समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ पार्षद और शहर विधानसभा सीट से पूर्व प्रत्याशी राजेश अग्रवाल बरेली की राजनीति में किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। 30 वर्षों से लगातार जनता के बीच सक्रिय रहकर उन्होंने न सिर्फ नगर निगम के सात चुनाव जीते, बल्कि एक मजबूत जनाधार भी खड़ा किया। वर्ष 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर इस बार वह बरेली कैंट विधानसभा सीट से सपा के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। लंबा राजनीतिक और चुनावी अनुभव, संगठन, बूथ मैनेजमेंट, मतदाता सूची (एसआईआर) और चुनावी गणित पर उनकी पकड़ उन्हें अन्य दावेदारों से अलग करती है। इस विशेष बातचीत में राजेश अग्रवाल ने टिकट की दावेदारी, अन्य दावेदारों, वोटों के ट्रेंड, बीएलए की भूमिका और कैंट सीट की वास्तविक राजनीतिक तस्वीर पर खुलकर अपनी बात रखी है। यह इंटरव्यू न सिर्फ चुनावी तैयारियों की झलक देता है, बल्कि यह भी बताता है कि 2027 में कैंट की लड़ाई किन मुद्दों और चेहरों के इर्द-गिर्द घूम सकती है। पेश हैं वरिष्ठ सपा नेता और पूर्व प्रत्याशी राजेश अग्रवाल से indiatime24.com के संपादक नीरज सिसौदिया की बातचीत के प्रमुख अंश…
सवाल : आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर बतौर महानगर उपाध्यक्ष एवं कैंट विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट के दावेदार के रूप में आपकी क्या तैयारियां चल रही हैं?
जवाब: देखिये, हमारी पार्टी पिछले डेढ़ साल से जमीनी स्तर पर काम कर रही है, हमारा महानगर का संगठन पूरी ताकत के साथ काम कर रहा है। मुझ सहित जो टिकट के गंभीर दावेदार हैं वो अपने-अपने स्तर से कम कर रहे हैं अभी हमने फिर पर भी काम किया और अभी कर रहे हैं मैं सिर्फ उन दावेदारों की बात कर रहा हूं जो गंभीर है वास्तविक रूप से। बाकी ऐसे दावेदार होते हैं जो टेंपरेरी होते हैं। कोई चुनाव से एक साल पहले आता, कोई छह महीने पहले आता है तो कोई 15 दिन पहले। मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं। मैं सिर्फ उनकी बात कर रहा हूं जो वास्तविक रूप से गंभीर हैं।

सवाल : आप कितने साल से काम कर रहे हैं?
जवाब : देखिए मुझमें और अन्य दावेदारों में बहुत अंतर है। मैं 30 साल से जनता के बीच में हूं। मैंने नगर निगम के सात चुनाव जीते हैं और चुनाव जीतने के बाद भी अगले दिन से काम करने का वही अंदाज रहता है। एक विधानसभा चुनाव भी लड़ा, उसमें 97000 वोट मिले पर चुनाव हार गए। इसके बावजूद हम अगले दिन से उसी प्रकार से जनता के बीच काम में लगे रहे। तो हमारा ऐसा बिल्कुल नहीं है कि विधानसभा चुनाव हैं तो हम जनता के बीच ज्यादा दिखेंगे। हम परमानेंट जनता के बीच एक तरह से ही रहते हैं और जनता की सेवा करते हैं। मेरे दरवाजे 24 घंटे खुले रहते हैं मैं घर पर रहूं या ना रहूं तो भी मेरे परिवार के लोग या मेरा स्टाफ जनता की समस्याओं का समाधान करता है। हमारे यहां कभी ऐसा नहीं होता कि जनता से यह कह दिया जाए कि नेताजी बाहर हैं।


सवाल: एसआईआर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद आपकी नजर में कैंट विधानसभा सीट के परिदृश्य में कितना बदलाव आ सकता है? कहा जा रहा है कि बहुत सारे वोट कटे हैं एसआईआर की मसौदा सूची में?
जवाब: ये सब बातें वो लोग कर रहे हैं जो चुनाव में हवा में बातें करते हैं। इसे ऐसे समझिये कि अगर कैंट विधानसभा सीट पर 210000 वोट पड़ते थे और शहर विधानसभा सीट पर 235000 वोट पड़ते थे तो एसआईआर के बाद इनमें कोई विशेष बदलाव नहीं आने वाला। हां जो 18 साल की उम्र वाले नए मतदाता बनेंगे उनकी संख्या जरूर बढ़ेगी। उदाहरण के तौर पर जहां दो लाख दस हजार पोलिंग होती थी वहां दो लाख पंद्रह हजार हो सकती है और जहां दो लाख पैंतीस हजार हैं वहां दो लाख बयालीस हजार हो सकता है। एसआईआर में वोट जरूर कट रहे हैं लेकिन पोलिंग वाले वोट नहीं कट रहे बल्कि वो वोट कट रहे हैं जो कभी पड़ते ही नहीं थे। जैसे – जिनका निधन हो गया उनके वोट कट रहे हैं, जो फर्जी वोटर थे उनके वोट कट रहे हैं या जो पलायन करके अन्यत्र बस गए उनके वोट कट रहे हैं। कहने का मतलब यह है कि ओवरऑल कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
सवाल : पिछले दो चुनावों में कैंट विधानसभा क्षेत्र में कितना मतदान हुआ था?
जवाब: देखिए वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में कैंट विधानसभा क्षेत्र में 191486 वोट पड़े थे और वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भी लगभग इतने ही वोट पड़े थे और अब जब कुछ नए वोटर जुड़ जाएंगे तो यह आंकड़ा 2 लाख तक जा सकता है वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में।

सवाल: कई जिलों में यह परसेप्शन बनाया जा रहा है कि एसआईआर के तहत मुस्लिम वोट काटे जा रहे हैं। क्या कैंट विधानसभा सीट पर भी आपको ऐसा लगता है?
जवाब: देखिए एसआईआर के तहत अभी सिर्फ मैपिंग हुई है। फाइनल लिस्ट अभी जारी नहीं हुई है। अब दावे और आपत्तियां दर्ज की जाएंगी। उसके बाद अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन किया जाएगा। तब यह बात स्पष्ट होगी कि कौन से वोट काटे और कौन से नहीं कटे। फिलहाल इस प्रक्रिया में अभी तक जो भी किया गया है वह एकदम सही तरीके से किया गया है।

सवाल: एक सवाल विधानसभा चुनाव के लिए टिकट का आता है। आपकी पार्टी के मुस्लिम दावेदार यह दावा कर रहे हैं कि एसआईआर के तहत जो वोट कटे हैं उनमें ज्यादातर हिंदू वोट हैं और अब मुसलमान मतदाताओं की संख्या कैंट विधानसभा क्षेत्र में अधिक हो जाएगी, इसलिए इस सीट से किसी मुस्लिम दावेदार को ही टिकट मिलना चाहिए। इन दावों में आपको कितनी सच्चाई नजर आती है?
जवाब: देखिए टिकट हासिल करने के लिए तो दावेदार तरह-तरह की बातें करते ही हैं। लेकिन इस तरह की बातें वह लोग कर रहे हैं जिन्होंने बिहार विधानसभा चुनाव से सबक नहीं लिया है। जितने मुस्लिम वोट पहले पड़ते थे अब भी उतने ही पड़ेंगे और जितने हिन्दू वोट पहले पड़ते थे अब भी उतने ही पड़ेंगे। हिन्दू-मुस्लिम वोटों के अनुपात में कोई अंतर नहीं आने वाला। यह सिर्फ टिकट मांगने का एक तरीका हो सकता है। अगर ऐसा होता तो बिहारमें ऐसा परिणाम क्यों आया?

सवाल: कई बार आपने अपने इंटरव्यूज में यह बात कही है कि आपके वार्ड में कई बूथ ऐसे हैं जहां से नगर निगम के चुनाव में तो आप बतौर समाजवादी पार्टी उम्मीदवार जीत जाते हैं लेकिन जब विधानसभा चुनाव होते हैं या लोकसभा चुनाव होते हैं तो उन्हीं बूथों पर भाजपा उम्मीदवार को जीत मिलती है और समाजवादी पार्टी हार जाती है। वह कौन से बूथ हैं जहां इस तरह का बदलाव देखने को मिलता है और आपकी नजर में इसकी वजह क्या है?
जवाब: ये बूथ रामपुर गार्डन के हैं तहसील और एंप्लॉयमेंट एक्सचेंज वाले बूथ हैं और इसके अलावा सी इंटर कॉलेज वाले बूथ भी हैं। यह लगभग कुल मिलाकर 18- 19 बूथ हैं। कहने का मतलब यह है कि वर्तमान समय में जो नफरत की राजनीति चल रही है उसमें कोई भी उम्मीदवार अपने लिए तो वोट ले सकता है लेकिन अपनी पार्टी के किसी अन्य उम्मीदवार के लिए वोट शिफ्ट कर पाना आसान नहीं है। उम्मीदवार अपने संबंधों पर और व्यक्ति का छवि के आधार पर यह वोट हासिल कर लेता है। मुझे अगर यह वोट मिलते हैं तो यह मेरे व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर मिलते हैं और क्योंकि विधानसभा चुनाव में मैं उम्मीदवार के तौर पर मैदान में नहीं होता इसलिए भाजपा के उन मतदाताओं के वोटो को सपा के लिए शिफ्ट करना मुमकिन नहीं हो पाता। अगर मैं उम्मीदवार होता तो मैं विधानसभा चुनाव में भी उन वोटो को अपने लिए हासिल कर सकता था।

सवाल: वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में कैंट विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी की हार का अंतर महज 3200 वोटो का रह गया था क्या आपको लगता है कि वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी इस अंतर को पाट सकेगी?
जवाब: नहीं पाट सकेगी तो हार जाएगी। इसीलिए तो लगे हैं हम सब लोग लक्ष्य तो सबका एक ही है कि हम विधानसभा जीत जाएं लेकिन लक्ष्य के साथ-साथ यह भी देखना है की जीत कौन सकता है, अगर मेरी पसंद का… मेरी पसंद का… हुआ तो मैं बता दूं कि नेताओं की पसंद से तो कोई जीत नहीं सकता है। जो ईमानदारी से जीतने की स्थिति में हो टिकट उसी को मिलना चाहिए और उसके प्रति कोई द्वेष भावना भी नहीं होनी चाहिए। हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष जी बहुत समझदार हैं इस सीट पर उनकी विशेष नजर है इसलिए यहां का निर्णय वह ऐसे ही नहीं लेंगे।





