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क्या अबकी बार भी खाली हाथ रह जाएंगे यादव? बरेली जिला अध्यक्ष पद पर गैर यादव की ताजपोशी की हो रही तैयारी, जानिये किसके सिर सज सकता है ताज और कौन होगा नाराज?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

समाजवादी पार्टी ने बरेली जिले के नए जिला अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर अंदरखाने तैयारियां तेज कर दी हैं। लंबे समय से खाली चल रहे इस अहम पद को लेकर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। पार्टी के भीतर चर्चा है कि इस बार भी यादव समाज से किसी नेता को यह जिम्मेदारी नहीं मिलने वाली है। इसके बजाय गैर यादव लेकिन पिछड़े वर्ग के किसी नेता को जिला अध्यक्ष बनाया जा सकता है। पार्टी का मकसद साफ नजर आ रहा है कि आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले जातीय संतुलन साधा जाए और उन वर्गों को संगठन में आगे लाया जाए, जिनका वोट बैंक मजबूत माना जाता है।

पार्टी सूत्रों की मानें तो यादव समाज को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जाएगा। बताया जा रहा है कि यादव नेताओं को संतुष्ट करने के लिए बिथरी विधानसभा सीट से किसी यादव नेता को आगामी चुनाव में उम्मीदवार बनाया जा सकता है। इससे एक तरफ संगठन में गैर यादव समाज को प्रतिनिधित्व मिलेगा तो दूसरी तरफ यादव समाज को भी चुनावी टिकट के जरिए मनाने की कोशिश होगी।

गैर यादव समाज में इस बार पार्टी की नजर मुख्य रूप से लोधी, साहू-राठौर और कुर्मी समाज पर टिकी हुई है। इन तीनों समाजों का जिले की राजनीति में अच्छा खासा असर माना जाता है। खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में इन समाजों का वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है। यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व इन्हीं वर्गों में से किसी एक समाज के नेता को जिला अध्यक्ष बनाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।

साहू-राठौर समाज की दावेदारी

सबसे पहले बात साहू-राठौर समाज की करें तो पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने पूरे बरेली मंडल में इस समाज के किसी भी नेता को टिकट नहीं दिया था। इससे साहू-राठौर समाज में नाराजगी भी देखी गई थी। अब पार्टी इस गलती को सुधारने की कोशिश कर रही है।

बरेली जिले में साहू-राठौर समाज से सबसे बड़ा नाम कमल साहू का है। कमल साहू युवा नेता हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। वे लंबे समय से संगठन से जुड़े हुए हैं और जमीन पर काम करने वाले नेताओं में उनकी गिनती होती है। पार्टी के भीतर चर्चा है कि अगर साहू-राठौर समाज को प्राथमिकता दी जाती है तो कमल साहू की ताजपोशी लगभग तय मानी जा रही है।

कमल साहू

इसी उम्मीद में कमल साहू पिछले दो दिनों से लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी के प्रदेश मुख्यालय में डेरा डाले हुए हैं। वे लगातार पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि साहू-राठौर समाज को संगठन में बड़ा पद मिलने से इस समाज का झुकाव फिर से सपा की ओर हो सकता है।

लोधी समाज की मजबूत दावेदारी

गैर यादव समाज में दूसरा बड़ा वर्ग लोधी समाज है। बरेली जिले में लोधी समाज के लगभग तीन लाख मतदाता बताए जाते हैं। यह संख्या किसी भी राजनीतिक दल के लिए काफी अहम मानी जाती है। इस समाज से सबसे मजबूत नेता महानगर सचिव महेंद्र सिंह राजपूत लोधी हैं।

महेंद्र सिंह लोधी ने जिला अध्यक्ष पद के लिए सबसे पहले दावेदारी पेश की। जब अन्य नेता अभी लखनऊ जाने की योजना बना रहे थे, तब तक वे लखनऊ जाकर पार्टी नेतृत्व से मिल भी आए। उन्होंने राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल से मुलाकात कर अपनी दावेदारी रखी है।

लोधी समाज की दावेदारी इसलिए भी मजबूत मानी जा रही है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बरेली जिले की नौ सीटों में से किसी भी सीट पर लोधी समाज का उम्मीदवार नहीं उतारा था। वहीं दूसरी ओर भाजपा ने मीरगंज विधानसभा सीट से लोधी समाज से आने वाले डॉक्टर डीसी वर्मा को टिकट दिया था और वे विधायक भी बन गए। इसका असर पूरे जिले में दिखा और लोधी समाज का बड़ा हिस्सा भाजपा के पक्ष में चला गया।

महेंद्र सिंह लाेधी राजपूत

अब अगर समाजवादी पार्टी भाजपा के इस किले में सेंध लगाना चाहती है तो उसे लोधी समाज को कोई बड़ा पद देना होगा। ऐसे में अगर पार्टी लोधी समाज पर भरोसा जताती है तो महेंद्र सिंह लोधी की ताजपोशी लगभग तय मानी जा रही है। महेंद्र सिंह युवा हैं, संगठन में अनुभव रखते हैं और उनका स्वभाव सरल बताया जाता है। इसी वजह से पार्टी के भीतर उनकी स्वीकार्यता भी अच्छी मानी जा रही है।

मौर्य और कश्यप समाज की कमजोर स्थिति

गैर यादव समाज में मौर्य और कश्यप समाज भी आते हैं, लेकिन पार्टी इन दोनों समाजों से किसी को जिला अध्यक्ष बनाने के मूड में नहीं दिख रही है। इसकी वजह पिछले पांच साल का अनुभव बताया जा रहा है।

पिछले पांच वर्षों में पार्टी ने इन दोनों समाजों से जिला अध्यक्ष बनाए थे, लेकिन दोनों ही अपने कार्यकाल में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाए। एक जिला अध्यक्ष के समय विधानसभा चुनाव में बरेली के इतिहास का दूसरा सबसे खराब प्रदर्शन हुआ था। वहीं दूसरे जिला अध्यक्ष अपनी ही विधानसभा सीट नहीं जीत पाए थे। इन कारणों से पार्टी नेतृत्व इन दोनों समाजों पर फिर से भरोसा करने के पक्ष में नहीं दिख रहा है।

कुर्मी समाज की स्थिति

तीसरे नंबर पर कुर्मी समाज का नाम आता है। इस समाज से सबसे बड़ा और चर्चित चेहरा भगवत सरन गंगवार हैं। भगवत सरन गंगवार पहले मंत्री रह चुके हैं और संगठन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा चुके हैं। वे पहले जिला अध्यक्ष भी रह चुके हैं, इसलिए उनके पास अनुभव की कमी नहीं है।

भगवत सरन गंगवार

हालांकि सूत्रों का कहना है कि भगवत सरन गंगवार फिलहाल विधानसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक हैं। इसलिए वे दोबारा जिला अध्यक्ष की कुर्सी संभालने में खास रुचि नहीं दिखा रहे हैं। यही वजह है कि कुर्मी समाज की दावेदारी फिलहाल कमजोर नजर आ रही है।

दलित समाज के दावेदार

अगर दलित समाज की बात करें तो इस वर्ग से दो बड़े नाम सामने आ रहे हैं। पहला नाम फरीदपुर के पूर्व विधायक विजयपाल सिंह का है और दूसरा नाम पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर का है।

चंद्रसेन सागर

चंद्रसेन सागर संगठन की राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं रखते। वे भी भगवत सरन गंगवार की तरह विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। इसलिए उनके जिला अध्यक्ष बनने की संभावना कम मानी जा रही है।

विजयपाल सिंह

वहीं विजयपाल सिंह हार की हैट्रिक लगा चुके हैं। अगर उन्हें जिला अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिलती है तो वे इसे सहर्ष स्वीकार कर सकते हैं। इसके अलावा बाबा साहेब अंबेडकर वाहिनी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुरेंद्र सोनकर का नाम भी दलित दावेदारों में सामने आ रहा है।

सुरेंद्र सोनकर अपने दलित साथियों के साथ।

सूत्र बताते हैं कि सुरेंद्र सोनकर भी अन्य दावेदारों की तरह लखनऊ जाकर पार्टी नेतृत्व से मुलाकात कर चुके हैं। वे अक्सर पूर्व जिला अध्यक्ष शिवचरण कश्यप के साथ कार्यक्रमों में नजर आते रहे हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि संगठन में उनकी पकड़ धीरे-धीरे मजबूत हो रही है।

यादव नेताओं की स्थिति

जिला अध्यक्ष पद की दौड़ में यादव समाज से भी कई नेता मैदान में हैं। इनमें वीरपाल सिंह यादव, शुभलेश यादव, संजीव यादव, अरविंद यादव और रविंदर यादव के नाम प्रमुख हैं। इन सभी नेताओं ने अलग-अलग स्तर पर अपनी दावेदारी पेश की है।

रविंदर यादव भी हाल ही में लखनऊ पहुंचकर पार्टी नेतृत्व से मिलने की कोशिश कर चुके हैं। हालांकि पार्टी के अंदरूनी हालात को देखते हुए इन सभी यादव नेताओं के हाथ निराशा लगने की संभावना ज्यादा नजर आ रही है।

पार्टी नेतृत्व का मानना है कि लगातार यादव समाज को ही संगठन में प्रमुख पद देने से अन्य पिछड़े वर्गों में असंतोष पैदा हो रहा है। इसलिए इस बार गैर यादव समाज को आगे लाकर सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है।

राजनीतिक संतुलन साधने की कवायद

समाजवादी पार्टी के लिए बरेली जिला अध्यक्ष का पद काफी अहम माना जाता है। बरेली जिले में कुल नौ विधानसभा सीटें हैं और इन सभी पर पार्टी की रणनीति जिला अध्यक्ष की भूमिका से जुड़ी होती है। ऐसे में पार्टी कोई भी फैसला सोच-समझकर लेना चाहती है।

पार्टी सूत्रों का कहना है कि जल्द ही जिला अध्यक्ष के नाम की घोषणा हो सकती है। लखनऊ में लगातार बैठकों का दौर चल रहा है और सभी दावेदार अपनी-अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं।

अब देखने वाली बात यह होगी कि पार्टी नेतृत्व किस समाज पर भरोसा जताता है। क्या साहू-राठौर समाज को पहली बार इतना बड़ा पद मिलेगा, या फिर लोधी समाज को साधने के लिए महेंद्र सिंह लोधी को कमान सौंपी जाएगी, या दलित समाज से किसी चेहरे को आगे लाया जाएगा।

इतना तय माना जा रहा है कि इस बार भी यादव समाज के नेताओं को जिला अध्यक्ष की कुर्सी से दूर रखा जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो यादव नेताओं में नाराजगी भी देखने को मिल सकती है। हालांकि पार्टी उन्हें टिकट देकर संतुलित करने की कोशिश करेगी।

कुल मिलाकर बरेली में समाजवादी पार्टी का जिला अध्यक्ष कौन बनेगा, यह सवाल अब हर कार्यकर्ता की जुबान पर है। फैसला चाहे जो भी हो, उसका असर आने वाले विधानसभा चुनावों पर जरूर पड़ेगा। अब सबकी नजर लखनऊ से आने वाले उस फैसले पर टिकी है, जो बरेली की राजनीति की दिशा तय करेगा।

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