नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली की कैंट विधानसभा सीट इस समय सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीतिक दिशा का प्रतीक बनती जा रही है। यहां चुनावी लड़ाई अब केवल भाजपा बनाम समाजवादी पार्टी नहीं रह गई है, बल्कि यह लड़ाई पूरी तरह सामाजिक समीकरणों, वोटों के अनुपात, उम्मीदवार की छवि और हिन्दू-मुस्लिम संतुलन के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है।
10 अप्रैल को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची ने इस सीट की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि आने वाला चुनाव सिर्फ नारों और सभाओं से नहीं, बल्कि बेहद बारीक सामाजिक गणित से तय होगा। यही वजह है कि इस सीट पर अब सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि समाजवादी पार्टी आखिर किस पर दांव लगाएगी — मुस्लिम उम्मीदवार पर या हिन्दू चेहरे पर।
अंतिम मतदाता सूची के अनुसार बरेली कैंट विधानसभा सीट पर करीब 2 लाख 85 हजार मतदाता हैं। इनमें लगभग 1 लाख 13 हजार मुस्लिम मतदाता हैं, जबकि हिन्दू मतदाताओं की संख्या लगभग 1 लाख 70 हजार 500 बताई जा रही है। यानी साफ तौर पर हिन्दू मतदाता यहां निर्णायक स्थिति में हैं।
अगर प्रतिशत के हिसाब से देखें तो लगभग 40 प्रतिशत मुस्लिम और 60 प्रतिशत हिन्दू मतदाता हैं। यही आंकड़ा इस सीट को बेहद संवेदनशील और रणनीतिक बनाता है।
पहले एसआईआर प्रक्रिया के दौरान करीब 1 लाख 35 हजार वोट कटे थे। बाद में लगभग 40 हजार वोट दोबारा जोड़ दिए गए। इसके बावजूद पुरानी सूची की तुलना में अभी भी करीब 95 हजार वोट कम हैं। अब भाजपा तेजी से नए वोट बनवाने के अभियान में जुटी हुई है।
सूत्रों के मुताबिक अकेले कैंट विधानसभा सीट पर भाजपा ने 10 से 15 हजार नए हिन्दू वोट जोड़ने का लक्ष्य तय किया है। यदि यह लक्ष्य पूरा हो गया तो हिन्दू मतदाताओं का आंकड़ा लगभग 1 लाख 85 हजार तक पहुंच सकता है। दूसरी ओर मुस्लिम वोटों में केवल 2 से 4 हजार तक की बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है।
यानी चुनाव आते-आते दोनों समुदायों के बीच का अंतर और ज्यादा बढ़ सकता है। यही वह बिंदु है जहां समाजवादी पार्टी की रणनीति सबसे बड़ी परीक्षा में खड़ी दिखाई दे रही है।
समाजवादी पार्टी की परंपरागत राजनीति मुस्लिम-यादव समीकरण पर आधारित मानी जाती रही है। लेकिन बरेली कैंट की वर्तमान परिस्थितियां यह संकेत दे रही हैं कि केवल मुस्लिम वोटों के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं होगा।
सपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर वह मुस्लिम उम्मीदवार उतारती है तो क्या हिन्दू मतदाता उससे और दूर चले जाएंगे?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में बरेली में जिस तरह कुछ मुस्लिम समुदाय से जुड़े अपराधियों के नाम सामने आए, उससे हिन्दू समाज के एक हिस्से में डर और असुरक्षा की भावना बनी है। भाजपा लगातार इसी मनोविज्ञान पर काम करती नजर आती है।
हिन्दुओं के बीच यह धारणा आज भी मौजूद है कि अगर सपा की सरकार आती है तो आपराधिक छवि वाले मुस्लिम तत्वों को राजनीतिक संरक्षण मिल सकता है। यही डर भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बनता दिखाई दे रहा है।
यही कारण है कि अगर सपा मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारती है तो भाजपा को हिन्दू ध्रुवीकरण कराने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। चुनाव का पूरा नैरेटिव “हिन्दू बनाम मुस्लिम” की दिशा में जा सकता है और इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलता नजर आ सकता है।

हालांकि यह भी सच है कि बरेली में कई मुस्लिम नेताओं ने अपनी राजनीति केवल मुस्लिम समाज तक सीमित नहीं रखी।
डॉक्टर अनीस बेग और इंजीनियर अनीस अहमद खां जैसे नेताओं ने लगातार हिन्दू समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश की है। दोनों नेताओं के पास बड़ी संख्या में हिन्दू समर्थक भी बताए जाते हैं। सामाजिक कार्यक्रमों से लेकर जनसंपर्क तक, उन्होंने खुद को सर्वसमाज का नेता साबित करने का प्रयास किया है।
लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में मुस्लिम उम्मीदवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि उसे हर कदम पर यह साबित करना पड़ेगा कि वह हिन्दू विरोधी नहीं है।


उसे लगातार यह संदेश देना होगा कि उसकी राजनीति केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं है। यानी मुस्लिम उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से पहले ही एक तरह की “अग्निपरीक्षा” से गुजरना पड़ेगा।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आज के माहौल में मुस्लिम चेहरे को हिन्दू वोट हासिल करने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ेगी, जबकि हिन्दू उम्मीदवार को इस तरह की सफाई देने की आवश्यकता नहीं होगी। यही कारण है कि अब सपा के भीतर हिन्दू उम्मीदवार के विकल्प पर गंभीर चर्चा मानी जा रही है।

राजेश अग्रवाल और संजीव सक्सेना जैसे नेताओं के नाम इस संदर्भ में तेजी से चर्चा में हैं। दोनों नेताओं की छवि अपेक्षाकृत साफ-सुथरी मानी जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि उन्हें हिन्दू समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता साबित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अगर ऐसा कोई चेहरा सपा के टिकट पर मैदान में उतरता है तो उसके सामने सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि वह हिन्दू मतदाताओं के एक हिस्से को सहज तरीके से आकर्षित कर सकता है। उसे यह साबित करने में ऊर्जा खर्च नहीं करनी पड़ेगी कि वह हिन्दू विरोधी नहीं है। वहीं मुस्लिम वोटों के बंटने की संभावना भी बेहद कम मानी जा रही है।

राजनीतिक गलियारों में यह धारणा मजबूत है कि मुस्लिम मतदाता इस समय भाजपा को हराने के उद्देश्य से सबसे मजबूत उम्मीदवार के पक्ष में एकजुट हो सकते हैं। यानी यदि सपा किसी हिन्दू उम्मीदवार को टिकट देती है तो मुस्लिम वोट उसके साथ जाने की पूरी संभावना बनी रहेगी, बशर्ते उम्मीदवार भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में दिखाई दे।
सपा के रणनीतिकारों के बीच एक बड़ी सोच यह भी मानी जा रही है कि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के लिए अलग से मुस्लिम उम्मीदवार जरूरी नहीं है। सपा प्रमुख Akhilesh Yadav का चेहरा ही मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करने के लिए काफी माना जा रहा है। वर्तमान समय में मुस्लिम समाज का प्राथमिक लक्ष्य भाजपा को रोकना है। यही कारण है कि मुस्लिम वोटों के बड़े पैमाने पर बंटने की संभावना बहुत कम दिखाई देती है। अगर सपा मजबूत स्थिति में दिखती है तो मुस्लिम मतदाता रणनीतिक मतदान कर सकते हैं। ऐसे में हिन्दू उम्मीदवार होने के बावजूद सपा को मुस्लिम वोट मिलने में कोई बड़ी समस्या नहीं आ सकती।
बरेली कैंट सीट का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि यहां चुनाव अब केवल कोर वोट बैंक का नहीं, बल्कि अतिरिक्त 10 प्रतिशत वोटों का खेल बन चुका है। अगर मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा सपा के साथ जाता है और हिन्दू वोट भाजपा के साथ रहते हैं, तब भी चुनाव का फैसला उन हिन्दू वोटों से होगा जो भाजपा से नाराज हैं या स्थानीय उम्मीदवार के आधार पर वोट करते हैं।यानी जो उम्मीदवार हिन्दू मतदाताओं के अतिरिक्त 8 से 10 प्रतिशत हिस्से को अपने पक्ष में खींच लेगा, वही चुनाव की बाजी मार सकता है। क्योंकि दो से चार प्रतिशत वोट अन्य दलों, निर्दलीयों और नोटा में भी चले जाएंगे। ऐसे में जीत का अंतर बहुत बड़ा नहीं रहने वाला। यही वजह है कि उम्मीदवार की छवि, उसका व्यवहार, उसकी सामाजिक स्वीकार्यता और स्थानीय नेटवर्क इस चुनाव में सबसे निर्णायक कारक बनने जा रहे हैं।
भाजपा इस समय पूरी ताकत से हिन्दू वोट बढ़ाने में जुटी हुई दिखाई दे रही है। वोटर लिस्ट में नए हिन्दू वोट जोड़ने का अभियान सिर्फ संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आने वाले चुनाव की सबसे बड़ी तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा की रणनीति साफ नजर आती है — जितना ज्यादा हिन्दू वोट प्रतिशत बढ़ेगा, उतना ही विपक्ष के लिए समीकरण मुश्किल होगा।
अगर हिन्दू मतदाताओं की संख्या 1 लाख 85 हजार तक पहुंच जाती है और मुस्लिम वोट लगभग 1 लाख 15 हजार के आसपास रहते हैं, तो सपा को जीतने के लिए हिन्दू वोटों में बड़ी सेंध लगानी ही पड़ेगी। यानी केवल मुस्लिम वोटों के भरोसे चुनाव जीतना लगभग असंभव जैसा हो जाएगा।
समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह भावनात्मक निर्णय लेती है या व्यावहारिक।
अगर पार्टी केवल पारंपरिक समीकरण देखकर मुस्लिम उम्मीदवार उतारती है और हिन्दू मतदाताओं में गलत संदेश चला जाता है, तो भाजपा को बड़ा फायदा मिल सकता है।
लेकिन अगर सपा सामाजिक संतुलन और वर्तमान माहौल को ध्यान में रखते हुए ऐसा उम्मीदवार चुनती है जिसकी हिन्दू समाज में स्वीकार्यता हो और जिसे मुस्लिम वोट भी आसानी से मिल जाएं, तो मुकाबला बेहद रोचक हो सकता है।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बरेली कैंट सीट पर इस बार पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार का चेहरा चुनाव जिताएगा या हराएगा।
यानी यह चुनाव विचारधारा से ज्यादा “विश्वास” का चुनाव बनने जा रहा है। हिन्दू मतदाता यह देखेगा कि कौन उम्मीदवार उसके हितों और सुरक्षा को लेकर भरोसेमंद लगता है, जबकि मुस्लिम मतदाता यह देखेगा कि कौन भाजपा को हराने की सबसे मजबूत स्थिति में है।
फिलहाल बरेली कैंट सीट पर सियासी हलचल लगातार तेज होती जा रही है। टिकट को लेकर चर्चाएं बढ़ रही हैं। हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों में राजनीतिक बैठकों का दौर जारी है।
भाजपा अपने संगठनात्मक नेटवर्क और वोट बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है, जबकि समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सही उम्मीदवार चुनने की है।
इतना तय माना जा रहा है कि अगर सपा ने समझदारी दिखाई तो यह सीट उसके लिए बड़ा अवसर बन सकती है। लेकिन अगर उम्मीदवार चयन में छोटी सी भी रणनीतिक चूक हुई तो वही चूक उसकी हार की सबसे बड़ी वजह बन सकती है।
बरेली कैंट की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां जाति, धर्म, छवि, डर, भरोसा और गणित — सब एक साथ काम कर रहे हैं। आने वाले चुनाव में यह सीट सिर्फ विधायक नहीं चुनेगी, बल्कि यह भी तय करेगी कि बदलते उत्तर प्रदेश में राजनीति अब किस दिशा में आगे बढ़ रही है।




