नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की सियासत में कुछ नाम सिर्फ नेता नहीं होते, वे एक दौर की कहानी होते हैं। चंद्रसेन सागर ऐसा ही एक नाम है। लोग उन्हें आज भी सिर्फ एक संभावित प्रत्याशी के रूप में नहीं, बल्कि स्वर्गीय सियाराम सागर के ‘हनुमान’ के रूप में याद करते हैं, वह हनुमान जो अपने भाई के लिए हर संकट में ढाल बनकर खड़ा रहा, जिसने सत्ता के गलियारों से लेकर गांव की पगडंडियों तक संगठन की सांसों को जिंदा रखा।
पांच बार विधायक रहे सियाराम सागर जब विधानसभा में आवाज उठाते थे, तो जमीन पर उस आवाज को आकार देने का काम चंद्रसेन सागर करते थे। विधायक भले सियाराम सागर थे, लेकिन जनता की चौखट पर दस्तक देने वाला चेहरा अक्सर चंद्रसेन सागर का ही होता था। यही वजह है कि बरेली की दलित राजनीति में उनका नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं।
समाजवादी राजनीति की परंपरा में ‘निष्ठा’ एक बड़ा शब्द है और चंद्रसेन सागर की राजनीति की बुनियाद यही निष्ठा रही है। भाई के प्रति समर्पण ने उन्हें ‘हनुमान’ की उपाधि दिलाई, लेकिन यह सिर्फ रिश्ते की बात नहीं थी। यह एक राजनीतिक साझेदारी थी, जिसमें भरोसा था, संघर्ष था और संगठन के प्रति अटूट प्रतिबद्धता थी। जब सियाराम सागर विधायक थे, तब फरीदपुर और आसपास के गांवों में दलित समाज की स्थिति बेहद कमजोर थी। सामाजिक उत्पीड़न आम बात थी, रोजगार के अवसर सीमित थे और प्रशासन तक पहुंच लगभग नामुमकिन थी। ऐसे समय में चंद्रसेन सागर वह चेहरा बने, जो दलित परिवारों के बच्चों को नौकरी दिलाने से लेकर थानों में न्याय दिलाने तक हर मोर्चे पर खड़े रहे। यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है।
राजनीति के जानकार कहते हैं कि वर्ष 2007 से पहले सियाराम सागर की जीतों के पीछे अगर कोई स्थायी संगठनात्मक ताकत थी, तो वह चंद्रसेन सागर की जमीन पर की गई मेहनत थी। विधायक का भाषण विधानसभा में गूंजता था, लेकिन गांवों में भरोसे की आवाज चंद्रसेन सागर की होती थी। यही कारण है कि भाई के निधन के बाद भी उनकी राजनीतिक विरासत बिखरी नहीं, बल्कि चंद्रसेन सागर के हाथों में आकर और मजबूत हुई। सियाराम सागर के पुत्र विशाल सागर और डीके सागर उनकी विरासत को आगे नहीं बढ़ा सके। डीके सागर के रास्ते में उनकी सरकारी नौकरी आड़े आ गई और विशाल सागर कांग्रेस का दामन थामकर मैदान में उतरे मगर जनता ने उन्हें सिरे से नकार दिया। इसलिए पूरा दारोमदार चंद्रसेन सागर पर ही आ गया है।
चंद्रसेन सागर की सियासत कभी सियाराम सागर की मोहताज नहीं रही। भुता ब्लॉक प्रमुख का चुनाव चंद्रसेन सागर के राजनीतिक जीवन का एक अहम मोड़ था। जब उन्हें हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाया गया, तब विरोध सिर्फ राजनीतिक नहीं था, वह व्यक्तिगत भी था। कहा जाता है कि इस प्रस्ताव में उनके अपने ही खेमे के एक करीबी ने साथ छोड़ दिया था। लेकिन राजनीति में असली ताकत संकट के समय ही परखी जाती है। चंद्रसेन सागर ने न सिर्फ कानूनी लड़ाई लड़ी, बल्कि कुर्सी भी वापस हासिल की। यह जीत सिर्फ एक पद की नहीं थी, यह उनके राजनीतिक धैर्य और जमीनी पकड़ की जीत थी।

फरीदपुर विधानसभा की बात करें तो यहां की सामाजिक संरचना बेहद जटिल है। दलित मतदाता सबसे अधिक हैं- जाटव, धोबी, खटिक, धानुक हर वर्ग की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं। चंद्रसेन सागर जाटव समाज से आते हैं, जो फरीदपुर की दलित आबादी में सबसे अधिक है लेकिन उनकी पहचान सिर्फ जातीय दायरे में सीमित नहीं है। यादव और मुस्लिम समाज में भी उनकी गहरी पैठ है जो उन्हें सपा के अन्य दावेदारों से ऊपर खड़ा करती है। ग्रामीण राजनीति में जातीय समीकरण जितने महत्वपूर्ण होते हैं, उतना ही महत्वपूर्ण होता है व्यक्तिगत भरोसा। और यही भरोसा चंद्रसेन सागर की असली पूंजी है।
उन्होंने अपनी राजनीति को सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रखा। फरीदपुर के 300 से अधिक बूथों पर बूथ लेवल एजेंटों की नियुक्ति व्यक्तिगत स्तर पर करना कोई साधारण बात नहीं। बूथ की राजनीति ही चुनाव का असली युद्धक्षेत्र होती है, और इस युद्ध की तैयारी उन्होंने वर्षों पहले शुरू कर दी थी। हर बूथ पर अपना कार्यकर्ता, हर गांव में अपना प्रतिनिधि—यह रणनीति बताती है कि वह चुनाव को सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक लंबी प्रक्रिया मानते हैं।
उनकी राजनीतिक यात्रा में एक दिलचस्प अध्याय पीलीभीत की बरखेड़ा विधानसभा सीट का भी रहा, जहां उन्होंने चुनाव लड़ा। उस दौरान उनकी नजदीकियां भाजपा नेता वरुण गांधी से बढ़ीं। हालांकि वह चुनाव जीत नहीं पाए, लेकिन उस दौर ने उन्हें व्यापक पहचान दी। हार के बावजूद संगठन और जनता के बीच उनका संवाद टूटा नहीं। यही उनकी राजनीति की खासियत है- वह हार को भी अनुभव में बदल देते हैं।
चंद्रसेन सागर की ताकत सिर्फ सामाजिक समीकरण नहीं, बल्कि प्रशासनिक नेटवर्क भी है। वर्षों तक विधायक के भाई और फिर खुद ब्लॉक प्रमुख रहने के कारण उनकी पहचान प्रशासनिक हलकों में भी मजबूत रही। उनकी तीन बेटियां सिविल सेवा में चयनित होकर आईएएस और आईआरएस जैसे पदों पर कार्यरत हैं। उनके दामाद भी सिविल सेवक हैं। यह तथ्य सिर्फ एक पारिवारिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक भी है। ग्रामीण समाज में यह संदेश गहराई से जाता है कि नेता का परिवार शिक्षा और प्रशासनिक सेवा में आगे है, तो उसका प्रभाव भी व्यापक होगा। चंद्रसेन सागर खुद उस दौर में सिविल सेवा की तैयारी करते थे जब ग्रामीण इलाकों में रहने वाले दलितों के बच्चे बामुश्किल दसवीं पास कर पाते थे।
समाजवादी पार्टी के भीतर आज जब फरीदपुर सीट को लेकर मंथन चल रहा है, तो चंद्रसेन सागर का नाम सबसे आगे इसलिए है क्योंकि वह सिर्फ दावेदार नहीं, एक परंपरा के वाहक हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में उनका टिकट लगभग तय माना जा रहा था, लेकिन अंतिम क्षणों में समीकरण बदल गए। इस बार हालात अलग हैं। दो चुनावों की हार के बाद पार्टी को ऐसे चेहरे की तलाश है, जो संगठन, समाज और प्रशासन तीनों में संतुलन साध सके।
चंद्रसेन सागर को वरिष्ठ समाजवादी नेता शिवपाल सिंह यादव का करीबी माना जाता है। यह नजदीकी सिर्फ राजनीतिक नहीं, वैचारिक भी है। समाजवादी आंदोलन की जड़ों से जुड़े नेता के रूप में उनकी पहचान रही है। फरीदपुर की राजनीति में अगर कोई नेता ऐसा है, जो दलित, यादव और मुस्लिम समीकरण को एक धुरी पर ला सकता है, तो वह चंद्रसेन सागर ही माने जाते हैं।
ग्रामीण राजनीति में विकास के बड़े दावों से ज्यादा असर व्यक्तिगत हस्तक्षेप का होता है। किसी गरीब परिवार का मुकदमा सुलझवाना, किसी युवा को नौकरी दिलाना, किसी सामाजिक विवाद में बीच-बचाव करना यही वो काम हैं, जिनसे नेता की असली पहचान बनती है। चंद्रसेन सागर ने इसी मॉडल को अपनाया। उन्होंने सड़क और पुल से पहले लोगों के घरों की दहलीज पर भरोसा खड़ा किया।
आज जब फरीदपुर की गलियों में चुनाव की आहट सुनाई दे रही है, तो चंद्रसेन सागर का नाम फिर उसी श्रद्धा और उम्मीद के साथ लिया जा रहा है, जैसे कभी सियाराम सागर का लिया जाता था। फर्क सिर्फ इतना है कि तब वह ‘हनुमान’ थे, और आज खुद एक धुरी बन चुके हैं। राजनीति में विरासत मिल सकती है, लेकिन जनाधार कमाना पड़ता है। चंद्रसेन सागर ने यह जनाधार अपने संघर्ष, समर्पण और संगठन की ताकत से अर्जित किया है। समाजवादी पार्टी अगर इस बार फरीदपुर में जीत की कहानी लिखना चाहती है, तो उसे उस ‘हनुमान’ की याद करनी होगी, जिसने कभी अपने भाई और अपने नेता के लिए हर संकट झेला था और आज खुद मैदान में उतरने को तैयार खड़ा है।
फरीदपुर की यह सियासी रामायण अभी अधूरी है। टिकट की घोषणा बाकी है, समीकरणों का अंतिम जोड़-घटाव चल रहा है। लेकिन इतना तय है कि बरेली की राजनीति में चंद्रसेन सागर का नाम सिर्फ एक प्रत्याशी नहीं, बल्कि एक युग की निरंतरता का प्रतीक है। और शायद यही वजह है कि इस बार फरीदपुर की धरती पर फिर वही सवाल गूंज रहा है- क्या ‘सियाराम के हनुमान’ अब खुद रणभूमि के नायक बनेंगे?





