नीरज सिसौदिया, नई दिल्ली
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी सामाजिक और चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। समाजवादी पार्टी (सपा) ने लखनऊ में समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित विशाल ‘प्रबुद्ध सम्मेलन’ के जरिए साफ संकेत दिया है कि अब उसकी राजनीति केवल पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) तक सीमित नहीं रहने वाली। पार्टी अब अपने सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भाजपा के मजबूत सामाजिक आधार, खासकर ब्राह्मण और अन्य सवर्ण वर्गों में भी अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
यह सम्मेलन केवल एक राजनीतिक आयोजन नहीं था, बल्कि 2027 के चुनाव के लिए सपा की बदलती रणनीति का सार्वजनिक ऐलान भी माना जा सकता है।

दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने पीडीए रणनीति के दम पर शानदार प्रदर्शन किया था। पिछड़े, दलित और मुस्लिम मतदाताओं के बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़कर पार्टी ने 37 लोकसभा सीटें जीत लीं। इस सफलता ने अखिलेश यादव को भाजपा के सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी के रूप में स्थापित किया। लेकिन विधानसभा चुनाव लोकसभा से अलग होते हैं। यहां स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण और बूथ स्तर का संगठन कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है। यही कारण है कि सपा अब अपने सामाजिक गठबंधन को और व्यापक बनाने में जुटी है।

ब्राह्मण सम्मेलन क्यों महत्वपूर्ण है?
लखनऊ में आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन का समय और संदेश दोनों राजनीतिक रूप से अहम हैं। पार्टी ने इस आयोजन के लिए प्रदेशभर से हजारों लोगों को जुटाया। सांसद सनातन पांडेय को ब्राह्मण समाज के बीच संवाद की जिम्मेदारी दी गई। सम्मेलन से पहले उन्होंने वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर, आगरा, गोरखपुर, अयोध्या, बरेली, मुरादाबाद सहित कई जिलों का दौरा कर प्रभावशाली ब्राह्मण नेताओं और सामाजिक प्रतिनिधियों से संपर्क किया। बरेली में पार्टी के महानगर महासचिव पंडित दीपक शर्मा ने शानदार आयोजन करवाया। इससे साफ है कि यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि कई महीनों की तैयारी के बाद उठाया गया राजनीतिक कदम है।

जनेश्वर मिश्र का राजनीतिक प्रतीक
सपा ने सम्मेलन के लिए जनेश्वर मिश्र की जयंती का चयन भी सोच-समझकर किया। जनेश्वर मिश्र केवल ब्राह्मण समाज के नेता नहीं थे, बल्कि समाजवादी आंदोलन का बड़ा चेहरा रहे। पार्टी उनके जरिए यह संदेश देना चाहती है कि समाजवादी विचारधारा कभी किसी एक जाति तक सीमित नहीं रही। इसी रणनीति के तहत पहले ही वरिष्ठ ब्राह्मण नेता माता प्रसाद पांडेय को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया था। प्रो. अभिषेक मिश्र, सनातन पांडेय और पवन पांडेय जैसे नेताओं को भी लगातार आगे लाया जा रहा है।

पीडीए की नई व्याख्या
सम्मेलन में अखिलेश यादव का बयान सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। उन्होंने कहा कि भाजपा पीडीए से घबराई हुई है और अब उसकी नई-नई परिभाषाएं गढ़ रही है। इसी दौरान उन्होंने कहा कि “पीडीए में ‘प’ पंडित का भी है।”
राजनीतिक दृष्टि से यह बयान बेहद महत्वपूर्ण है। पिछले दो वर्षों से सपा पीडीए को पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के रूप में पेश करती रही है। अब उसी पीडीए में ‘पंडित’ जोड़कर अखिलेश ने संकेत दिया कि पार्टी अब इस अवधारणा को व्यापक सामाजिक गठबंधन के रूप में पेश करना चाहती है।

क्या भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण लंबे समय से भाजपा के सबसे मजबूत समर्थक माने जाते हैं। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में समय-समय पर ब्राह्मण असंतोष की चर्चाएं भी होती रही हैं। सपा इसी संभावित असंतोष को राजनीतिक अवसर में बदलना चाहती है। पार्टी का मानना है कि यदि वह अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार और पीडीए गठबंधन को बनाए रखते हुए ब्राह्मण मतों का छोटा हिस्सा भी अपने पक्ष में कर लेती है, तो 2027 की चुनावी तस्वीर बदल सकती है।

लेकिन चुनौती भी कम नहीं
सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह ब्राह्मणों को साधने की कोशिश में अपने पारंपरिक समर्थक वर्ग को कोई गलत संदेश न दे। पिछले कुछ वर्षों में पार्टी ने खुद को पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की सबसे मजबूत राजनीतिक आवाज के रूप में स्थापित किया है। यदि सवर्ण राजनीति पर अधिक जोर दिया गया, तो उसके मूल समर्थक वर्ग में भ्रम की स्थिति भी पैदा हो सकती है। इसी वजह से पार्टी लगातार यह कह रही है कि पीडीए किसी जाति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की अवधारणा है।

संगठन में प्रतिनिधित्व भी बड़ी परीक्षा
ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित कर देना एक बात है, लेकिन संगठन और टिकट वितरण में उसकी झलक दिखाना दूसरी। वर्तमान में सपा के 37 लोकसभा सांसदों में केवल एक सांसद ब्राह्मण समुदाय से हैं। विधानसभा में भी ब्राह्मण विधायकों की संख्या सीमित है। यदि पार्टी वास्तव में सवर्णों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहती है, तो उसे आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण, संगठनात्मक नियुक्तियों और चुनावी रणनीति में इसका असर भी दिखाना होगा। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सम्मेलन के बाद सबसे ज्यादा नजर इस बात पर रहेगी कि पार्टी संगठन और चुनावी उम्मीदवारों में क्या बदलाव करती है।

क्या बदल रही है सपा की राजनीति?
समाजवादी पार्टी की राजनीति लंबे समय तक यादव-मुस्लिम समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही। 2024 के चुनाव में इस समीकरण का विस्तार करते हुए अखिलेश यादव ने पीडीए का नया राजनीतिक फॉर्मूला दिया, जिसका फायदा भी मिला। अब पार्टी तीसरे चरण में प्रवेश करती दिखाई दे रही है, जहां वह “समाजवादी प्लस” मॉडल पर काम कर रही है- यानी पीडीए के साथ सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों को भी जोड़ने की कोशिश। इसका मकसद केवल वोट बढ़ाना नहीं, बल्कि भाजपा के उस नैरेटिव को चुनौती देना भी है कि सपा किसी एक वर्ग की पार्टी है।

2027 की लड़ाई का शुरुआती संकेत
लखनऊ का प्रबुद्ध सम्मेलन यह संकेत देता है कि समाजवादी पार्टी अब 2027 की लड़ाई को केवल जातीय ध्रुवीकरण के आधार पर नहीं लड़ना चाहती। पार्टी सामाजिक संतुलन, प्रतिनिधित्व और व्यापक गठबंधन की नई रणनीति पर काम कर रही है। हालांकि यह रणनीति कितनी सफल होगी, इसका जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा। ब्राह्मण सम्मेलन के बाद यदि संगठन में बदलाव, टिकट वितरण में संतुलन और लगातार संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ती है, तभी यह प्रयास राजनीतिक परिणाम में बदल सकता है। फिलहाल इतना तय है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की रणनीति पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक, बहुस्तरीय और सामाजिक समीकरणों पर आधारित दिखाई दे रही है। भाजपा के मजबूत सवर्ण आधार में सेंध लगाने की यह कोशिश सफल होती है या नहीं, यही उत्तर प्रदेश की अगली राजनीतिक लड़ाई का सबसे दिलचस्प पहलू बनने जा रहा है।




