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मेथोडिस्ट अफसरों की मिलीभगत से छात्राओं का मैदान ‘नीलाम’, माफियाओं को सौंप दी करोड़ों की जमीन, हरीश अरोड़ा समेत चार पर एफआईआर दर्ज होने के बाद अब कई और बड़े चेहरे भी रडार पर, शासन को गुमराह करने वाले अधिकारी और नेता भी नपेंगे, जानिये क्यों?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली में शिक्षा और संस्थागत ईमानदारी को शर्मसार करने वाला एक बड़ा घोटाला सामने आया है, जहां मेथोडिस्ट गर्ल्स इंटर कॉलेज की छात्राओं के खेलकूद के लिए आरक्षित करोड़ों रुपये की जमीन को कथित तौर पर सुनियोजित साजिश के तहत ‘अनयूज्ड’ दिखाकर माफियाओं के हवाले कर दिया गया। इस पूरे खेल में अब सिविल लाइंस स्थित इमेज इलेक्ट्रॉनिक के मालिक हरीश अरोड़ा समेत चार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने के बाद हड़कंप मच गया है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती- जांच की आंच अब उन अफसरों और सियासी चेहरों तक भी पहुंच रही है, जिन्होंने पर्दे के पीछे से इस पूरे खेल को अंजाम देने में अहम भूमिका निभाई। झूठी रिपोर्ट देकर शासन और सरकार को गुमराह किया।
इस घोटाले की परतें खुलते ही यह साफ हो गया है कि यह कोई साधारण लापरवाही नहीं, बल्कि पूरी प्लानिंग के साथ किया गया ‘जमीन हड़पने का ऑपरेशन’ है। आरोप है कि जिस मैदान पर सालों से छात्राएं खेलती थीं, उसे कागजों में हेरफेर कर ‘बेकार’ घोषित कर दिया गया और फिर चुपचाप लीज पर चढ़ा दिया गया। यह खेल तब उजागर हुआ जब किला छावनी निवासी अमर सिंह राठौर ने शिकायत की, लेकिन स्थानीय हलकों में चर्चा है कि वह सिर्फ एक चेहरा हैं, असल पटकथा कहीं और लिखी गई।
बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले के पीछे वरिष्ठ भाजपा नेता और जिला सहकारी संघ के पूर्व चेयरमैन महेश पांडेय की सक्रिय भूमिका रही है। उन्होंने लगातार इस मामले को उठाया, शिकायतें कीं और जांच की मांग की। लेकिन हैरानी की बात यह है कि शुरुआती जांचों में कुछ अफसरों ने सियासी दबाव में आकर रिपोर्ट को ही ‘मैनेज’ कर दिया। गलत तथ्यों के आधार पर रिपोर्ट बनाकर शासन को गुमराह किया गया, जिससे मामला लंबे समय तक दबा रहा। अब जब एफआईआर दर्ज हो चुकी है, तो वही अधिकारी और उनके साथ जुड़े राजनीतिक चेहरे भी जांच के घेरे में आ रहे हैं।
पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिस जमीन को ‘अनयूज्ड’ बताया गया, वह वास्तव में वर्षों से छात्राओं के खेलकूद का प्रमुख केंद्र रही है। त्रि-सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया कि कॉलेज के पास करीब 20 हजार वर्गमीटर का विशाल खेल मैदान था। अलग-अलग दस्तावेजों में कहीं तीन मैदान, कहीं दो वॉलीबॉल कोर्ट और एक बास्केटबॉल कोर्ट का जिक्र मिला, जो इस बात का पुख्ता सबूत है कि यह जमीन सक्रिय उपयोग में थी।
इसके बावजूद, 4 मार्च 2022 को संस्था के अधिकृत सचिव डॉ. न्यूटन एम. परमार ने इस मैदान के 610 वर्गमीटर हिस्से को ‘अनयूज्ड’ घोषित कर क्षितिज इंटरप्राइजेज को लीज पर दे दिया। यह कदम न सिर्फ नियमों की खुली अवहेलना था, बल्कि छात्राओं के अधिकारों पर सीधा हमला भी। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे सौदे के लिए शिक्षा विभाग से अनुमति लेने का कोई रिकॉर्ड तक मौजूद नहीं है।
जांच में एक और गंभीर गड़बड़ी सामने आई—जिस जमीन को घेरकर अपना बताया गया, उसका क्षेत्रफल रजिस्टर्ड लीज डीड से करीब 2200 वर्गमीटर अधिक निकला। यानी साफ तौर पर तय सीमा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया गया। मौके पर जांच के दौरान एक पुरानी सड़क भी मिली, जो कॉलेज परिसर के भीतर से मिशन अस्पताल की ओर जाती थी। अब इस सड़क को भी विवादित जमीन में शामिल कर लिया गया है, जिससे कब्जे की साजिश और गहरी नजर आती है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मंडलायुक्त सौम्या अग्रवाल ने अपर आयुक्त (प्रशासन), एसपी सिटी और एडीएम सिटी की त्रि-सदस्यीय समिति गठित की थी। इस समिति की रिपोर्ट ने पूरे खेल की पोल खोल दी। इसके आधार पर संयुक्त शिक्षा निदेशक के निर्देश पर डीआईओएस डॉ. अजीत कुमार ने कोतवाली में तहरीर दी, जिसके बाद डॉ. न्यूटन एम. परमार, सुनील मसीह और हरीश अरोड़ा समेत अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।
सुनील मसीह का नाम सामने आना भी कम चौंकाने वाला नहीं है। बताया जाता है कि उनके खिलाफ पहले भी कई संपत्तियों की कथित अवैध बिक्री के मामले दर्ज हैं। यानी यह पहली बार नहीं है जब चर्च या मिशन से जुड़ी जमीनों को लेकर सवाल उठे हों। सूत्रों के मुताबिक, शहर में एक संगठित गिरोह सक्रिय है, जो मेथोडिस्ट चर्च से जुड़ी जमीनों के फर्जी दस्तावेज तैयार कराता है। एक वकील के जरिए कागज तैयार होते हैं, फिर स्थानीय भू-माफिया और एमसीआई के अफसरों की मिलीभगत से पूरी डील को अंजाम दिया जाता है। इसके बाद मुंबई में बैठे बिशप के स्तर से एनओसी और अन्य कागज ‘मैनेज’ किए जाते हैं।
यह गिरोह सिर्फ कॉलेज के मैदान तक सीमित नहीं है। जानकारी के अनुसार, बरेली में हिंद टॉकीज के पास की जमीन, बटलर प्लाजा के आसपास के इलाके और यहां तक कि पेट्रोल पंप की जमीनों पर भी इनकी नजर है। यानी यह पूरा मामला एक बड़े ‘लैंड माफिया नेटवर्क’ की ओर इशारा करता है, जो संस्थागत जमीनों को निशाना बनाकर करोड़ों का खेल कर रहा है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि अगर इस जमीन पर व्यावसायिक निर्माण—जैसे शॉपिंग कॉम्प्लेक्स—होता है, तो इसका सीधा असर कॉलेज के माहौल और छात्राओं की सुरक्षा पर पड़ेगा। जिस जगह पर छात्राएं खेलती थीं, वहां अगर दुकानों और भीड़भाड़ का माहौल बनेगा, तो यह न केवल शिक्षा के माहौल को बिगाड़ेगा बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी बड़ा खतरा पैदा करेगा।
फिलहाल पुलिस मामले की जांच में जुटी है, लेकिन यह साफ हो चुका है कि यह सिर्फ एक एफआईआर का मामला नहीं है। यह उस सिस्टम की कहानी है, जहां अफसर, माफिया और सियासत का गठजोड़ मिलकर सार्वजनिक और शैक्षणिक संपत्तियों को लूटने में लगा है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या जांच सच में ‘बड़ी मछलियों’ तक पहुंचेगी या फिर यह मामला भी समय के साथ फाइलों में दफन हो जाएगा।
बरेली में उठे इस तूफान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है—क्या छात्राओं का हक और शिक्षा संस्थानों की जमीन भी अब सुरक्षित नहीं रही?

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