नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश की राजनीति में वर्ष 2027 का विधानसभा चुनाव अभी भले दूर दिखाई दे रहा हो, लेकिन सियासी दलों ने अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। लोकसभा चुनाव के बाद बदले राजनीतिक समीकरणों और कांग्रेस की नई आक्रामक रणनीति ने प्रदेश की राजनीति को फिर से गर्म कर दिया है। खास तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अब उन सीटों पर अपनी जमीन मजबूत करने में जुट गई है जहां कभी उसका मजबूत जनाधार हुआ करता था या जहां गठबंधन की राजनीति में उसके लिए अवसर बन सकते हैं। बरेली कैंट विधानसभा सीट भी अब उन्हीं सीटों में शामिल होती दिखाई दे रही है।
बुधवार को कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का बरेली दौरा सिर्फ एक सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था। यह दौरा कई बड़े राजनीतिक संकेत देकर गया। सबसे महत्वपूर्ण संकेत था वरिष्ठ कांग्रेस नेता नवाब मुजाहिद हसन खां को लेकर इमरान मसूद का वह बयान, जिसने बरेली कैंट की राजनीति में हलचल पैदा कर दी। जब पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा के दौरान एक कार्यकर्ता ने बरेली कैंट सीट से नवाब मुजाहिद हसन खां को उम्मीदवार बनाए जाने की बात कही तो इमरान मसूद ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं तो बस नवाब साहब का एडवोकेट हूं।”
राजनीति में शब्द अक्सर सीधे नहीं बोले जाते, लेकिन उनके मायने बहुत गहरे होते हैं। इमरान मसूद का यह बयान भी सिर्फ एक औपचारिक समर्थन नहीं था। यह दरअसल कांग्रेस हाईकमान तक एक मजबूत राजनीतिक संदेश पहुंचाने की कोशिश थी कि यदि समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन होता है तो बरेली कैंट विधानसभा सीट पर कांग्रेस अपनी दावेदारी पूरी ताकत के साथ पेश करेगी और उसके चेहरे के रूप में नवाब मुजाहिद हसन खां सबसे मजबूत विकल्प हो सकते हैं।
दरअसल, बरेली कैंट विधानसभा सीट लंबे समय से भाजपा का मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। यहां भाजपा का संगठनात्मक ढांचा मजबूत है और हिंदू वोटों का बड़ा ध्रुवीकरण भी देखने को मिलता रहा है। लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ही इस सीट को भविष्य की राजनीति के लिहाज से बेहद अहम मानती हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यहां का मुस्लिम वोट बैंक और शहरी राजनीतिक समीकरण हैं। यहां एक लाख 13 हजार मुस्लिम मतदाता हैं और वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में इस सीट से सपा-कांग्रेस गठबंधन के उम्मीदवार रहे नवाब मुजाहिद हसन खां ने भाजपा उम्मीदवार को कड़ी टक्कर दी थी। नवाब खानदान से होने के नाते मुजाहिद हसन खां का रसूख इस सीट पर अन्य किसी भी मुस्लिम नेता से कहीं अधिक माना जाता है। यही कारण है कि कांग्रेस अब इस सीट पर अपनी जमीन फिर से तैयार करने में जुटती दिखाई दे रही है।
इमरान मसूद का नवाब मुजाहिद हसन खां के आवास पर जाकर पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ लंबा मंथन करना भी राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कांग्रेस अच्छी तरह समझती है कि यदि उसे उत्तर प्रदेश में फिर से राजनीतिक पुनर्जीवन हासिल करना है तो उसे स्थानीय स्तर पर मजबूत और प्रभावशाली चेहरों को आगे लाना होगा। बरेली कैंट सीट पर नवाब मुजाहिद हसन खां ऐसा ही चेहरा माने जाते हैं।
नवाब मुजाहिद हसन खां का राजनीतिक अनुभव, मुस्लिम और हिन्दू दाेनों ही समाज में उनकी पकड़ और कांग्रेस संगठन में उनकी स्वीकार्यता उन्हें बाकी दावेदारों से अलग बनाती है। वर्ष 2017 में जब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन हुआ था तब भी वह संयुक्त प्रत्याशी रहे थे। हालांकि चुनावी जीत उन्हें नहीं मिल सकी, लेकिन उन्होंने गठबंधन के वोट बैंक को एकजुट रखने में अहम भूमिका निभाई थी। अब जब एक बार फिर 2027 में सपा-कांग्रेस गठबंधन की संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो रही है तो कांग्रेस कैंट सीट को लेकर पहले से ही अपनी रणनीति तैयार करती दिखाई दे रही है।
इमरान मसूद के बयान का दूसरा बड़ा राजनीतिक अर्थ समाजवादी पार्टी के लिए संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने जिस तरह कहा कि “यादव जी आप झंडा लेकर आगे चलो, हम तो आपके साथ हैं ही”, उसे राजनीतिक गलियारों में सीधे तौर पर अखिलेश यादव को दिए गए संकेत के रूप में देखा जा रहा है। कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि वह गठबंधन धर्म निभाने को तैयार है, लेकिन बदले में उसे भी सम्मानजनक हिस्सेदारी चाहिए होगी।
असल में कांग्रेस अब सिर्फ गठबंधन में “सहयोगी दल” बनकर नहीं रहना चाहती। लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी के भीतर यह आत्मविश्वास बढ़ा है कि यदि सही रणनीति और मजबूत स्थानीय चेहरों के साथ मैदान में उतरा जाए तो उत्तर प्रदेश में उसका जनाधार दोबारा खड़ा किया जा सकता है। यही कारण है कि अब कांग्रेस उन सीटों की पहचान कर रही है जहां वह समाजवादी पार्टी के साथ सीट बंटवारे में मजबूत दावेदारी पेश कर सके।
बरेली कैंट सीट को लेकर कांग्रेस की रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में यहां समाजवादी पार्टी के कई मुस्लिम दावेदार सक्रिय हो चुके हैं। लेकिन इमरान मसूद के बयान ने साफ संकेत दे दिया है कि यदि गठबंधन हुआ तो कांग्रेस इस सीट को आसानी से छोड़ने के मूड में नहीं है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नवाब मुजाहिद हसन खां को लेकर कांग्रेस जिस तरह खुलकर सामने आ रही है, उससे सपा के भीतर टिकट की उम्मीद लगाए बैठे कई नेताओं की बेचैनी बढ़ना तय है।

दरअसल, नवाब मुजाहिद हसन खां की सबसे बड़ी ताकत उनकी राजनीतिक सक्रियता से ज्यादा उनकी “सियासी खामोशी” मानी जा रही है। पिछले कुछ समय से वह बेहद सीमित सार्वजनिक बयान दे रहे हैं, लेकिन राजनीतिक हलकों में लगातार सक्रिय बने हुए हैं। इमरान मसूद का उनके आवास पर जाकर बैठक करना और खुलकर समर्थन देना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पर्दे के पीछे कांग्रेस बरेली कैंट सीट को लेकर गंभीर रणनीति तैयार कर चुकी है।
इमरान मसूद ने अपनी प्रेस वार्ता में भाजपा और केंद्र सरकार पर तीखे हमले भी किए। उन्होंने कहा कि यदि देश में कांग्रेस मजबूत नहीं होगी तो समाज का कमजोर तबका सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। उन्होंने मुसलमानों को भी राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की। उनका बयान कि “अगर कांग्रेस की सरकार नहीं होगी तो अब्दुल पीटा जाएगा” राजनीतिक रूप से काफी चर्चा में रहा। हालांकि इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ भाजपा को हराने की राजनीति से काम नहीं चलेगा, बल्कि विपक्षी एकता और मजबूत रणनीति जरूरी है।
इमरान मसूद का यह बयान केवल भावनात्मक अपील नहीं था, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश भी माना जा रहा है। कांग्रेस समझती है कि यदि उसे उत्तर प्रदेश में दोबारा मजबूत होना है तो उसे मुस्लिम वोटों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी, जो पिछले कई वर्षों से समाजवादी पार्टी की तरफ झुका हुआ है। ऐसे में बरेली कैंट जैसी सीटों पर मजबूत मुस्लिम चेहरों को आगे लाना कांग्रेस की रणनीति का अहम हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इमरान मसूद का बरेली, आंवला और सिरौली दौरा भी बेहद सोच-समझकर तय किया गया था। ये तीनों इलाके राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील माने जाते हैं और यहां मुस्लिम, दलित तथा पिछड़े वर्गों का प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। कांग्रेस अब इन इलाकों में अपने पुराने संगठन को दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रही है।
बरेली कैंट सीट की बात करें तो यहां भाजपा की मजबूत पकड़ के बावजूद विपक्ष लगातार संभावनाएं तलाशता रहा है। लेकिन विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या आपसी बिखराव रही। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी यदि एकजुट होकर चुनाव लड़ती हैं तो यह सीट अचानक बेहद रोचक हो सकती है। यही कारण है कि कांग्रेस अभी से यहां राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुट गई है।
इमरान मसूद का “मैं तो नवाब साहब का एडवोकेट हूं” वाला बयान अब सिर्फ एक बयान नहीं रह गया है। इसे कांग्रेस की भविष्य की रणनीति का शुरुआती ऐलान माना जा रहा है। यह संदेश भी साफ है कि कांग्रेस अब उत्तर प्रदेश में सिर्फ प्रतीकात्मक राजनीति नहीं करना चाहती, बल्कि सीटों की लड़ाई में आक्रामक भूमिका निभाने के मूड में है।
बरेली की राजनीति में अब यह चर्चा तेज हो चुकी है कि आने वाले समय में कैंट विधानसभा सीट गठबंधन की राजनीति का बड़ा केंद्र बन सकती है। एक तरफ जहां नवाब मुजाहिद हसन खां कांग्रेस का मजबूत चेहरा बनकर आगे बढ़ सकते हैं, वहीं समाजवादी पार्टी के स्थानीय दावेदारों के सामने नई चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है।
फिलहाल इतना तय माना जा रहा है कि इमरान मसूद का यह दौरा सिर्फ संगठनात्मक बैठक नहीं था। यह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की नई राजनीतिक सक्रियता, मुस्लिम नेतृत्व को फिर से केंद्र में लाने की रणनीति और बरेली कैंट सीट पर मजबूत दावेदारी का खुला संकेत था। अब देखना यह होगा कि समाजवादी पार्टी इस संकेत को कैसे लेती है और आने वाले दिनों में बरेली कैंट की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।




