मीरगंज की सियासत में एक बार फिर पूर्व विधायक शराफतयार खां का नाम सुर्खियों में है। शराफतयार खां को सियासत अपने पिता और पूर्व सांसद मरहूम मिसिरयार खां से विरासत में मिली थी। लेकिन विधानसभा का सफर उन्होंने अपने दम पर तय किया था। वह एक बार फिर मीरगंज विधानसभा सीट से टिकट की दावेदारी जता रहे हैं। इस दावेदारी का आधार क्या है? उनका अब तक का राजनीतिक सफर कैसा रहा? एक दौर में आजम खां उनसे नाराज बताए जाते थे। उनकी नाराजगी की क्या वजह रही? मीरगंज के जातीय समीकरण में वह कितने फिट बैठते हैं? मौजूदा भाजपा विधायक डीसी वर्मा के कार्यकाल को वह किस नजरिये से देखते हैं? ऐसे कई मुद्दों पर indiatime24.com के संपादक नीरज सिसौदिया के साथ उन्होंने खुलकर बात की। पेश हैं मीरगंज के पूर्व विधायक शराफतयार खां से बातचीत के मुख्य अंश…
सवाल: आप मूल रूप से कहां के रहने वाले हैं और पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या रही?
जवाब: हम लोग मूल रूप से रामपुर जिले की बिलासपुर तहसील के अंतर्गत पड़ने वाले गांव अहरों के रहने वाले हैं। सियासत मुझे अपने मरहूम पिता और बरेली लोकसभा सीट से पहले मुस्लिम सांसद रहे मिसिरयार खां से विरासत में मिली है। पांच भाईयों में मैं अकेला ऐसा खुशनसीब हूं जिसे अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का मौका मिला और विधानसभा जाने का अवसर प्राप्त हुआ। एक जमाने में मेरे पिता भी उसी विधानसभा का हिस्सा बने थे जिस विधानसभा में मुझे जाने का अवसर स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव ने प्रदान किया था।

सवाल: आपके पिता विधायक भी रहे और सांसद भी? उन्होंने पहला चुनाव कहां से जीता?
जवाब: जी हां, बात उन दिनों की है जब मीरगंज विधानसभा सीट अस्तित्व में नहीं आई थी तब यह इलाका कांवर विधानसभा क्षेत्र में आता था। तत्कालीन कांग्रेस सरकार में धर्मदत्त वैद्य कैबिनेट मिनिस्टर हुआ करते थे। तब शीशगढ़ से हमारे पैतृक गांव अहरों तक एक रोड जाता था जिसकी हालत बहुत खराब थी। मेरे पिता उस सड़क को बनाने की मांग को लेकर धर्मदत्त वैद्य के पास गए और चेतावनी दी कि अगर यह रोड नहीं बनी तो मैं आपके (धर्मदत्त वैद्य के) खिलाफ चुनाव लड़ूंगा। वर्ष 1974 में जब चुनाव आए तो भूतपूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह हमारे घर आए और मेरे पिता को लोकदल से विधानसभा चुनाव लड़ने का ऑफर दिया। मेरे पिता चुनाव लड़े और तत्कालीन मंत्री धर्मदत्त वैद्य को हराकर पहली बार विधानसभा पहुंचे। इसके बाद वर्ष 1980 में मेरे पिता लोकदल के टिकट पर बरेली सीट से लोकसभा चुनाव लड़े और जीत गए। आजादी के बाद से यह पहला मौका था जब बरेली लोकसभा सीट से कोई मुस्लिम सांसद चुना गया।

सवाल : आपका चुनावी सफर कब और कैसे शुरू हुआ?
जवाब: बात नब्बे के दशक के शुरुआती साल की है। उस वक्त मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी का गठन कर रहे थे। तब फर्रुखाबाद जिले के कायमगंज के एक नेता हुआ करते थे अनवार खां साहब। अनवार खां ने मुझे समाजवादी पार्टी ज्वाइन करने को कहा। मैंने उनकी बात मान ली और सपा से जुड़ गया। वर्ष 1993 में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। मुलायम सिंह यादव तब समीकरण देखकर उम्मीदवार तय करते थे। वो मुस्लिमों में एक पठान, एक अंसारी और एक बंजारा समाज का उम्मीदवार बरेली जिले की सीटों से उतारा करते थे। उन्होंने पार्टी नेताओं से कहा कि मिसिरयार खां के परिवार के किसी सदस्य को चुनाव में उतारना है। मैं इससे पहले भी वर्ष 1990 में चुनाव लड़ चुका था लेकिन हार का सामना करना पड़ा था। 1993 में नेताजी ने मुझे टिकट दिया और मैं कांवर विधानसभा सीट से पहली बार विधायक चुन लिया गया।

सवाल: आगे का सफर कैसा रहा?
जवाब: वर्ष 1995 तक मैं विधायक रहा। उसके बाद मायावती ने सरकार गिरा दी। फिर लोकसभा चुनाव आए और नेताजी ने मुझे रामपुर लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। वह चुनाव इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि उस चुनाव में पहली बार ऐसा हुआ था कि चारों प्रमुख राजनीतिक दलों ने मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। कांग्रेस से नूर बानो, भाजपा से मुख्तार अब्बास नकवी चुनाव लड़ रहे थे। मुझे उस समय 1 लाख 55 हजार वोट मिले थे और मुख्तार अब्बास नकवी पहली बार रामपुर से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे। भाजपा इसलिए भी जीत गई थी क्योंकि उस वक्त कल्याण सिंह सरकार गिर गई थी जिसके कारण उसे सहानुभूति वोट भी मिल गए। नेता जी ने मुझे इसके लिए शाबाशी भी दी। फिर हम नेता जी से लगातार जुड़े रहे। नेता जी ने मुझे हमेशा टिकट और सम्मान दिया लेकिन कुछ ऊपरी नेताओं के चक्कर में बाद में मुझे विधानसभा टिकट नहीं दिया गया।

सवाल: आजम खां को आपसे क्या नाराजगी रही है कि उन्होंने आपकी जगह सुल्तान बेग को प्राथमिकता दी?
जवाब: देखिये हमारा प्रभाव बरेली और रामपुर दोनों जिलों में रहता है। हम जब राजनीति करते हैं तो हमें सबके काम करने पड़ते हैं। आजम खां नहीं चाहते थे कि रामपुर के लोग मेरे पास अपनी समस्याएं लेकर आएं और मैं उनका समाधान करूं। मेरे पास जो भी आता था मैं उसके काम करता था। इसी वजह से आजम खां नाराज थे और मुझे पिछले चुनावों में टिकट नहीं दिया गया।
सवाल: इस बार आप मीरगंज विधानसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं? क्या आपने इसके लिए दावेदारी जताई है?
जवाब : जी मैं मीरगंज विधानसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहता हूं। हाल ही में मैंने शिवपाल यादव जी से मुलाकात भी की थी और उनके समक्ष अपनी इच्छा जाहिर भी कर दी थी।

सवाल: मीरगंज के जातीय समीकरण में आप कितने फिट बैठते हैं?
जवाब: देखिये, मीरगंज का जातीय समीकरण बेहद दिलचस्प है। यहां करीब 1 लाख बीस हजार मुस्लिम मतदाता हैं। लगभग 35-40 हजार कुर्मी होंगे। इनके अलावा 50 हजार के आसपास लोधी, लगभग 20 हजार ठाकुर और 20 हजार जाट व अन्य मतदाता हैं।
मेरे समर्थन में मुस्लिम तो हैं ही। जाट, ठाकुर, कश्यप, मौर्य मेरे पक्ष में हैं। बाकी लोधी भाजपा के कोर वोटर हैं। इसलिए उन्हें तोड़ पाना आसान नहीं है। लेकिन कुछ प्रताड़ित और नाराज लोधी किसान मेरे साथ हैं।

सवाल : आप मीरगंज से चुनाव लड़ना चाहते हैं। आपकी नजर में मीरगंज विधानसभा के प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
जवाब : मीरगंज का सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार का है। किसान इससे सबसे अधिक परेशान हैं। उन्हें थानों में प्रताड़ित किया जा रहा है। बिना पैसे के उनका कोई काम नहीं किया जाता। मैं जब विधायक था तो मैंने इन सभी चीजों पर अंकुश लगाया था। सड़कें बदहाल हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं चरमराई हुई हैं। इन सबके अलावा बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा है। ऐसे तमाम मुद्दे हैं जो आज भी मीरगंज में मुंह बाए खड़े हैं।

सवाल : आप मीरगंज से विधायक रह चुके हैं। अपने कार्यकाल के दौरान आपने ऐसे कौन से काम कराए जो आज भी नजीर बने हुए हैं?
जवाब : जब मैं विधायक था तो मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। उस दौरान बरेली जिले में एक चीनी मिल बनाने का प्रस्ताव था। वह चीनी मिल फतेहगंज में लगने जा रही थी लेकिन मैंने नेताजी से कहकर सिधौली में चीनी मिल लगवाई। उस समय सिधौली में कोई पुल नहीं था तो हमने पहले पुल बनवाया। इसके अलावा शीशगढ़ में एक मुख्य सड़क थी जो 50 साल से नहीं बनी थी। उस सड़क के कारण शीशगढ़ का नाम ही कीचड़गढ़ पड़ गया था। मैंने वो सड़क बनवाई। मैंने नगरपालिकाओं को बजट बहुत दिलवाया और सबसे अधिक सड़कें मैंने ही बनवाईं। हमारी राजनीति परिवार की तरह होती है। हम एक बार जिसे अपना मान लेते हैं दसकी हमेशा मदद करते हैं। यही वजह है कि लंबे समय से चुनाव न लड़ने के बावजूद हम आज भी इलाके में उसी तरह काम कर रहे हैं जैसे विधायक रहते हुए करते थे।

सवाल: एक आखिरी सवाल, मीरगंज के मौजूदा विधायक डीसी वर्मा को आप कितना सफल या नाकाम मानते हैं?
जवाब : देखिये, मीरगंज में लूट का बाजार गर्म है। लोगों ने मजबूरी में उन्हें वोट दिया था। पिछली बार जब मेरा टिकट हुआ था तो मेरा सबसे अधिक स्वागत हिन्दुओं ने किया था। आप किसानों से बात करें वो खुद आपको अपनी परेशानी बता देंगे। कोटेदारों तक से वसूली की जा रही है। मैंने विधायक रहते हुए कभी ऐसा काम नहीं किया। मैं डीसी वर्मा को सबसे नाकाम विधायक के तौर पर देखता हूं।





