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अहसन मियां, फूल बाबू और इं. अनीस अहमद खां ने ढाई दशक पहले शुरू कर दी थी मदरसे में आधुनिक शिक्षा की पढ़ाई, अफसर और डॉक्टर बन चुके हैं मदरसे के कई छात्र, पढ़ें स्पेशल रिपोर्ट

नीरज सिसौदिया, बरेली
देशभर में इन दिनों मदरसों की चर्चा हो रही है। कहीं मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं तो कहीं मदरसों को बंद करने की चर्चाएं जोरों पर हैं। हाल ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली के एक मदरसे में जाकर बच्चों से सीधा संवाद किया। इसे लेकर भी तरह-तरह की बातें कही जा रही हैं। यूपी की आंवला विधानसभा सीट से विधायक धर्मपाल सिंह ने हाल ही में कहा था कि यूपी के मदरसों में अब नई शिक्षा नीति के तहत पाठ्यक्रम निर्धारित किया जाएगा। मदरसों की शिक्षा व्यवस्था को लेकर इस तरह की बातें आम तौर पर इसलिए होती हैं क्योंकि ये मदरसे प्रचार – प्रसार से हमेशा दूर रहे। चूंकि यहां पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे गरीब घरों से ताल्लुक रखते हैं। यही वजह है कि ये मदरसे अच्छे कार्यों के लिए कभी मीडिया में सुर्खियां नहीं बटोर सके। इसके विपरीत कई मदरसे ऐसे हैं जो न सिर्फ बच्चों को धर्म के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा दे रहे हैं बल्कि वे सीबीएसई से एफिलिएटेड भी हैं। इन मदरसों के कई बच्चे तो सरकारी विभागों में आईएएस-पीसीएस अफसर और डॉक्टर- इंजीनियर तक बन चुके हैं। ऐसे ही दो मदरसे उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर और बरेली जिलों में संचालित किए जा रहे हैं। इन दोनों मदरसों की शुरुआत तीन दोस्तों ने मिलकर की थी। इनमें से पहला नाम पूर्व मंत्री अनीस अहमद खां उर्फ फूल बाबू का है। दूसरे सपा नेता इंजीनियर अनीस अहमद खां हैं और तीसरी शख्सियत सैयद अहसन मियां की है जो इस समय मदरसे की पूरी देखरेख कर रहे हैं।

फूल बाबू, पूर्व मंत्री
इंजीनियर अनीस अहमद खां
अहसन मियां

इंजीनियर अनीस अहमद खां बताते हैं कि वर्ष 1996 में शाहजहांपुर जिले के मोहल्ला चमकनी में उन्होंने फूल बाबू, अहसन मियां और कुछ अन्य साथियों के साथ मिलकर फातिमा पब्लिक स्कूल के नाम से मदरसे की नींव रखी थी। इस मदरसे को सीबीएसई से मान्यता मिल चुकी है और यहां 12 वीं तक की पढ़ाई कराई जाती है। उन्होंने बताया कि इस मदरसे में धार्मिक शिक्षा के साथ ही आधुनिक शिक्षा भी दी जाती है। यहां के कुछ बच्चों ने राष्ट्रीय स्तर पर नाम रोशन किया है। वहीं, कुछ सरकारी अफसर, डॉक्टर और इंजीनियर भी बन चुके हैं। उन्होंने बताया कि वैसे तो इस मदरसे को चलाने में कई लोगों का सहयोग मिल रहा है लेकिन मुख्य रूप से इसका जिम्मा पूर्व मंत्री फूल बाबू, सैयद अहसन मियां और वह स्वयं देखते हैं। बता दें कि इंजीनियर अनीस अहमद खां ने इन मदरसों के कई बच्चों को शैक्षणिक रूप से गोद लेकर उनकी पढ़ाई लिखाई का जिम्मा भी उठाया है।


इसी तरह एक मदरसे की शुरुआत फूल बाबू, इंजीनियर अनीस अहमद खां और अहसन मियां के संयुक्त प्रयासों से बरेली जिले के नरियावल इलाके में वर्ष 2007 में फातिमा लेयॉन पब्लिक स्कूल के नाम से की गई थी। इसकी खासियत यह है कि यहां बेटे और बेटियों दोनों को तालीम दी जाती है।
चमकनी का मदरसा सिर्फ बेटियों के लिए है। इंजीनियर अनीस अहमद खां बताते हैं कि बेटियों के लिए मदरसा खोलने की कई वजहें थीं। यहां की गरीब बेटियां अच्छी शिक्षा से वंचित हो जाती थीं। महंगे स्कूलों में शिक्षा लेना इनके लिए संभव नहीं था। इसलिए हमने यहां इन बेटियों के लिए मदरसे की शुरुआत की।
वह कहते हैं कि जब एक बेटा पढ़ता है तो सिर्फ एक घर को रोशन करता है लेकिन जब एक बेटी पढ़ती है तो वह दो परिवारों की तकदीर बदल देती है। पहला परिवार उसके पिता का घर होता है और दूसरा परिवार उसके पति का घर होता है। इसीलिए बेटियों की शिक्षा बेहद जरूरी है। इसी सोच के साथ में फातिमा पब्लिक स्कूल के नाम से मदरसे की शुरुआत की गई थी। इसमें बेटियों को 12 वीं तक की शिक्षा दी जाती है। जिसमें धर्म की शिक्षा के साथ ही आधुनिक शिक्षा भी दी जा रही है। आज मदरसे की कई बेटियां विभिन्न क्षेत्रों में नाम रोशन कर चुकी हैं।
इंजीनियर अनीस अहमद खां बताते हैं कि हम एक मेडिकल कॉलेज भी खोलना चाहते थे लेकिन किन्हीं कारणों से वह सपना पूरा नहीं हो सका।


बता दें कि मदरसा सिर्फ इस्लाम धर्म की ही शिक्षा नहीं देता है बल्कि इस शब्द का इस्तेमाल सभी तरह के स्कूल, मेडिकल कॉलेज, विश्वविद्यालय आदि के लिए भी किया जाता है।
मदरसों में शिक्षा पूरी करने के बाद शिक्षा के अनुसार ही उपाधि देने की प्रणाली है। उदाहरण के तौर पर “आलिम” को इस्लाम का जानकार माना जाता है. हाफिज की उपाधि उसको दी जाती है जिसे पूरी कुरान अच्छे से याद होती है, मुफ़्ती उस व्यक्ति को बोला जाता है जो कि शरीआ कानून का विशेषज्ञ होता है. इसी प्रकार हदीस लेखन में विद्वान व्यक्ति को मुहादित कहा जाता है. इसी तरह से इस्लाम के ज्ञान के अनुसार पद एवं उपाधियां दी जाती हैं.
संचार समिति एवं जस्टिस संचार की रिपोर्ट के अनुसार भारत में मदरसों की बात करें, तो भारत में केवल 4 प्रतिशत बच्चे ही मदरसों में जाते हैं, जिनमें अधिकतर गरीब परिवारों के होते हैं या फिर किसी धार्मिक इस्लामिक परिवार से. आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग 100000 के आस पास मदरसे मौजूद हैं, लेकिन लगभग 45 मदरसे ही ऐसे हैं जहां की परिस्थिति अच्छी है.
दिलचस्प बात यह है कि आज मदरसों में जिस शिक्षा की तरफदारी की जा रही है उस सोच पर फूल बाबू, इंजीनियर अनीस अहमद खां और सैयद अहसन मियां ने ढाई दशक पहले ही अमल कर दिया था।
ये मदरसे तो बानगी मात्र हैं। ऐसे कई मदरसे यूपी और देशभर में मौजूद हैं जो बे बस मासूमों की तकदीर संवारने का काम कर रहे हैं लेकिन प्रचार-प्रसार के अभाव में इनकी नेकियां गुमनाम रह जाती हैं। अब इन मदरसों के संचालकों को भी यह समझना होगा कि अच्छी चीजों का प्रचार नहीं होगा तो बुरी चीजें ही प्रचारित होती रहेंगी जो समाज के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं होगा। इसलिए अच्छी चीजों का प्रचार जरूर करें ताकि बुरी चीजों के दुष्प्रचार को व्यापक रूप लेने का अवसर न मिले।

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