नीरज सिसौदिया, नई दिल्ली
लखनऊ के विशाल सभा स्थल में गुरुवार को जब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती मंच पर पहुंचीं, तो उनके चेहरे पर वही सधी हुई दृढ़ता थी जिसके लिए वे जानी जाती हैं। लेकिन उनके भाषण के बीच-बीच में जो शब्द झलक रहे थे, वे किसी आत्मविश्वासी नेता के नहीं, बल्कि उस नेता के थे जिसे अपने खोते जनाधार का भय सताने लगा है। यह भय नया नहीं है, पिछले एक दशक से उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलितों की राजनीति की जो नई धाराएं बनी हैं, उन्होंने धीरे-धीरे मायावती के एकछत्र साम्राज्य को चुनौती देनी शुरू कर दी है। इस रैली में मायावती का पूरा संबोधन उसी चुनौती का जवाब था और यह स्वीकारोक्ति भी कि दलित राजनीति अब बसपा के कब्जे में नहीं रही। रैली ने साफ कर दिया कि अब मायावती के लिए उत्तर प्रदेश की सियासत पहले जैसी नहीं रही। चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी और जयप्रकाश भास्कर की सर्वजन आम पार्टी जैसी उभरती ताकतें अब मायावती के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा रही हैं। जो मायावती कभी दलित राजनीति की एकमात्र आवाज मानी जाती थीं, आज वही अपने ही किले की नींव कमजोर होते देख रही हैं। यही वजह है कि उन्होंने नौ साल बाद लखनऊ में इतनी बड़ी रैली की ताकि यह संदेश दिया जा सके कि बसपा अभी भी मैदान में है।
जयप्रकाश भास्कर की सर्वजन आम पार्टी धोबी समाज की सशक्त आवाज बनकर उभर रही है, वहीं चंद्रशेखर आजाद ने लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज कर यह साबित कर दिया कि दलित राजनीति में अब बसपा की एकछत्र बादशाहत खत्म हो चुकी है। यही मायावती की सबसे बड़ी चिंता है कि जिन वर्गों पर उनका असर था, वे अब नई राजनीतिक धारा की ओर मुड़ रहे हैं।

मायावती ने अपने भाषण में कहा, ”पार्टी के लोगों को उत्तर प्रदेश सहित देश के अन्य राज्यों में भी विरोधी पार्टियों को सत्ता में आने से जरूर रोकना है। खासकर उत्तर प्रदेश में तो बसपा की फिर से अकेले पूर्ण बहुमत की सरकार बनाना बहुत जरूरी है, जिसे यहां कांग्रेस, भाजपा, सपा और अन्य सभी विरोधी पार्टियां षड्यंत्र और हथकंडे अपना कर इसे रोकने का हर संभव प्रयास करेंगी। पूरे देश में विरोधी पार्टियों ने बसपा को कमजोर करने के लिए दलितों के वोट बांटने का एक और षड्यंत्र रचा है। अब विरोधी पार्टियों ने बसपा के विशेष कर दलित आधार वोट को बांटने के लिए इसी समाज के कुछ लोगों को इस्तेमाल करके अनेक पार्टियां और संगठन बनवा दिए हैं, जिससे यह जातिवादी पार्टियां चुनाव में अपने-अपने फायदे के हिसाब से उम्मीदवार खड़े करवा कर बसपा को कमजोर करने में लगी हैं। अब हर छोटे बड़े चुनाव में आप लोगों को अपना एक भी वोट ऐसे सभी स्वार्थी एवं बिकाऊ संगठनों को नहीं देना है बल्कि अपनी एकमात्र हितैषी पार्टी बसपा को ही देना है ताकि यह पार्टी फिर से अपना बेहतर परिणाम लाकर यहां की उत्तर प्रदेश की सत्ता में फिर से आ सके।’

पिछले तीन दशक में शायद पहली बार ऐसा हुआ है कि दलित राजनीति पर बसपा का एकाधिकार टूटता नज़र आ रहा है। मायावती जो कभी दलितों की “एकमात्र नेता” मानी जाती थीं, अब उसी समाज के भीतर से सवाल उठ रहे हैं कि क्या दलितों की आवाज सिर्फ बसपा तक सीमित रहनी चाहिए?
दलितों की आवाज उठाने वाले दलों को बिकाऊ बताने वाली मायावती ने भाजपा की जमकर तारीफ की। इससे संदेश साफ है कि इन छोटे दलों की वजह से मायावती के मंसूबों पर पानी फिर रहा है। उन्हें यह बर्दाश्त नहीं हो रहा कि बसपा के अलावा कोई और दल कैसे दलितों का नेतृत्व कर सकता है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर बसपा के होते हुए भी दलितों के लिए अन्य पार्टियों की जरूरत क्यों पड़ी? इसका सीधा सा जवाब है कि बसपा उस मकसद से भटक गई जिस मकसद से कांशीराम ने इसकी स्थापना की थी। दलित समाज को जब यह लगने लगा कि बसपा ने सिर्फ उनके वोटों का सौदा निजी स्वार्थ के लिए किया है तो इन छोटे दलों का उदय हुआ और आज ये दल अपनी एक अलग पहचान बनाते जा रहे हैं और मायावती हाशिये पर आ चुकी हैं। यही मायावती की घबराहट की सबसे बड़ी वजह है। यह सब जानते हैं कि बसपा में टिकट किस तरह बांटे जाते हैं।
बहरहाल, जयप्रकाश भास्कर की सर्वजन आम पार्टी दलित धोबी समाज की आवाज बनकर उभर रही है तो वहीं चंद्रशेखर की पार्टी ने लोकसभा सीट जीतकर मायावती को भी गर्त में धकेल दिया है।
बहुजन समाज पार्टी की राजनीति हमेशा दलित एकता और सवर्ण विरोध की नींव पर टिकी रही। लेकिन जब मायावती ने 2007 में “बहुजन से सर्वजन” की ओर रुख किया और ब्राह्मण-दलित गठजोड़ की रणनीति अपनाई, उसी वक्त पार्टी की बुनियाद में दरार पड़नी शुरू हो गई।
अब वही दरार चौड़ी हो चुकी है। चंद्रशेखर और जयप्रकाश भास्कर जैसे नए नेता उसी वर्ग से उभरे हैं जिसे मायावती ने अपने “सर्वजन” प्रयोग में धीरे-धीरे हाशिए पर डाल दिया था। आज यही वर्ग बसपा से अलग होकर इन नए चेहरों के पीछे खड़ा हो रहा है।
मायावती की हाल की रैली में बार-बार यह बात दोहराई गई कि “दलित वोट न बिखरे, बसपा ही असली हितैषी है।” लेकिन सवाल यह उठता है कि अगर बसपा ही दलितों की सच्ची प्रतिनिधि थी, तो दलित समाज को नए राजनीतिक मंच की ज़रूरत क्यों पड़ी? पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश की सियासत में दलित राजनीति का भूगोल पूरी तरह बदल गया है। अब यह सिर्फ़ “दलित बनाम सवर्ण” की लड़ाई नहीं रही। नई पीढ़ी के दलित नेता स्वाभिमान, शिक्षा, रोजगार और सम्मान जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
चंद्रशेखर आजाद जहां संविधान और बाबा साहेब के आदर्शों को आधुनिक भाषा में प्रस्तुत कर रहे हैं, वहीं जयप्रकाश भास्कर सामाजिक समानता को आर्थिक स्वावलंबन से जोड़ रहे हैं। दोनों की राजनीति जाति से आगे बढ़कर दलित आत्मनिर्भरता की बात करती है। यही कारण है कि इन नेताओं का प्रभाव केवल जाटव समुदाय तक सीमित नहीं है; पासी, वाल्मीकि, कोरी, धोबी, निषाद जैसे वर्ग भी इनसे जुड़ने लगे हैं।
मायावती के लिए यह सबसे बड़ा खतरा है- क्योंकि बसपा अब सिर्फ़ “जाटव पार्टी” बनकर रह गई है, जबकि दलित समाज अब अपनी विविधता को राजनीतिक ताकत में बदल रहा है।
लखनऊ की रैली को मायावती ने “जनशक्ति प्रदर्शन” बताया, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि यह रैली एक रक्षात्मक अभियान थी। भाषण में उन्होंने भाजपा और सपा को खूब कोसा, लेकिन असली निशाना वे दो नई आवाजें थीं जो दलित राजनीति को नया आकार दे रही हैं।




