नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे सियासी हलचल भी तेज होती जा रही है। हर पार्टी अपने-अपने स्तर पर तैयारी में जुटी है, कार्यकर्ता मैदान में सक्रिय हैं और जनता के बीच पहुंच बनाने की कोशिशें तेज हो चुकी हैं। लेकिन इस पूरे राजनीतिक माहौल के बीच एक नया ट्रेंड तेजी से उभरकर सामने आया है- फर्जी सर्वेक्षणों का खेल। खासतौर पर बरेली जिले की नौ विधानसभा सीटों को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया पर ऐसे सर्वेक्षणों की बाढ़ आ गई है, जो देखने में तो चुनावी जनमत का आईना लगते हैं, लेकिन अंदर से उनकी सच्चाई कुछ और ही कहानी बयां करती है।
इन सर्वेक्षणों को देखकर पहली नजर में ऐसा लगता है कि जनता खुलकर अपनी राय दे रही है और यह तय कर रही है कि कौन नेता सबसे मजबूत है और किसे टिकट मिलना चाहिए। लेकिन जब इन सर्वेक्षणों की गहराई से जांच की गई, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए, जो यह संकेत देते हैं कि यह पूरा खेल एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।
सबसे पहले बात करते हैं इन सर्वेक्षणों की प्रकृति की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम और मोबाइल ऐप्स पर चल रहे ये सर्वे देखने में बेहद आकर्षक होते हैं। इनमें किसी विशेष विधानसभा क्षेत्र के कुछ नेताओं की तस्वीरों का एक कोलाज डिजाइन किया जाता है और लोगों से पूछा जाता है कि उनके क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय नेता कौन है या फिर किसे टिकट मिलना चाहिए। लेकिन असल समस्या यहीं से शुरू होती है। इन सर्वेक्षणों में हिस्सा लेने के लिए किसी भी तरह की सत्यापन प्रक्रिया नहीं होती। यानी कोई भी व्यक्ति, चाहे वह बरेली का निवासी हो या नहीं, यहां तक कि उत्तर प्रदेश का मतदाता भी न हो, वह भी आसानी से वोट कर सकता है। बस उसके पास एक स्मार्टफोन होना चाहिए।
यही वजह है कि इन सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा होता है। जब किसी विधानसभा क्षेत्र के बाहर का व्यक्ति भी वोट कर सकता है, तो यह कैसे तय किया जा सकता है कि असल में उस क्षेत्र की जनता किसे पसंद करती है? यह सवाल चुनावी विश्लेषण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
दूसरा बड़ा पहलू इन सर्वेक्षणों में शामिल किए गए नामों का है। जांच में यह सामने आया कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के मजबूत और चर्चित चेहरों को इन सर्वेक्षणों में प्रमुखता से शामिल किया गया है, जबकि मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के कई मजबूत और जमीनी दावेदारों को या तो शामिल ही नहीं किया गया या फिर उन्हें जानबूझकर कमजोर दिखाया गया। इससे यह संदेह और गहरा हो जाता है कि इन सर्वेक्षणों का मकसद निष्पक्ष जनमत जानना नहीं, बल्कि एक खास नैरेटिव बनाना है।
कुछ मामलों में तो यह भी देखा गया कि जिन नेताओं का अपने क्षेत्र में अच्छा जनाधार है, उन्हें सर्वे के नतीजों में सबसे नीचे दिखाया गया। वहीं, कुछ ऐसे नामों को समाजवादी पार्टी का दावेदार बताया गया, जो वास्तव में पार्टी से जुड़े ही नहीं हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि यह पूरा खेल सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि धारणा (perception) बनाने का है।
इंडिया टाइम 24 की पड़ताल में एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया। टीम ने खुद इन सर्वेक्षणों में हिस्सा लेकर देखा और पाया कि बिना किसी पहचान के, बिना किसी क्षेत्रीय सत्यापन के, आसानी से वोट डाला जा सकता है। यहां तक कि जो व्यक्ति उस विधानसभा क्षेत्र का मतदाता नहीं है, वह भी अपनी पसंद दर्ज कर सकता है। यह स्थिति चुनावी प्रक्रिया के लिहाज से बेहद चिंताजनक है, क्योंकि इससे गलत संदेश जाता है और वास्तविक जनमत दब जाता है।
कुछ स्थानीय नेताओं और दावेदारों ने भी इस पर खुलकर अपनी बात रखी। उनका कहना है कि वे पिछले कई वर्षों से अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय हैं, जनता के बीच काम कर रहे हैं और चुनाव की तैयारी में जुटे हैं, लेकिन इन सर्वेक्षणों में उनका नाम तक नहीं है। अगर नाम है भी, तो उन्हें बेहद कमजोर उम्मीदवार के रूप में दिखाया गया है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर इन सर्वेक्षणों का आधार क्या है और इन्हें तैयार करने वाले लोग किस मंशा से काम कर रहे हैं। इसकी जांच निर्वाचन आयोग क्यों नहीं कर रहा।
एक और महत्वपूर्ण पहलू इन सर्वेक्षणों के तकनीकी स्वरूप का है। बताया जा रहा है कि कुछ कंपनियों ने पहले लोगों से अपना मोबाइल ऐप डाउनलोड कराया और फिर उसी ऐप के जरिए वोटिंग करवाई। इन कंपनियों को प्रो-बीजेपी माना जा रहा है। अब जाहिर सी बात है कि जिसने ऐप डाउनलोड किया, वही वोट करेगा। ऐसे में यह पूरी प्रक्रिया एक सीमित और नियंत्रित समूह तक सिमट जाती है, जिसे आसानी से प्रभावित भी किया जा सकता है। यही वजह है कि इसे कई लोग “मैनेज्ड सर्वे” भी कह रहे हैं।
पुरानी कहावत है- “जंगल में मोर नाचा, किसने देखा?”, कुछ ऐसा ही हाल इन सर्वेक्षणों का भी है। आंकड़े तो दिखाए जा रहे हैं, लेकिन उनकी सच्चाई क्या है, यह कोई नहीं जानता। न कोई पारदर्शिता, न कोई स्पष्ट प्रक्रिया, न कोई जवाबदेही।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर इन फर्जी सर्वेक्षणों का मकसद क्या है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा उद्देश्य **पार्टी के अंदर टिकट वितरण प्रक्रिया को प्रभावित करना हो सकता है। अगर किसी **पार्टी के सामने बार-बार यह दिखाया जाए कि कोई खास उम्मीदवार बेहद लोकप्रिय है, तो **पार्टी नेतृत्व उस पर विचार कर सकता है, भले ही जमीनी हकीकत कुछ और हो।
इसी तरह, अगर किसी मजबूत उम्मीदवार को लगातार कमजोर दिखाया जाए, तो उसका दावा कमजोर पड़ सकता है। यह रणनीति खासतौर पर उन क्षेत्रों में ज्यादा कारगर मानी जाती है, जहां मुकाबला कड़ा हो और टिकट के लिए कई दावेदार हों।
यही वजह है कि यह भी आरोप लग रहे हैं कि कुछ सर्वेक्षणों का मकसद विपक्षी दल, खासकर समाजवादी पार्टी, को कमजोर करना और ऐसे उम्मीदवारों को आगे बढ़ाना है जो मुकाबले में कमजोर साबित हों। अगर ऐसा होता है, तो सत्तारूढ़ पार्टी के लिए चुनावी राह आसान हो सकती है।
इस पूरे मामले पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी अपने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट सलाह दी है। उन्होंने कहा है कि ऐसे फर्जी सर्वेक्षणों के चक्कर में पड़ने की जरूरत नहीं है। कार्यकर्ताओं को चाहिए कि वे जमीनी स्तर पर काम करें, जनता के बीच जाएं और अपने संगठन को मजबूत करें। उनका साफ संदेश है कि असली ताकत सर्वेक्षणों में नहीं, बल्कि जनता के समर्थन में होती है।
राजनीतिक रूप से देखें तो यह सलाह बेहद अहम है। क्योंकि आज के डिजिटल दौर में सोशल मीडिया पर जो दिखता है, वही सच नहीं होता। कई बार यह एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा होता है, जिसका मकसद लोगों की सोच को प्रभावित करना होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के समय इस तरह के फर्जी सर्वेक्षण लोकतंत्र के लिए भी खतरा बन सकते हैं। यह न सिर्फ मतदाताओं को गुमराह करते हैं, बल्कि राजनीतिक दलों के निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि चुनाव आयोग भी समय-समय पर ऐसे मामलों को लेकर सख्ती दिखाता रहा है और पारदर्शिता पर जोर देता है।
आखिर में यही कहा जा सकता है कि बरेली में सामने आया यह मामला सिर्फ एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश में बढ़ते उस ट्रेंड का हिस्सा है, जहां डेटा और तकनीक का इस्तेमाल राजनीति को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है। ऐसे में जरूरी है कि न सिर्फ राजनीतिक दल, बल्कि आम मतदाता भी सतर्क रहें और किसी भी जानकारी को आंख मूंदकर स्वीकार न करें।
चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव होता है और इसमें हर वोट की अहमियत होती है। ऐसे में अगर फर्जी सर्वेक्षणों के जरिए इस प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश होती है, तो यह न सिर्फ राजनीति के लिए, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी चिंता का विषय है। इसलिए जागरूकता ही इसका सबसे बड़ा समाधान है- जितना ज्यादा लोग सच को समझेंगे, उतना ही ऐसे फर्जीवाड़े का असर कम होगा।

बरेली में फर्जी सर्वेक्षणों की बाढ़: ”जंगल में मोर नाचा, किसने देखा”, चुनाव से पहले सोशल मीडिया पर ‘जनमत’ के नाम पर बड़ा खेल, बरेली में समाजवादियों का चुनावी खेल बिगाड़ने की है तैयारी, समझिए पूरा मामला और अखिलेश यादव की सलाह




