यूपी

सरकारी खजाने को राजस्‍व की चपत लगा रहे नगर निगम के अफसर, अकेले टैक्‍स डिपार्टमेंट में ही हो रहा अरबों का खेल, जानिये कैसे?

नीरज सिसौदिया, बरेली
विकास कार्यों को लेकर एक तरफ नगर निगम जहां बजट का संकट होने का रोना रो रहा है वहीं, नगर निगम के कुछ भ्रष्‍ट अधिकारियों की वजह से नगर निगम के राजस्‍व को अरबों रुपये की चपत लगाई जा रही है। इस काम में टैक्‍स विभाग पहले पायदान पर है। अकेले टैक्‍स विभाग की कारगुजारी ही सरकारी खजाने को अरबों रुपये के टैक्‍स की चपत लगा रहा है। शहर में सैकड़ों ऐसी मार्केट हैं जिनसे कर वसूली नहीं की जा रही है जबकि टैक्‍स विभाग के अधिकारी सौ फीसदी वसूली का दावा करते नहीं थकते हैं। इस पूरे खेल में टैक्‍स इंस्‍पेक्‍टर से लेकर नगर आयुक्‍त तक की भूमिका संदिग्‍ध बताई जा रही है। निगम अधिकारियों द्वारा इस काले खेल को किस तरह अंजाम दिया जा रहा है, इसे बारीकी से समझना होगा।
दरअसल, बरेली शहर उत्‍तर प्रदेश का सातवां सबसे बड़ा मेट्रोपोलिटन शहर है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां की आबादी लगभग नौ लाख से भी अधिक है। आसपास के दायरे में कोई मेट्रो सिटी न होने की वजह से बरेली कारोबार का भी हब है। यही वजह है कि बरेली में छोटी-बड़ी हजारों मार्केट विकसित कर दी गई हैं। नियमानुसार, एक व्‍यावसायिक संपत्ति से आवासीय संपत्ति का लगभग पांच गुना टैक्‍स वसूला जाना चाहिए। इस हिसाब से नगर निगम के दायरे में आने वाली व्‍यावसायिक संपत्ति से अरबों रुपये का कॉमर्शियल टैक्‍स प्रतिवर्ष वसूला जाना चाहिए लेकिन नगर निगम का कर विभाग लगभग आधी व्‍यावसायिक संपत्तियों से ही कर वसूली कर रहा है। ऐसा नहीं है कि नगर निगम के अधिकारी कर वसूल पाने में सक्षम नहीं हैं। वे पूरी तरह सक्षम है लेकिन निजी स्‍वार्थ के चलते व्‍यावसायिक कर वसूली में खेल किया जा रहा है।
दरअसल, निगम अधिकारी जान-बूझ कर व्‍यावसायिक कर वसूली में लापरवाही बरत रहे हैं। सबसे पहले कर दाता को छोड़ दिया जाता है कि वह टैक्‍स जमा करे अथवा न करे। उसके बाद जब व्‍यावसायिक कर लाखों और करोड़ों रुपये का आंकड़ा पार कर लेता है तो उस कर दाता को नोटिस भेजा जाता है। नोटिस भेजने के बाद संबंधित कर दाता नगर निगम के अधिकारियों के चक्‍कर काटता है। उसके बाद समझौते का खेल शुरू होता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी कर दाता पर एक करोड़ रुपये का टैक्‍स बकाया होता है तो नगर निगम के अधिकारी नियमों की आड़ लेकर उसके टैक्‍स को पांच से दस लाख रुपये में ही समेट देते हैं और कर दाता से लाखों रुपये वसूल कर लिए जाते हैं। कर दाता भी एक करोड़ रुपये का टैक्‍स देने की जगह 50 लाख रुपये खुशी-खुशी नगर निगम के अधिकारियों को देकर चलता बनता है। इससे कर दाता का सारा टैक्‍स भी अदा हो जाता है और अधिकारियों की भी जेबें गर्म हो जाती हैं। चपत सिर्फ सरकारी खजाने को लगती है। जो जनप्रतिनिधि इसके खिलाफ आवाज उठाने का प्रयास करता है उसका मुंह भी नोटों से बंद कर दिया जाता है। कई जनप्रतिनिधि तो स्‍वयं कर दाताओं की अधिकारियों से सेटिंग कराकर मोटी राशि वसूलते हैं। हाल ही में ऐसा ही एक मामला टाटा मोटर्स के कॉमर्शियल टैक्‍स का सामने आया था जिसमें दो करोड़ ररुपये के टैक्‍स को 18 लाख रुपये में समेट दिया गया था। इस मामले में दो लोगों को निलंबित भी किया गया था लेकिन मोटी मछलियां अब भी सुरक्षित हैं।
अब सवाल यह उठता है कि कर इंस्‍पेक्‍टर सौ फीसदी वसूली क्‍यों नहीं करवा पा रहे? ऐसे अधिकारियों के खिलाफ आला अधिकारी कार्रवाई क्‍यों नहीं कर रहे? उन अधिकारियों का वेतन क्‍यों नहीं रोका जाता जो अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रहे? क्‍या योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल में नगर निगम के इस भ्रष्‍टाचार पर लगाम लग सकेगी? ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब जनता चाहती है।
बहरहाल, बरेली नगर निगम में अरबों रुपये का यह खेल खुलेआम चल रहा है। नगर आयुक्‍त जैसे जिम्‍मेदार अधिकारियों को भी सरकारी खजाने को लग रही चपत से कोई लेना-देना नहीं है। पिछले साल कर विभाग ने महज 67 करोड़ रुपये की ही राजस्‍व वसूली की थी जबकि यह आंकड़ा अरबों रुपये हो सकता था।

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