नीरज सिसौदिया, बरेली
सियासी ऊंट कब किस करवट बैठ जाएगा यह कोई नहीं जानता। कल तक जो समझते थे कि ये दुनिया उनके बगैर दो कदम भी चल नहीं सकती वे आज दो गज जमीन में दफन बैठे हैं। कहा जाता है कि वक्त हमेशा एक जैसा नहीं रहता और हर किसी का कोई न कोई विकल्प जरूर होता है। बस जरूरत उसे तलाश कर सही जगह तक पहुंचाने की होती है। कुदरत का यह कानून सियासत पर भी सटीक बैठता है। बरेली की सियासत भी इन दिनों कुछ ऐसे ही दौर से गुजर रही है। खास तौर पर समाजवादी पार्टी में जिस तेजी से सियासी मोहरे आगे बढ़ाए जा रहे हैं उससे तो यही संदेश जा रहा है कि वाकई में अब नई हवा है, नई सपा है। हाल ही में पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने जिस तरह से पूर्व जिला अध्यक्ष शुभलेश यादव का कद बढ़ाते हुए उन्हें प्रदेश कार्यकारिणी में जगह दी है उसने बरेली जिले में एक नई बहस छेड़ दी है।
प्रदेश कार्यकारिणी में यादव समाज से सिर्फ पांच प्रतिनिधियों को जगह दी गई है जिनमें तीन मौजूदा विधायक और एक पूर्व विधायक शामिल हैं। एकमात्र शुभलेश यादव ऐसे यादव नेता हैं जो न तो किसी संवैधानिक पद पर आसीन हैं और न ही वह कभी विधानसभा चुनाव लड़े हैं। ऐसे में शुभलेश यादव का कद बढ़ाने को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि समाजवादी पार्टी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी गैर यादव को पार्टी के जिला अध्यक्ष पद की कमान सौंपी गई थी। इससे पहले पूर्व सांसद वीरपाल सिंह यादव का एकछत्र राज रहा। वीरपाल के प्रसपा में जाने के बाद शुभलेश यादव को भी यह जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला लेकिन बाद में पूर्व मंत्री अता उर रहमान गुट हावी हो गया और बसपा से सपा में आए अता उर रहमान के करीबी अगम मौर्य को जिला अध्यक्ष पद की कमान सौंप दी गई। अगम मौर्य जिला अध्यक्ष तो बन गए लेकिन वीरपाल सिंह यादव की तुलना में वह संगठन को एकसूत्र में बांधने में नाकाम साबित हुए। नतीजतन वीरपाल सिंह यादव में जो गुटबाजी कभी खुलकर सामने नहीं आ सकी थी वह अब बीच सड़क पर आ गई। अगम मौर्य पार्टी की जगह पूर्व मंत्री अता उर रहमान गुट के नेता बनकर रह गए। पुराने लोग तो उनसे नाराज थे ही दूसरे दलों को छोड़कर आने वाले नेताओं ने भी अगम मौर्य का रवैया देखकर उनसे दूरी बना ली। वीरपाल सिंह यादव के समय जहां महानगर कमेटी भी जिला कमेटी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती थी वहीं अगम मौर्य के जिला अध्यक्ष बनते ही महानगर कमेटी ने अलग राह पकड़ ली। महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी पर अगम मौर्य कभी हावी नहीं हो सके। पार्टी के बीच उपजी गुटबंदी की खबर हाईकमान को भी थी। पार्टी को विकल्प की तलाश थी और उसे लगा कि वीरपाल सिंह यादव का विकल्प सिर्फ कोई यादव ही हो सकता है। चूंकि शुभलेश यादव जाना पहचाना चेहरा थे और जिला अध्यक्ष भी रह चुके थे। ऐसे में बरेली की सियासत में समाजवादी पार्टी का खोया हुआ वजूद पुन: स्थापित करने एवं संगठन को एकजुट करने के लिए शुभलेश यादव का कद बढ़ाना जरूरी भी था। आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को एकजुट करने के लिए भी यह जरूरी था क्योंकि वीरपाल सिंह के जाने के बाद यादव समाज बरेली में खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा था। यही वजह है कि शुभलेश यादव को प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य मनोनीत किया गये। अटकलें यह भी लगाई जा रही हैं कि जल्द ही जिला अध्यक्ष अगम मौर्य की जगह कोई नया चेहरा जिला अध्यक्ष पद की कमान संभाल सकता है। हालांकि चुनाव से पहले इसकी संभावनाएं कम ही नजर आती हैं लेकिन सूत्र बताते हैं कि अगम मौर्य किसी सीट से उम्मीदवार हो सकते हैं और उनकी जगह किसी यादव को ही जिला अध्यक्ष बनाया जा सकता है। बहरहाल, शुभलेश यादव को वीरपाल सिंह यादव के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। वह अखिलेश यादव के विश्वासपात्र भी रहे हैं। ऐसे में शुभलेश यादव के समक्ष एक बड़ी चुनौती भी है। प्रदेश स्तर पर उन्हें जो जिम्मेदारी मिली है उसे वह किस तरह निभाते हैं, उसी से शुभलेश यादव के सियासी भविष्य का फैसला होगा।फिलहाल अखिलेश यादव शुभलेश यादव पर मेहरबान हैं। अब देखना यह होगा कि क्या शुभलेश यादव उनकी उम्मीदों पर खरे उतर पाते हैं या नहीं?

अखिलेश हैं मेहरबान, क्या वीरपाल सिंह का विकल्प बन सकेंगे शुभलेश यादव?




