नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की फिजाओं में इन दिनों एक ऐसे बेटे की कामयाबी की चर्चा है, जिसने सिर्फ 12वीं की परीक्षा में 93 प्रतिशत अंक हासिल नहीं किए, बल्कि यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों तो हालात चाहे कितने भी कठिन क्यों न हों, मंजिल हासिल की जा सकती है। यह कहानी है समाजवादी पार्टी के शहर विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष हसीव खान के पुत्र नवील खान की, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए सीबीएसई 12वीं बोर्ड परीक्षा में शानदार सफलता प्राप्त कर न सिर्फ अपने परिवार बल्कि पूरे शहर का नाम रोशन कर दिया। उनका परीक्षा परिणाम बुधवार दोपहर को घोषित हुआ है।
नवील खान की यह उपलब्धि सिर्फ अंकों की कहानी नहीं है। यह संघर्ष, उम्मीद, भरोसे, इंसानियत और कभी हार न मानने वाले जज्बे की कहानी है। यह कहानी उन लाखों विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा है, जो मुश्किल हालात देखकर टूट जाते हैं या अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं। नवील ने साबित किया कि अगर मन में कुछ कर गुजरने की आग हो, तो रास्ते खुद बन जाते हैं।
नवील खान वैसे तो शहर के प्रतिष्ठित सेक्रेड हार्ट स्कूल के मेधावी छात्रों में गिने जाते हैं। पढ़ाई में हमेशा आगे रहने वाले नवील के लिए 12वीं का साल बेहद महत्वपूर्ण था। साइंस स्ट्रीम में फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स जैसे कठिन विषयों के साथ बोर्ड परीक्षा की तैयारी करना किसी भी छात्र के लिए आसान नहीं होता। लेकिन नवील के सामने सिर्फ पढ़ाई की चुनौती नहीं थी, बल्कि हालातों की एक ऐसी दीवार खड़ी हो गई थी, जिसने उनके सपनों को लगभग रोक ही दिया था।
दीपावली के आसपास परिस्थितियां अचानक ऐसी बनीं कि नवील लगातार तीन से चार महीने तक स्कूल नहीं जा सके। जिस समय दूसरे छात्र स्कूलों में नियमित क्लास कर रहे थे, टीचर्स से पढ़ रहे थे और बोर्ड परीक्षा की रणनीति बना रहे थे, उस समय नवील घर की चारदीवारी में संघर्ष कर रहे थे।
यह दौर किसी भी छात्र को मानसिक रूप से तोड़ सकता था। एक समय ऐसा भी आया जब परिवार और करीबी लोगों को यह लगने लगा कि शायद नवील इस बार बोर्ड परीक्षा में बैठ ही नहीं पाएंगे। सपने बिखरते हुए नजर आने लगे थे। लेकिन कहते हैं कि असली योद्धा वही होता है, जो अंधेरे समय में भी उम्मीद का दिया जलाए रखे। नवील ने वही किया।
जब हालातों ने स्कूल जाने का रास्ता रोक दिया, तब नवील ने पढ़ाई छोड़ने के बजाय अपने घर को ही स्कूल बना लिया। उन्होंने ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह अपने सपनों से समझौता नहीं करेंगे।
दिन-रात किताबों के बीच बिताने लगे। जहां दूसरे छात्र कोचिंग और क्लासरूम के सहारे पढ़ रहे थे, वहीं नवील अकेले अपने दम पर तैयारी कर रहे थे। कई बार परिस्थितियां इंसान को कमजोर बना देती हैं, लेकिन नवील ने उन्हीं परिस्थितियों को अपनी ताकत बना लिया।
कहते हैं कि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती। नवील की अथक मेहनत, अनुशासन और मजबूत इरादों का परिणाम तब सामने आया जब सीबीएसई 12वीं बोर्ड परीक्षा का रिजल्ट घोषित हुआ। नवील खान ने 93 प्रतिशत अंक प्राप्त कर सबको चौंका दिया।
यह सिर्फ एक रिजल्ट नहीं था, बल्कि उन सभी आशंकाओं पर जीत थी, जो कुछ महीने पहले उनके भविष्य को लेकर जताई जा रही थीं। यह उन परिस्थितियों पर जीत थी, जिन्होंने उनके रास्ते में रुकावटें खड़ी की थीं। यह उस संघर्ष की जीत थी, जिसे शब्दों में पूरी तरह बयां करना आसान नहीं है।

आज के दौर में 90 प्रतिशत से अधिक अंक हासिल करना आसान नहीं माना जाता। लाखों छात्र लगातार स्कूल और कोचिंग जाने के बावजूद इस लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते। लेकिन नवील ने यह मुकाम तब हासिल किया, जब वह महीनों तक स्कूल ही नहीं जा सके।
यही बात उनकी सफलता को और खास बना देती है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि सफलता सिर्फ सुविधाओं की मोहताज नहीं होती, बल्कि वह मेहनत, धैर्य और आत्मविश्वास से हासिल की जाती है।
उनकी कहानी उन बच्चों के लिए भी एक बड़ा संदेश है, जो छोटी-छोटी परेशानियों से घबराकर हार मान लेते हैं। नवील की सफलता बता रही है कि मुश्किल वक्त इंसान को रोकने नहीं, बल्कि उसे मजबूत बनाने आता है।
नवील खान की इस सफलता की कहानी में एक और नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जा रहा है और वह नाम है समाजवादी पार्टी के महानगर महासचिव पंडित दीपक शर्मा का।
जब परिस्थितियां बेहद कठिन थीं और ऐसा लगने लगा था कि नवील शायद बोर्ड परीक्षा में शामिल नहीं हो पाएंगे, तब पंडित दीपक शर्मा ने आगे बढ़कर इंसानियत का हाथ थामा। उन्होंने धर्म और जाति की दीवारों को तोड़ते हुए एक परिवार के संघर्ष को अपना संघर्ष समझा।
आज जब समाज में अक्सर धर्म और जाति के नाम पर विभाजन की बातें होती हैं, ऐसे समय में पंडित दीपक शर्मा ने यह साबित किया कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। उनके सहयोग और प्रयासों ने न सिर्फ नवील को परीक्षा में बैठने का अवसर दिलाया, बल्कि एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी भी लिख दी, जो लंबे समय तक लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी।

लोग कह रहे हैं कि अगर उस मुश्किल समय में दीपक शर्मा साथ न खड़े होते, तो शायद यह सफलता की कहानी आज इस रूप में सामने न आती। यही वजह है कि नवील की उपलब्धि के साथ-साथ इंसानियत की यह मिसाल भी पूरे शहर में चर्चा का विषय बनी हुई है।
आज नवील खान के घर में खुशियों का माहौल है। जिस घर में कुछ महीने पहले चिंता और अनिश्चितता का माहौल था, वहां अब बधाइयों का सिलसिला लगातार जारी है।

पिता हसीव खान अपने बेटे की इस उपलब्धि से बेहद भावुक हैं। बेटे की मेहनत और संघर्ष को करीब से देखने वाले हसीव खान का सीना गर्व से चौड़ा हो गया है। एक पिता के लिए इससे बड़ी खुशी क्या हो सकती है कि उसका बेटा कठिन परिस्थितियों में भी हार न माने और अपने दम पर एक नई मिसाल कायम कर दे।
परिवार के लोगों का कहना है कि नवील ने सिर्फ अच्छे अंक नहीं लाए, बल्कि यह साबित कर दिया कि सच्ची लगन और मेहनत से हर मुश्किल को हराया जा सकता है।
नवील खान की इस उपलब्धि की चर्चा अब सिर्फ उनके परिवार या स्कूल तक सीमित नहीं रही। शहर के राजनीतिक और सामाजिक जगत के तमाम लोगों ने उन्हें बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।
समाजवादी पार्टी के महानगर महासचिव पंडित दीपक शर्मा, सपा महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी, पूर्व विधानसभा प्रत्याशी राजेश अग्रवाल, वरिष्ठ कांग्रेस नेता नवाब मुजाहिद हसन खां, भाजपा नेता और पूर्व उपसभापति अतुल कपूर, पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर, वरिष्ठ पार्षद और भाजपा नेता सतीश चंद्र सक्सेना कातिब उर्फ मम्मा, पार्षद शमीम अहमद तथा सर्व जन आम पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश भास्कर समेत कई नेताओं और समाजसेवियों ने नवील को शुभकामनाएं दीं।
आला हजरत की नगरी बरेली हमेशा अपनी गंगा-जमुनी तहजीब के लिए जानी जाती रही है। नवील खान की सफलता ने एक बार फिर इस तहजीब को मजबूत करने का काम किया है।
एक मुस्लिम छात्र के संघर्ष में एक हिंदू नेता का साथ देना और फिर पूरे समाज का उस सफलता का जश्न मनाना, यह तस्वीर बताती है कि इंसानियत आज भी जिंदा है। यही वजह है कि लोग नवील खान की कहानी को सिर्फ एक छात्र की सफलता नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और मानवीय मूल्यों की मिसाल के रूप में देख रहे हैं।
नवील की कहानी यह संदेश देती है कि सपने किसी धर्म, जाति या परिस्थितियों के मोहताज नहीं होते। अगर मेहनत सच्ची हो और साथ देने वाले लोग मिल जाएं, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं रहती।
आज जब बड़ी संख्या में युवा तनाव, असफलता और निराशा से जूझ रहे हैं, ऐसे समय में नवील खान की कहानी उम्मीद की नई रोशनी बनकर सामने आई है।
उन्होंने यह साबित कर दिया कि जिंदगी में मुश्किल वक्त स्थायी नहीं होता। अगर इंसान धैर्य और मेहनत के साथ आगे बढ़ता रहे, तो एक दिन सफलता जरूर उसके कदम चूमती है।
नवील की यह उपलब्धि आने वाले वर्षों में उन छात्रों के लिए प्रेरणा बनेगी, जो किसी न किसी वजह से खुद को कमजोर महसूस करते हैं। उनकी कहानी यह सिखाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर इरादे मजबूत हों तो हार को भी जीत में बदला जा सकता है।
नवील खान का संघर्ष सुनने में भले किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता हो, लेकिन यह हकीकत है। यह उस युवा की कहानी है, जिसने हालातों के आगे झुकने से इनकार कर दिया। यह उस पिता की कहानी है, जिसने मुश्किल समय में भी बेटे का हौसला बनाए रखा। यह उस इंसानियत की कहानी है, जिसने धर्म और जाति से ऊपर उठकर एक बच्चे के भविष्य को संवारने में मदद की।
आज नवील खान सिर्फ एक छात्र नहीं, बल्कि संघर्ष और सफलता का प्रतीक बन चुके हैं। उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाती रहेगी कि मेहनत, लगन और इंसानियत मिल जाएं तो कोई भी मुश्किल इंसान के रास्ते को रोक नहीं सकती।




