांडेय ही कर पा रहे हैं.
जब से वीरपाल सिंह यादव और डा. मोहम्मद खालिद जैसे कद्दावर नेता सपा को छोड़कर गए हैं तब से महेश पांडेय जैसे नेताओं पर ही विपक्ष की भूमिका को जिंदा रखने की जिम्मेदारी आ गई है.
शहर विधानसभा सीट से टिकट की कतार में महेश पांडेय कहीं नहीं खड़े हैं. वह दावेदारों की भीड़ का हिस्सा भी नहीं हैं लेकिन कद्दावर नेताओं के अभाव में फिलहाल सबसे बड़ा चेहरा महेश पांडेय ही नजर आ रहे हैं. बरेली में फिलहाल कोई भी ऐसा समाजवादी नहीं है जो खुलकर महेश पांडेय का विरोध कर सके. इस संबंध में जब महेश पांडेय से बात की गई तो उन्होंने कहा कि मैंने अपनी पूरी जिंदगी पार्टी की सेवा में समर्पित कर दी है. मैंने आज तक कभी भी विधानसभा का टिकट नहीं मांगा और न ही अब मांगूंगा. अगर पार्टी मुझे इस लायक समझेगी कि मुझे विधानसभा टिकट दिया जाए तो पार्टी को निराश बिल्कुल नहीं करूंगा. मैं दावेदारों की भीड़ का हिस्सा कभी नहीं रहा और न कभी रहूंगा. मुझे जिला महासचिव और जिला सहकारी संघ के चेयरमैन के पद की जिम्मेदारी स्वयं मुलायम सिंह यादव ने दी थी और मैंने उस जिम्मेदारी का पूरी ईमानदारी के साथ निर्वहन किया. अब अगर विधानसभा की जिम्मेदारी देती है तो उसका भी पूरी ईमानदारी के साथ निर्वहन करूंगा. मेरे लिए पार्टी सर्वोपरि है. निजी हित के लिए मैं कभी पार्टी का नुकसान नहीं कर सकता.
बहरहाल, महेश पांडेय पुराने कद्दावर समाजवादी होने के साथ ही ब्राह्मण भी हैं जो हर धर्म और जाति के लोगों में गहरी पैठ भी रखते हैं. साथ ही समाजवादी पार्टी के चेहरे का संकट दूर करने में सक्षम भी हैं. पार्टी अगर उन पर दांव खेलती है तो भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

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