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संघ की सेवा के लिए चेतराम ने छोड़ दी थी सरकारी नौकरी, पढ़ें स्वयंसेवक से प्रचारक बनी एक शख्सियत का सफरनामा…

चेतराम जी “3 अगस्त/जन्म-दिवस” पर विशेष

नीरज सिसौदिया
पंजाब में जन्म लेकर हिमाचल प्रदेश को कर्मभूमि बनाने वाले चेतराम जी प्रचारक जीवन में और उसके बाद भी प्रचारक की ही तरह सक्रिय रहे। उनका जन्म तीन अगस्त, 1948 को गांव झंडवाला हनुमंता (जिला अबोहर) के एक किसान श्री रामप्रताप एवं श्रीमती दाखा देवी के घर में हुआ था। लगभग 250 साल पहले उनके पूर्वज हनुमंत जी राजस्थान के उदयपुर से यहां आये थे। उनके सत्कार्यों से वह गांव ही झंडवाला हनुमंता कहलाने लगा।

चेतराम जी की शिक्षा गांव मोजगढ़ और फिर अबोहर में हुई। अबोहर में ही वे स्वयंसेवक बने। शिक्षा पूरी होने पर उनकी सरकारी नौकरी लग गयी; पर संघ की लगन होने के कारण 1971 में नौकरी छोड़कर वे प्रचारक बन गये। मुक्तसर नगर और फाजिल्का तहसील के बाद 1973 से 82 तक वे रोपड़ जिला प्रचारक रहे। इस बीच आपातकाल भी लगा; पर पुलिस उन्हें पकड़ नहीं सकी। प्रायः वे रेंजर की वरदी पहन कर वन और पहाड़ों में होते हुए इधर से उधर निकल जाते थे। वे तैरने में भी बहुत कुशल थे।
1982 में उन्हें हिमाचल में बिलासपुर जिले का काम मिला। इसके बाद अंत तक बिलासपुर ही उनका केन्द्र रहा। इस दौरान उन्होंने बिलासपुर के काम को बहुत मजबूत बनाया। कुछ साल बाद वे मंडी विभाग के प्रचारक बने। वे अध्यापकों से बहुत संपर्क रखते थे। इससे छात्रों से भी संपर्क हो जाता था। फिर इसका लाभ शाखा विस्तार के लिए मिलता था। शाखा तथा कार्यकर्ताओं के नाम उन्हें याद रहते थे। अतः वे डायरी आदि का प्रयोग कम ही करते थे।

1990 में किसी मानसिक उलझन के चलते उन्होंने प्रचारक जीवन छोड़ दिया; पर गृहस्थी फिर भी नहीं बसायी। उन्होंने एक गोशाला खोली तथा फिर एक कार्यकर्ता के साथ साझे में ट्रक खरीदा। इससे कुछ आय होने लगी, तो वे प्रांत कार्यवाह के नाते फिर पूरी गति से संघ के काम में लग गये; पर अब प्रवास का व्यय वे अपनी जेब से करते थे। गोशाला का काम उन्होंने अपने भतीजे को सौंप दिया। उन दिनों शिक्षा के क्षेत्र में संघ के कदम बढ़ रहे थे। सबकी निगाह उन पर गयी और उन्हें ‘हिमाचल शिक्षा समिति’ का काम दे दिया गया। चेतराम जी अब विद्यालयों के विस्तार में लग गये।

संघ के वरिष्ठ प्रचारक ठाकुर रामसिंह को चेतराम जी पर बहुत विश्वास था। जब ठाकुर जी पर ‘इतिहास संकलन समिति’ का काम आया, तो उन्होंने हिमाचल प्रदेश में यह काम भी चेतराम जी को ही सौंप दिया। इसके बाद ‘ठाकुर जगदेव चंद स्मृति शोध संस्थान, नेरी (हमीरपुर)’ की देखभाल भी उनके ही जिम्मे आ गयी। चेतराम जी का अनुभव बहुत व्यापक था। इसके साथ ही वे हर काम के बारे में गहन चिंतन करते थे। कार्यकर्ताओं के स्वभाव और प्रवृत्ति को भी वे खूब पहचानते थे। इस कारण उन्हें सर्वत्र सफलता मिलती थी। हिमाचल में आने वाले सभी प्रांत प्रचारक भी उनके परामर्श से ही काम करते थे।

इस भागदौड़ और अस्त-व्यस्तता में वे पार्किन्सन नामक रोग के शिकार हो गये। इससे उन्हें चलने में असुविधा होने लगी। बहुत सी बातें उन्हें अब याद नहीं रहती थीं। दवाओं से कुछ सुधार तो हुआ; पर अब पहले जैसी बात नहीं रही। अतः उनके साथ राकेश नामक एक गृहस्थ कार्यकर्ता को नियुक्त कर दिया गया। राकेश तथा उसकी पत्नी ने चेतराम जी की भरपूर सेवा की। चेतराम जी जहां प्रवास पर जाते थे, तो राकेश भी साथ में जाता था।

चार साल ऐसे ही काम चला; पर फिर कष्ट बढ़ने पर प्रवास से विश्राम देकर बिलासपुर में ही उनके रहने की व्यवस्था कर दी गयी। अंतिम समय में कुछ दिन शिमला मैडिकल कॉलिज में भी उनका इलाज चला। वहां पर ही पांच अगस्त, 2017 को उनका निधन हुआ। उनके परिजनों की इच्छानुसार उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव झंडवाला हनुमंता में ही किया गया।

(साभार : विद्या भारती उत्तर क्षेत्र के क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख राजेंद्र जी की फेसबुक वॉल से )

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