नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ बरेली जिले की बहेड़ी विधानसभा सीट पर सियासी समीकरण तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। मौजूदा विधायक और समाजवादी पार्टी के नेता अता उर रहमान के सामने इस बार मुकाबला पिछले चुनावों की तुलना में ज्यादा पेचीदा हो सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह भारतीय जनता पार्टी की ओर से नए चेहरे की तलाश और भाजपा के वरिष्ठ नेता तथा झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार के नाम की संभावित चर्चा है। हालांकि श्रुति गंगवार की भाजपा उम्मीदवार के रूप में उम्मीदवारी की अभी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय राजनीतिक हलकों में उनके नाम को लेकर चर्चा ने बहेड़ी की चुनावी तस्वीर को दिलचस्प बना दिया है।
संतोष गंगवार की बरेली की राजनीति में लंबी और मजबूत पकड़ रही है। झारखंड राजभवन की आधिकारिक प्रोफाइल के मुताबिक संतोष गंगवार आठ बार लोकसभा सदस्य रह चुके हैं और उनकी बेटी का नाम श्रुति गंगवार है। यही राजनीतिक विरासत श्रुति के संभावित चुनावी पदार्पण को सामान्य उम्मीदवार की दावेदारी से अलग बनाती है। अगर भाजपा उन्हें मैदान में उतारती है तो पार्टी को एक नए चेहरे के साथ संतोष गंगवार की राजनीतिक स्वीकार्यता का लाभ उठाने की कोशिश का अवसर मिल सकता है।

छत्रपाल के बाद भाजपा के सामने नए चेहरे की चुनौती
बहेड़ी में पिछले दो विधानसभा चुनावों का इतिहास बताता है कि भाजपा और सपा के बीच मुकाबला बेहद दिलचस्प रहा है। 2017 में भाजपा के छत्रपाल सिंह ने 1,08,846 वोट हासिल कर बड़ी जीत दर्ज की थी। उस चुनाव में बसपा के नसीम अहमद 66,009 वोट के साथ दूसरे और सपा के अता उर रहमान 63,841 वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे। यानी नसीम अहमद ने उस चुनाव में अता उर रहमान को पीछे छोड़ दिया था।
लेकिन 2022 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। सपा के अता उर रहमान ने 1,24,145 वोट हासिल कर भाजपा के छत्रपाल सिंह को बेहद करीबी मुकाबले में हराया। छत्रपाल को 1,20,790 वोट मिले। दोनों के बीच अंतर महज 3,355 वोट का रहा।
यही आंकड़ा बताता है कि बहेड़ी ऐसी सीट है जहां कुछ हजार वोटों का ध्रुवीकरण भी परिणाम बदल सकता है। 2022 में सपा की जीत आरामदायक नहीं थी, बल्कि बेहद करीबी मुकाबले का परिणाम थी। इसलिए 2027 में भाजपा यदि ऐसा उम्मीदवार उतारती है जो अपने साथ अतिरिक्त सामाजिक समर्थन जोड़ सके तो अता उर रहमान के सामने चुनौती निश्चित रूप से बढ़ सकती है।
श्रुति गंगवार के नाम की चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा के लिए बहेड़ी में केवल पार्टी के पारंपरिक वोट को मजबूत करना पर्याप्त नहीं होगा। 2022 में भाजपा प्रत्याशी छत्रपाल सिंह को 45 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे, जबकि अता उर रहमान 46.68 प्रतिशत वोट के साथ जीत सके। ऐसे में भाजपा के सामने लगभग यही सवाल होगा कि वह पिछली बार के वोट आधार में कुछ अतिरिक्त वोट कैसे जोड़े।
यहीं संतोष गंगवार की राजनीतिक विरासत का महत्व सामने आता है। उनके समर्थकों का दावा रहा है कि बरेली की राजनीति में उन्होंने विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच स्वीकार्यता बनाई। यदि उनकी बेटी को उम्मीदवार बनाया जाता है तो भाजपा इस व्यक्तिगत राजनीतिक पूंजी को चुनावी लाभ में बदलने की कोशिश कर सकती है।
लेकिन यह मान लेना कि संतोष गंगवार की पूरी व्यक्तिगत लोकप्रियता स्वतः श्रुति गंगवार को मिल जाएगी, चुनावी राजनीति का बहुत सरल आकलन होगा। विधानसभा चुनाव स्थानीय संगठन, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, क्षेत्र में सक्रियता, जातीय समीकरण, स्थानीय मुद्दों और पार्टी की राज्यस्तरीय लोकप्रियता—इन सभी के संयुक्त प्रभाव से तय होते हैं। इसलिए श्रुति की संभावित उम्मीदवारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह पिता की विरासत को अपने व्यक्तिगत राजनीतिक जनाधार में कितनी जल्दी बदल पाती हैं।

नसीम अहमद की वापसी सपा के लिए बड़ा सिरदर्द?
दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी से नसीम अहमद के संभावित मैदान में उतरने की चर्चा भी बहेड़ी के चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि नसीम अहमद 2017 में बसपा के उम्मीदवार के रूप में 66,009 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे थे, जबकि अता उर रहमान 63,841 वोट के साथ तीसरे स्थान पर थे।
यानी नसीम का अपना स्थापित वोट आधार रहा है। यदि वह फिर बसपा के टिकट पर मैदान में उतरते हैं और 2017 जैसी पकड़ दोहरा पाते हैं तो विपक्षी वोटों के विभाजन का सवाल महत्वपूर्ण हो जाएगा। हालांकि यह भी निश्चित नहीं है कि 2017 का वोट पैटर्न 2027 में उसी रूप में दोहराया जाएगा। मतदाताओं की प्राथमिकताएं, सपा-बसपा के बीच संबंध, भाजपा की रणनीति और स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियां पांच वर्षों में काफी बदल चुकी हैं।
असली खेल मुस्लिम वोटों के विभाजन का?
बहेड़ी का चुनावी गणित लंबे समय से सामाजिक समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा है। ऐसे में यदि एक तरफ सपा के अता उर रहमान, दूसरी तरफ बसपा के नसीम अहमद और तीसरी तरफ भाजपा की ओर से श्रुति गंगवार जैसे चेहरे मैदान में आते हैं तो मुस्लिम मतदाताओं के सामने भी चुनावी विकल्प बढ़ सकते हैं।
यही स्थिति सपा के लिए सबसे बड़ी चिंता बन सकती है। 2022 में भाजपा और सपा के बीच सीधा मुकाबला रहा और बसपा का वोट लगभग छह प्रतिशत तक सीमित रहा। यदि 2027 में बसपा अपने पुराने प्रभाव को वापस हासिल करती है तो सपा का 2022 वाला वोट आधार प्रभावित हो सकता है।
हालांकि इसे सीधे तौर पर “मुस्लिम वोट नसीम और भाजपा के बीच बंट जाएगा” मान लेना जल्दबाजी होगी। भाजपा प्रत्याशी को मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन कितना मिलता है, यह स्थानीय उम्मीदवार की स्वीकार्यता और चुनावी माहौल पर निर्भर करेगा। वहीं बसपा भी केवल मुस्लिम वोटों पर निर्भर नहीं रहेगी; उसे अपना पारंपरिक सामाजिक आधार भी सक्रिय करना होगा।

अता उर रहमान के सामने दोहरी चुनौती
अता उर रहमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि 2022 में मिली जीत को दोहराने के लिए उन्हें अपना व्यक्तिगत वोट आधार मजबूत करना होगा। 2012 में वह भाजपा के छत्रपाल सिंह से महज 18 वोट आगे रहकर चुनाव जीते थे—अता उर रहमान को 48,172 और छत्रपाल सिंह को 48,154 वोट मिले थे।
2017 में वह तीसरे स्थान पर चले गए और 2022 में फिर सत्ता में लौट आए। 2022 में अता उर रहमान की जीत की वजह भी नसीम अहमद ही बने थे। उस चुनाव से ठीक पहले नसीम अहमद सपा में शामिल हो गए थे और अखिलेश यादव ने उन्हें अपने विधानसभा क्षेत्र करहल का प्रभारी बनाकर बहेड़ी से दूर कर दिया था। साथ ही उन्हें यह आश्वासन भी दिया गया था कि सपा सरकार आने पर उन्हें मंत्री पद से नवाजा जाएगा। ऐसे में नसीम अहमद 2022 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ सके फिर भी अता उर रहमान को मामूली वोटों से ही जीत मिल सकी थी। इस बार नसीम अहमद को रोक पाना नामुमकिन है। यह उतार-चढ़ाव बताता है कि बहेड़ी में किसी उम्मीदवार को स्थायी बढ़त हासिल नहीं है। यहां राजनीतिक हवा तेजी से बदल सकती है।
अगर भाजपा श्रुति गंगवार को मैदान में उतारती है और बसपा नसीम अहमद को मजबूत तरीके से चुनाव लड़ाती है, तो अता उर रहमान के सामने एक साथ दो मोर्चे खुल सकते हैं—एक तरफ भाजपा का मजबूत संगठन और संभावित नया चेहरा, दूसरी तरफ बसपा की ओर से विपक्षी वोटों में सेंध।
हालांकि पूरा समीकरण भाजपा के पक्ष में मान लेना भी गलत होगा। 2022 में भाजपा के छत्रपाल सिंह को 1.20 लाख से ज्यादा वोट मिले थे और वह महज 3,355 वोट से हारे थे। इसका अर्थ है कि भाजपा का बहेड़ी में मजबूत आधार पहले से मौजूद है। चुनौती उस आधार को बनाए रखते हुए अतिरिक्त वोट जोड़ने की है।
श्रुति गंगवार के नाम पर भाजपा को युवा चेहरा, राजनीतिक विरासत और संतोष गंगवार की पहचान का लाभ मिल सकता है, लेकिन उनके लिए स्थानीय स्तर पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना भी जरूरी होगा।
कुल मिलाकर बहेड़ी विधानसभा सीट पर 2027 का चुनाव फिलहाल एक संभावित त्रिकोणीय संघर्ष की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। सपा के अता उर रहमान के सामने अपनी 2022 की जीत का आधार बचाने की चुनौती है, भाजपा के सामने छत्रपाल सिंह के बाद ऐसा उम्मीदवार चुनने की चुनौती है जो 2022 की मामूली हार को जीत में बदल सके, जबकि बसपा के सामने नसीम अहमद के पुराने प्रभाव को फिर से खड़ा करने का सवाल है।
यदि भाजपा वास्तव में श्रुति गंगवार को मैदान में उतारती है और बसपा नसीम अहमद पर दांव लगाती है, तो बहेड़ी में उम्मीदवारों से ज्यादा वोटों का बंटवारा और सामाजिक समीकरण चुनाव का परिणाम तय कर सकते हैं। लेकिन अभी श्रुति गंगवार की उम्मीदवारी और नसीम अहमद की आधिकारिक दावेदारी की पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए मौजूदा स्थिति को संभावित राजनीतिक परिदृश्य के रूप में देखना ही उचित होगा।
एक बात जरूर स्पष्ट है—बहेड़ी में 2027 का चुनाव 2022 की पुनरावृत्ति नहीं होगा। भाजपा के पास वापसी का मजबूत आधार है, सपा के पास मौजूदा विधायक का लाभ और बसपा के पास पुराने प्रदर्शन की स्मृति। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि टिकट वितरण के बाद कौन-सी पार्टी किस सामाजिक समीकरण को अपने पक्ष में सबसे बेहतर तरीके से जोड़ पाती है।




