नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल के तीन वर्ष अब पूरे हो चुके हैं। इन तीन वर्षों में यूपी के साथ ही बरेली की सियासत में भी काफी कुछ बदल चुका है। भाजपा आज योगी के बुलडोजर से उतरकर हिन्दुत्व, पिछड़ों और दलितों के रथ पर सवार है और समाजवादी पार्टी की साइकिल पीडीए के पहियों पर आगे बढ़ रही है। साइकिल ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए के दम पर शानदार प्रदर्शन तो किया लेकिन उत्तर प्रदेश के कुछ इलाके ऐसे हैं जहां आज भी समाजवादी पार्टी की जीत महज एक हसीन ख्वाब से ज्यादा कुछ नहीं है। बरेली महानगर इन्हीं में से एक है।
बरेली महानगर के अंतर्गत दो विधानसभा सीटें आती हैं। एक बरेली कैंट और दूसरी बरेली शहर विधानसभा सीट। इन दोनों ही सीटों पर समाजवादी पार्टी आज तक जीत हासिल नहीं कर सकी है। हां, अविभाजित कैंट विधानसभा सीट पर जरूर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। एक दौर वो भी था जब कांग्रेस ने यहां जीत हासिल की थी लेकिन कांग्रेस के दिन अब लद चुके हैं। आधे कांग्रेसियों का भगवाकरण हो चुका है तो कुछ साइकिल चला रहे हैं। बचे-कुचे कांग्रेसी अब उम्र के आखिरी पड़ाव पर उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि बरेली महानगर में ऐसा क्या है कि समाजवादी पार्टी वर्षों से ये सीटें नहीं जीत पा रही। जानकार इसके लिए समाजवादी पार्टी के सवर्ण प्रेम को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका मानना है कि बरेली का सवर्ण मतदाता भाजपा का वफादार है। समाजवादी पार्टी हर बार इस उम्मीद में सवर्ण उम्मीदवार उतार देती है कि शायद कुछ सवर्ण वोट भाजपा से खिसककर सपा के पाले में आ जाए लेकिन ऐसा नहीं होता। इसके विपरीत सवर्ण उम्मीदवार उतारने पर मुस्लिम, दलित एवं पिछड़े खुद को ठगा सा महसूस करते हैं और वो मतदान को बाहर ही नहीं निकलते। वहीं नाराज मुस्लिम दावेदार भी कोपभवन में बैठ जाते हैं और उनके समर्थक सपा उम्मीदवार को सबक सिखाने में जुट जाते हैं। नतीजतन सपा उम्मीदवार हार जाता है।
विगत विधानसभा चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ। विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटे मुस्लिम नेताओं को दरकिनार कर सवर्ण हिन्दुओं को उतार दिया गया। सपा के पक्ष में माहौल बनने के बावजूद दोनों सीटें भाजपा के खाते में चली गईं।
समाजवादी पार्टी को यह समझना होगा कि बरेली महानगर में सपा का संगठन अभी इतना मजबूत नहीं है कि सवर्ण वोट खुद ब खुद उसके खाते में आ जाएं। मॉडल टाउन, राजेंद्र नगर सहित कुछ इलाके तो ऐसे हैं जहां पार्टी को नगर निगम चुनाव के लिए उम्मीदवार भी ढूंढे नहीं मिलते। इसके बावजूद सवर्ण उम्मीदवारों को तरजीह देने से पीडीए के लोग खुद को ठगा सा महसूस करते हैं।
मायावती के कमजोर होने के बाद दलित भी अब सपा से उम्मीद लगाए बैठा है। मुस्लिम पहले ही सपा की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं। ऐसे में ऐन टाइम पर सवर्ण उम्मीदवार की एंट्री होती है और सबकी उम्मीदों पर पानी फिर जाता है।
पीडीए के बीच यह संदेश जाता है कि समाजवादी पार्टी भी सिर्फ वोट हासिल करने के लिए दिखावे के लिए पीडीए राग अलापती है और उम्मीदवार सवर्ण को बनाती है।
सपा को यह समझना होगा कि दो नावों पर सवार होकर विधानसभा की मंजिल हासिल नहीं की जा सकती। अगर उसे वाकई पीडीए से प्रेम है तो उसे पीडीए को पूरी तरह आत्मसात करना होगा। पार्टी के अहम पदों से लेकर उम्मीदवार तक सब कुछ पीडीए ही होना चाहिए। पीडीए का नारा देकर सवर्ण को कुर्सी देने का खेल अब नहीं चलने वाला। जब सरकार आ जाए तब पार्टी के सवर्ण कार्यकर्ताओं को भी उनका बनता हक जरूर दिया जाना चाहिए लेकिन सत्ता का सफर सिर्फ पीडीए के पहियों से ही तय किया जा सकता है, सवर्णों के दम पर नहीं।
बहरहाल, 2027 के चुनाव में महज दो साल शेष हैं। आरएसएस और भाजपा कार्यकर्ताओं ने अपनी तैयारी तेज कर दी है। बरेली महानगर में डॉ. अनीस बेग, इंजीनियर अनीस अहमद खां और मोहम्मद कलीमुद्दीन जैसे नेता भी अपनी-अपनी चुनावी तैयारी कर रहे हैं। इस बार का मुकाबला बेहद दिलचस्प होने जा रहा है।
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