नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की समाजवादी पार्टी में रविवार को उस समय सियासी हलचल मच गई जब पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष अनिल पटेल उर्फ नेताजी ने अपने ही जिलाध्यक्ष शिवचरण कश्यप के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया। अब तक अंदर ही अंदर सुलग रही गुटबाजी आखिरकार सड़कों पर आ गई। अनिल पटेल ने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक पोस्ट डालते हुए लिखा कि समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप को उनके पद से हटाया जाए। हालांकि उन्होंने इसके पीछे कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया, लेकिन इस एक पोस्ट ने बरेली की सियासत में भूचाल ला दिया। पोस्ट वायरल होते ही सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने उस पर अपनी प्रतिक्रियाएं दीं और ज्यादातर कमेंट शिवचरण कश्यप के विरोध में नजर आए। इससे यह साफ जाहिर हो गया कि यह असंतोष केवल अनिल पटेल तक सीमित नहीं है बल्कि संगठन के भीतर एक बड़ा वर्ग अब शिवचरण कश्यप से नाराज है।
शिवचरण कश्यप का नाम पिछले कुछ समय से लगातार विवादों में बना हुआ है। पंचायत चुनावों के दौरान उन पर वसूली के आरोप लगे थे, वहीं कुछ कार्यकर्ताओं ने उन पर मारपीट और गुंडागर्दी करने का भी आरोप लगाया था। कुछ समय पहले उनका एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह एक व्यक्ति से माफी मांगते हुए नजर आए थे। यह माफी उसी व्यक्ति से मांगी गई थी जिसके साथ उन्होंने मारपीट की थी। इन घटनाओं ने न केवल उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया बल्कि पार्टी के भीतर उनकी साख भी कमजोर कर दी। बताया जा रहा है कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता पहले ही उनके कामकाज से असंतुष्ट हैं। यादव समाज से आने वाले नेताओं में तो उनके खिलाफ खुली नाराजगी है। बरेली के कई दिग्गज नेता, जिनमें पूर्व सांसद और पूर्व जिला अध्यक्ष भी शामिल हैं, अब शिवचरण कश्यप के साथ खड़े नहीं दिख रहे हैं।
अनिल पटेल और शिवचरण कश्यप दोनों ही पिछड़े वर्ग से आते हैं, लेकिन दोनों के बीच राजनीतिक अदावत काफी पुरानी है। संगठन में वर्चस्व की यह लड़ाई अब सोशल मीडिया पर आ गई है। खास बात यह है कि यह विवाद ऐसे समय में भड़का है जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोमवार को लखनऊ में प्रदेश के सभी जिला और महानगर अध्यक्षों की बैठक बुलाई है। यह बैठक मतदाता सूची के पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी एसआईआर को लेकर बुलाई गई है, लेकिन अब चर्चा का केंद्र बरेली बन गया है। पार्टी सूत्रों के अनुसार बैठक में इस मसले पर भी बात हो सकती है और संभव है कि अखिलेश यादव संगठनात्मक अनुशासन पर सख्त रुख अपनाएं।
अखिलेश यादव का बरेली दौरा भी पहले से तय है। वह 13 नवंबर को बरेली पहुंचने वाले हैं और यहां पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात करेंगे। जिन नेताओं से उनकी मुलाकात प्रस्तावित है उनमें पूर्व राज्यसभा सांसद वीरपाल सिंह यादव, प्रदेश महासचिव अता उर रहमान, सुल्तान बेग और शहजिल इस्लाम जैसे नाम शामिल हैं। यह सभी नेता लंबे समय से शिवचरण कश्यप के कार्यशैली से असहमत बताए जा रहे हैं। ऐसे में यह दौरा अब और भी अहम हो गया है, क्योंकि बरेली की गुटबाजी का असर सीधे अखिलेश यादव के सामने दिखेगा। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि शिवचरण कश्यप की स्थिति अब कमजोर हो चुकी है और संगठन में उनका विरोध चरम पर है।
फेसबुक पर अनिल पटेल की पोस्ट के बाद जिस तरह सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने उनकी बात का समर्थन किया, उसने यह साबित कर दिया कि शिवचरण कश्यप के खिलाफ असंतोष गहरा चुका है। कई कार्यकर्ताओं और स्थानीय पदाधिकारियों ने पहले भी शिकायत की थी कि जिला अध्यक्ष संगठन को साथ लेकर नहीं चल पा रहे हैं। हाल में हुई सपा की मासिक बैठकों में भी यह नाराजगी दिखी जब कई वरिष्ठ नेता और पदाधिकारी इन बैठकों से नदारद रहे। संगठन में बढ़ती दूरी ने शिवचरण कश्यप के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

हालांकि, अनिल पटेल की इस पोस्ट को लेकर उनके इरादों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने यह कदम पूरी रणनीति के तहत उठाया है ताकि संगठन में अपनी स्थिति मजबूत कर सकें। वहीं, शिवचरण कश्यप के समर्थक इसे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का नतीजा बता रहे हैं। उनका कहना है कि पार्टी के भीतर फेरबदल की सुगबुगाहट पहले से चल रही है और उससे पहले अनिल पटेल ने माहौल अपने पक्ष में करने के लिए यह तरीका अपनाया है।
बरेली की यह गुटबाजी अब सिर्फ एक जिले का मामला नहीं रह गई है बल्कि यह पूरे संगठन के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। अखिलेश यादव ने हमेशा संगठन की एकता और अनुशासन पर जोर दिया है, लेकिन जिस तरह से उनके ही जिलाध्यक्षों के बीच टकराव खुलेआम सोशल मीडिया पर सामने आ रहा है, वह पार्टी की छवि के लिए नुकसानदायक है। बरेली का यह विवाद यह भी दिखाता है कि जमीनी स्तर पर सपा में संवाद की कमी और आपसी तालमेल की टूटन कितनी गहरी हो चुकी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर अखिलेश यादव ने इस विवाद को जल्द नहीं सुलझाया तो इसका असर आगामी विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता है। बरेली जैसे अहम जिले में संगठन की एकता का टूटना समाजवादी पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है। यह भी माना जा रहा है कि इस स्थिति से भाजपा को फायदा मिल सकता है। लोकसभा चुनाव में सपा ने भाजपा को चुनौती दी थी, लेकिन अब सपा की अंदरूनी लड़ाई भाजपा के लिए राहत का विषय बन सकती है। ग्रामीण इलाकों में जहां सपा की पकड़ मजबूत थी, वहां गुटबाजी ने पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर किया है।
फिलहाल बरेली की सियासत में सभी की निगाहें सोमवार की लखनऊ बैठक और 13 नवंबर को होने वाले अखिलेश यादव के दौरे पर टिकी हैं। यह दोनों मौके तय करेंगे कि शिवचरण कश्यप की कुर्सी बचती है या उनके खिलाफ उठी यह बगावत उनकी विदाई का कारण बनती है। बरेली में सपा के भीतर उठे इस तूफान ने साफ कर दिया है कि संगठनात्मक अनुशासन को लेकर पार्टी के सामने गंभीर चुनौती खड़ी हो चुकी है। अब देखना यह है कि अखिलेश यादव इस गुटबाजी को कितनी जल्दी और किस तरह काबू में लाते हैं, क्योंकि अगर यह विवाद समय रहते नहीं थमा तो इसका असर न केवल बरेली बल्कि पूरे प्रदेश की सपा इकाइयों पर देखने को मिल सकता है।





