नीरज सिसौदिया, बरेली
कुछ लोग सिर्फ एक परिवार का हिस्सा नहीं होते, वे पूरे गांव, पूरे इलाके और कई पीढ़ियों की यादों का संगम बन जाते हैं। उनका जाना केवल एक व्यक्ति का चले जाना नहीं होता, बल्कि अपने साथ एक पूरा दौर, एक पूरी परंपरा और अनगिनत रिश्तों की गर्माहट लेकर चला जाना होता है। टाहाँ प्यारी नवादा के मोइनुद्दीन उर्फ ‘बाबू जी’ का इंतकाल भी ऐसा ही एक क्षण है- जिसे स्वीकार करना आसान नहीं।
शुक्रवार को ऐतिहासिक गांव टाहाँ प्यारी नवादा ने अपनी उस महान शख्सियत को खो दिया, जिसकी पहचान सिर्फ उसके परिवार तक सीमित नहीं थी। शेख खलीलउद्दीन और शेख रफीउद्दीन की विरासत से पहचाने जाने वाले इस गांव में बाबू जी का नाम अपने आप में एक पहचान था। उनकी चौखट पर कभी फैसले होते थे, लोग अपनी फरियाद लेकर आते थे और उनकी बात को सम्मान के साथ सुना जाता था।
बताया जाता है कि वर्ष 1960 से उनके यहां गांव की मुखिया प्रथा के दौर में दरबार लगता था। गांव और आसपास के लोग अपनी समस्याएं लेकर आते और बाबू जी की मौजूदगी में उनके समाधान की कोशिश होती। यह केवल किसी व्यक्ति का प्रभाव नहीं था, बल्कि वर्षों में अर्जित वह विश्वास था, जिसे उन्होंने अपने व्यवहार और व्यक्तित्व से हासिल किया था।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी लोगों का भरोसा उनके साथ बना रहा। **बाबू जी लगातार सात बार गांव के प्रधान चुने गए। यह उपलब्धि किसी पद से कहीं बड़ी है। सात बार जनता का भरोसा हासिल करना बताता है कि **बाबू जी ने लोगों के दिलों में किस तरह अपनी जगह बनाई थी।
उनकी हनक थी, लेकिन उस हनक में अपनापन भी था। उनकी चौखट पर आने वाला व्यक्ति केवल एक आगंतुक नहीं रहता था, वह परिवार का हिस्सा बन जाता था।
बाबू जी का परिवार हमेशा से अपने भरे-पूरेपन और मिलनसार माहौल के लिए जाना जाता रहा। घर में शादी हो या त्योहार, ऐसा लगता था जैसे पूरा गांव ही उस खुशी में शामिल हो गया हो। परिवार की रौनक और लोगों का आना-जाना उस दौर की याद दिलाता था, जब बड़े घर केवल संपन्नता की निशानी नहीं बल्कि सामाजिक मेलजोल और अपनत्व के केंद्र हुआ करते थे।
1960 और उससे भी पहले के दौर की बनी उनकी ऐतिहासिक कोठी आज भी उन लम्हों की गवाही दे रही है। उसकी दीवारें मानो बीते कई दशकों की कहानियां अपने भीतर सहेजे हुए हैं। वह कोठी अब भी बाबू जी के रुतबे, उनकी शान और उस दौर की गवाही देती है, जब उनकी चौखट इलाके की सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का एक अहम केंद्र हुआ करती थी।
बड़े-बड़े नेता भी उनकी चौखट पर आते थे
बाबू जी का प्रभाव गांव की सीमाओं से बहुत आगे तक था। देश और प्रदेश की राजनीति से जुड़े कई बड़े नेता उनके यहां आते थे। चुनाव का समय हो तो राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए बाबू जी की चौखट पर पहुंचना महत्वपूर्ण माना जाता था। झारखंड के राज्यपाल और पूर्व केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार, पूर्व मंत्री भगवत सरन गंगवार, पूर्व विधायक वीरेंद्र सिंह और केसर सिंह गंगवार जैसे तमाम दिग्गज नेताओं का उनके प्रति सम्मान इस बात का प्रमाण था कि राजनीति में बाबू जी का पद भले ही छोटा था लेकिन कद बहुत बड़ा था। लेकिन बाबू जी की असली ताकत किसी नेता का समर्थन नहीं, बल्कि आम लोगों का भरोसा** था। वह भरोसा** जो चुनाव से आगे था, राजनीति से ऊपर था और पीढ़ियों तक चला।
हर किसी के लिए थे ‘बाबू जी’
उनकी सबसे बड़ी खूबी शायद यही थी कि उन्होंने अपने प्रभाव को कभी सिर्फ अपने परिवार तक सीमित नहीं रखा। अपने हों या पराए, गरीब हों या संपन्न, गांव का व्यक्ति हो या दूर से आया कोई मेहमान—उनकी चौखट पर हर किसी के लिए जगह थी। इसीलिए ‘बाबू जी’ सिर्फ उनका संबोधन नहीं था, बल्कि एक रिश्ते का नाम बन गया था।
आज जब वही आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई है, तो टाहाँ प्यारी नवादा की गलियों में एक अजीब-सी खामोशी महसूस होती होगी। वह चौखट है, वह ऐतिहासिक कोठी है, वह परिवार है, वे रिश्ते हैं लेकिन वह शख्स नहीं है, जिसके होने से सब कुछ पूरा लगता था।
एक पीढ़ी चली गई, यादें रह गईं
दुनिया से जाना हर इंसान की नियति है। जो इस दुनिया में आया है, उसे **एक दिन लौटकर जाना ही है। मगर कुछ लोग अपने पीछे केवल यादें नहीं छोड़ते, वे **एक विरासत छोड़ जाते हैं।
बाबू जी भी ऐसी ही विरासत छोड़कर गए हैं- सात बार प्रधान चुने जाने की विरासत, लोगों के विश्वास की विरासत, रिश्ते निभाने की विरासत, अपनी चौखट को सबके लिए खुला रखने की विरासत और सबसे बढ़कर लोगों के दिलों में जगह बनाने की विरासत।

आज उनका परिवार गहरे सदमे में है। उनके भतीजे सपा के प्रदेश सचिव और ओमेगा क्लासेस कोचिंग संस्थान के निदेशक मो. कलीमुद्दीन समेत पूरा परिवार इस अपूरणीय क्षति से दुखी है। लेकिन यह दुख केवल परिवार का नहीं है। यह उस पूरे इलाके का दुख है, जिसने दशकों तक बाबू जी को अपने बीच देखा, सुना और महसूस किया।
शायद आने वाली पीढ़ियां जब टाहाँ प्यारी नवादा की उस ऐतिहासिक कोठी को देखेंगी तो कोई उनसे कहेगा, “यह बाबू जी का घर था।” और फिर शुरू होगी उन किस्सों की दास्तान, जिनमें सात बार के प्रधान, बड़े नेताओं की आवाजाही, गांव के फैसले, रिश्तों की गर्माहट और एक ऐसे इंसान की कहानी होगी जिसने अपने समय में लोगों के दिलों पर राज किया।
बाबू जी चले गए हैं, लेकिन उनका नाम, उनका अंदाज, उनकी चौखट और उनसे जुड़ी यादें अभी बहुत लंबे समय तक जिंदा रहेंगी।




