नीरज सिसौदिया, बरेली
मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को समाजवादी पार्टी ने केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया के तौर पर नहीं, बल्कि संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने और आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी के बड़े मौके के रूप में लिया था। पार्टी हाईकमान ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि पूरे प्रदेश में बूथ लेवल एजेंट बनाए जाएं, उनका प्रशिक्षण हो और इस बहाने संगठन की सक्रियता, एकजुटता और अनुशासन को परखा जाए। इस कसौटी पर बरेली महानगर की भूमिका जिले की अन्य विधानसभा सीटों से बिल्कुल अलग और कहीं ज्यादा प्रभावशाली नजर आई।

बरेली महानगर की दो विधानसभा सीटों (कैंट और शहर) में हुए बीएलए सम्मेलन न सिर्फ सफल रहे, बल्कि उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि जब संगठन मजबूत नेतृत्व के हाथों में हो तो गुटबाजी अपने आप कमजोर पड़ जाती है। महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी ने इन सम्मेलनों के जरिए यह साबित कर दिया कि उनकी पकड़ संगठन पर मजबूत है और वे पार्टी के भीतर तालमेल बैठाने में सक्षम हैं। इसके उलट जिले की बाकी सात विधानसभा सीटों पर बीएलए सम्मेलन सपा की आंतरिक कमजोरियों, गुटबाजी और नेतृत्व के अभाव की कहानी कहते नजर आए। इन आयोजनों ने जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप की कार्यशैली और संगठनात्मक क्षमता पर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए।

महानगर में बीएलए सम्मेलन की शुरुआत 29 दिसंबर को कैंट विधानसभा क्षेत्र से हुई। आईएमए हॉल में आयोजित यह सम्मेलन सिर्फ एक प्रशिक्षण शिविर नहीं था, बल्कि सपा की एकजुटता का सार्वजनिक प्रदर्शन भी था। कैंट सीट से समाजवादी पार्टी के टिकट के कई प्रमुख दावेदार हैं। इनमें पूर्व प्रत्याशी, महानगर उपाध्यक्ष और वरिष्ठ पार्षद राजेश अग्रवाल, सपा चिकित्सा प्रकोष्ठ के जिला अध्यक्ष डॉक्टर अनीस बेग, अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष इंजीनियर अनीस अहमद खां प्रमुख हैं। इनके अलावा संजीव सक्सेना, पंडित दीपक शर्मा, सुरेंद्र मिश्रा और समर्थ मिश्रा जैसे नाम भी टिकट की दौड़ में माने जाते हैं।
आमतौर पर इतनी संख्या में दावेदार होने पर गुटबाजी, खींचतान और मंच साझा करने से परहेज देखने को मिलता है, लेकिन कैंट विधानसभा सीट का बीएलए सम्मेलन इस सोच को पूरी तरह गलत साबित करता नजर आया। महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी ने सभी दावेदारों को एक मंच पर बैठाकर यह संदेश दिया कि पार्टी हित व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर है। यह कोई आसान काम नहीं था, लेकिन सुल्तानी ने इसे सहजता और राजनीतिक समझदारी के साथ अंजाम दिया।
सबसे अहम बात यह रही कि इस सम्मेलन का आयोजन भी सभी दावेदारों के सहयोग से हुआ। किसी ने श्रेय लेने की होड़ नहीं मचाई, न ही किसी ने खुद को अलग दिखाने की कोशिश की। मंच से लेकर नीचे तक यह एहसास दिखाई दिया कि यह सम्मेलन किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी पार्टी का है। एसआईआर जैसे संवेदनशील और रणनीतिक मुद्दे पर यह एकजुटता सपा के लिए बड़ी ताकत साबित हो सकती है।
इसी तरह बरेली शहर विधानसभा क्षेत्र में आयोजित बीएलए प्रशिक्षण शिविर ने भी महानगर संगठन की मजबूती को रेखांकित किया। इस सम्मेलन की अध्यक्षता भी शमीम खां सुल्तानी ने की और यहां भी संगठनात्मक अनुशासन और आपसी तालमेल की मिसाल देखने को मिली। बरेली शहर सीट से टिकट के प्रमुख दावेदारों में विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष हसीव खान, प्रदेश सचिव मोहम्मद कलीमुद्दीन और गौरव सक्सेना शामिल हैं।

इस सम्मेलन की खास बात यह रही कि मंच पर मौजूद सभी दावेदारों ने खुले तौर पर यह संकल्प लिया कि पार्टी जिसे भी उम्मीदवार बनाएगी, सभी मिलकर उसे चुनाव लड़ाएंगे और जिताने के लिए पूरी ताकत लगाएंगे। हसीव खान की सार्वजनिक घोषणा कि उम्मीदवार कोई भी हो, जीत पार्टी की प्राथमिकता है, संगठनात्मक परिपक्वता का संकेत थी। यह बयान केवल शब्दों तक सीमित नहीं था, बल्कि मंच पर मौजूद अन्य नेताओं की सहमति और माहौल से यह साफ झलक रहा था कि यह संकल्प वास्तविक है।
बरेली जिले में यह पहला बीएलए सम्मेलन था जब समाजवादी पार्टी के दो पूर्व सांसद- वीरपाल सिंह यादव और प्रवीण सिंह ऐरन एक साथ एक मंच पर नजर आए। यह दृश्य अपने आप में यह बताने के लिए काफी था कि महानगर संगठन ने पुराने मतभेदों और व्यक्तिगत दूरियों को पीछे छोड़ते हुए पार्टी हित को प्राथमिकता दी है। इन दोनों सम्मेलनों ने पार्टी कार्यकर्ताओं और बीएलए में नई ऊर्जा का संचार किया और यह भरोसा जगाया कि सपा महानगर में चुनावी लड़ाई के लिए तैयार है।

इसके ठीक उलट तस्वीर जिले की अन्य विधानसभा सीटों पर देखने को मिली, जहां बीएलए प्रशिक्षण शिविर पार्टी की कमजोर नसों को उजागर करते नजर आए। फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण बना। यहां हार की हैट्रिक लगा चुके पूर्व प्रत्याशी और एक बार फिर टिकट के दावेदार विजयपाल सिंह के कार्यालय में बीएलए सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस फैसले ने शुरुआत से ही विवाद को जन्म दे दिया। पूर्व ब्लॉक प्रमुख और टिकट के सबसे प्रबल दावेदार चंद्रसेन सागर सहित अन्य दावेदारों ने इस सम्मेलन से दूरी बना ली, जिससे यह साफ हो गया कि पार्टी भीतर से बंटी हुई है।
सम्मेलन में सभी बीएलए की मौजूदगी भी नहीं हो सकी। जो बीएलए पहुंचे, उनके श्रेय को लेकर भी खींचतान देखने को मिली। विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष और विजयपाल सिंह अपने-अपने तरीके से बीएलए तैयार करने का दावा करते नजर आए, जबकि जमीनी हकीकत यह थी कि सबसे ज्यादा बीएलए चंद्रसेन सागर के प्रयासों से बने थे। क्रेडिट की यह लड़ाई संगठन के लिए नुकसानदेह साबित हुई और सम्मेलन का उद्देश्य ही कमजोर पड़ गया।
भोजीपुरा विधानसभा सीट पर भी पार्टी की गुटबाजी खुलकर सामने आई। यहां मौजूदा विधायक शहजिल इस्लाम तो सम्मेलन में नजर आए, लेकिन दूसरे प्रमुख दावेदार और मीरगंज के पूर्व विधायक सुल्तान बेग की गैरमौजूदगी ने कई सवाल खड़े कर दिए। पार्टी के भीतर संवाद और समन्वय की कमी इस मंच से साफ झलकती रही।

बहेड़ी विधानसभा सीट पर तो अब तक बीएलए सम्मेलन का आयोजन ही नहीं हो सका है, जबकि एसआईआर की मसौदा सूची भी जारी हो चुकी है। यह जिला संगठन की निष्क्रियता को दर्शाता है। हालांकि, बहेड़ी के मौजूदा विधायक अता उर रहमान अपने आप में एक सक्षम नेता हैं जो अपने दम पर चुनाव लड़ना और जीतना बाखूबी जानते हैं। उन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में यह साबित भी करके दिखाया। वहीं नवाबगंज में आयोजित शिविर में भी तल्खियां और आपसी असहमति की खबरें सामने आईं। इन सभी सीटों पर बीएलए सम्मेलन पार्टी के लिए ताकत बनने के बजाय कमजोरी का आईना बन गए।
हालांकि, बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट पर युवा नेता डॉक्टर देवेंद्र यादव की उपस्थिति ने पार्टी कार्यकर्ताओं को कुछ संबल प्रदान किया। बीएलए जिला प्रभारी वीरपाल सिंह यादव का अपना क्षेत्र होने के नाते यहां संगठन की स्थिति मजबूत बनी हुई है।
इन हालातों में सबसे बड़ा सवाल जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप की भूमिका को लेकर उठता है। जिले की सात विधानसभा सीटों पर संगठन को एकजुट करने में उनकी नाकामी साफ तौर पर नजर आई। जहां महानगर में शमीम खां सुल्तानी ने नेतृत्व का परिचय देते हुए सभी धड़ों को एक मंच पर ला दिया, वहीं जिला स्तर पर शिवचरण कश्यप गुटबाजी रोकने और संतुलन बनाने में असफल दिखे।

बीएलए सम्मेलन किसी भी पार्टी के लिए संगठनात्मक शक्ति का पैमाना होते हैं। बरेली के मामले में यह पैमाना दो अलग-अलग तस्वीरें पेश करता है। एक तरफ महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी हैं, जिनके नेतृत्व में पार्टी एकजुट, अनुशासित और सक्रिय दिखी। दूसरी तरफ जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप हैं, जिनके कार्यकाल में जिले की कई सीटों पर भ्रम, असंतोष और आपसी टकराव खुलकर सामने आया।
कुल मिलाकर, एसआईआर के दौरान हुए बीएलए सम्मेलनों ने समाजवादी पार्टी को आईना दिखाने का काम किया है। यह साफ हो गया है कि जहां मजबूत नेतृत्व और सामूहिक सोच है, वहां संगठन खड़ा नजर आता है, और जहां नेतृत्व कमजोर है, वहां पार्टी बिखरती दिखाई देती है। अगर समाजवादी पार्टी ने अब भी इन संकेतों से सबक नहीं लिया और जिले के स्तर पर संगठन को दुरुस्त नहीं किया, तो आगामी विधानसभा चुनाव में उसकी स्थिति पिछली बार से भी ज्यादा कमजोर हो सकती है।

बरेली महानगर ने यह साबित कर दिया है कि सही नेतृत्व के साथ सपा अब भी चुनावी मुकाबले में मजबूती से खड़ी हो सकती है। अब देखना यह है कि पार्टी नेतृत्व इस अनुभव से क्या सीख लेता है और क्या जिला स्तर पर भी वही ऊर्जा और एकजुटता पैदा की जा सकेगी, जो शमीम खां सुल्तानी के नेतृत्व में महानगर में दिखाई दी।





