नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली कैंट विधानसभा सीट की सियासत को सिर्फ पिछले दो-तीन चुनावों के आंकड़ों से समझना मुश्किल है। इस सीट की राजनीतिक कहानी कहीं ज्यादा पुरानी है और इसका सबसे बड़ा मोड़ परिसीमन के बाद आया। कभी जिस कैंट विधानसभा सीट पर मुस्लिम राजनीतिक परिवारों का प्रभाव चुनावी नतीजों में साफ दिखाई देता था, परिसीमन के बाद उसी सीट का सामाजिक और भौगोलिक समीकरण इस तरह बदला कि चुनावी राजनीति की दिशा ही बदल गई। 2008 के परिसीमन आदेश के बाद नई सीमाओं के आधार पर 2012 में चुनाव हुआ और उसके बाद के तीन विधानसभा चुनावों के नतीजे इस बदलाव की तस्वीर सामने रखते हैं।
लेकिन इस कहानी को समझने के लिए सबसे पहले उस दौर में जाना होगा जब बरेली कैंट सीट पर साबिर परिवार का दबदबा हुआ करता था। अशफाक अहमद, इस्लाम साबिर और फिर शहजिल इस्लाम—एक ही राजनीतिक परिवार की तीन पीढ़ियों का कैंट की राजनीति से जुड़ाव रहा। उपलब्ध राजनीतिक रिकॉर्ड और प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक अशफाक अहमद ने कैंट से कई बार विधायक के रूप में प्रतिनिधित्व किया, उनके बाद उनके बेटे इस्लाम साबिर विधायक बने और फिर शहजिल इस्लाम ने भी कैंट से अपनी राजनीतिक पारी शुरू की।
यही वह राजनीतिक विरासत थी जिसने लंबे समय तक कैंट को साबिर परिवार के प्रभाव वाले क्षेत्र के रूप में पहचान दी। लेकिन परिसीमन के बाद विधानसभा की भौगोलिक सीमा और उसके साथ सामाजिक समीकरण बदले। 2008 के परिसीमन के बाद बरेली कैंट की नई संरचना अस्तित्व में आई और 2012 का चुनाव इसी नई व्यवस्था में हुआ।
2012 में पहली बड़ी तस्वीर सामने आई। भाजपा के राजेश अग्रवाल को 51,893 वोट मिले, जबकि सपा के फहीम साबिर अंसारी को 32,944 वोट मिले। भाजपा की जीत का अंतर 18,949 वोट रहा। यानी परिसीमन के बाद हुए पहले विधानसभा चुनाव में ही मुस्लिम प्रत्याशी के सामने भाजपा उम्मीदवार ने बड़ा अंतर कायम कर दिया। परिसीमन के बाद पहला विधानसभा चुनाव जब हुआ तो तत्कालीन मेयर सुप्रिया ऐरन को इस सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। उस वक्त उनके पति प्रवीण सिंह ऐरन सांसद थे लेकिन सुप्रिया की उम्मीदों पर पानी फिर गया और उन्हें चौथे नंबर से ही संतोष करना पड़ा था।

इसके बाद 2017 में तस्वीर और स्पष्ट हुई। भाजपा के राजेश अग्रवाल को 88,441 वोट मिले और कांग्रेस के मुजाहिद हसन खान को 75,777 वोट। इस बार भी भाजपा ने 12,664 वोट के अंतर से जीत दर्ज की। 2022 में भाजपा ने प्रत्याशी बदला और संजीव अग्रवाल मैदान में आए। उन्होंने 98,931 वोट हासिल किए, जबकि सपा की सुप्रिया ऐरन को 88,163 वोट मिले। जीत का अंतर 10,768 वोट रहा।

यानी 2012, 2017 और 2022—तीनों चुनावों में कैंट सीट भाजपा के खाते में गई। तीनों चुनावों में भाजपा उम्मीदवार और दूसरे स्थान पर रहे उम्मीदवार के बीच उल्लेखनीय अंतर रहा। यह आंकड़ा अपने आप में इस बात का संकेत है कि परिसीमन के बाद कैंट का चुनावी भूगोल पहले जैसा नहीं रहा।
और यहीं साबिर परिवार की कहानी भी कैंट से निकलकर भोजीपुरा की ओर जाती दिखाई देती है। शहजिल इस्लाम 2002 में कैंट से निर्दलीय विधायक बने थे और 2007 में भी उन्होंने चुनावी राजनीति में सफलता हासिल की, लेकिन 2007 में बसपा ने उन्हें कैंट के बजाय भोजीपुरा से मैदान में उतारा। 2012 में उन्होंने भोजीपुरा से आईएमसी के टिकट पर चुनाव जीता और बाद में सपा में शामिल हुए। 2022 में वह भोजीपुरा से सपा विधायक बने।
इस राजनीतिक यात्रा को केवल टिकट बदलने की सामान्य कहानी मानना कैंट की बदलती राजनीति को अधूरा पढ़ना होगा। साबिर परिवार की राजनीति लंबे समय से कैंट से जुड़ी रही थी, लेकिन बदलते परिसीमन और नए सामाजिक समीकरणों के बाद परिवार की चुनावी राजनीति का केंद्र भोजीपुरा बन गया। राजनीतिक हलकों में इसकी एक व्याख्या यह भी रही कि परिसीमन के बाद कैंट से ऐसे कई इलाके बाहर हो गए जिनमें मुस्लिम आबादी का प्रभाव अधिक था और नई कैंट सीट में हिन्दू मतदाताओं का अनुपात निर्णायक रूप से बढ़ गया।

शहजिल इस्लाम और उनके परिवार को लेकर प्रकाशित रिपोर्टों में भी कैंट और भोजीपुरा दोनों सीटों पर अंसारी मुस्लिम मतदाताओं के प्रभाव का उल्लेख मिलता रहा है।
अब सवाल यह है कि करीब डेढ़ दशक बाद कैंट की जमीन कितनी बदली है?
मौजूदा समय में कैंट विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या करीब 2.93 लाख बताई जा रही है। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के बाद आधिकारिक रूप से कैंट में 2,83,524 मतदाता दर्ज किए गए थे। SIR से पहले यह संख्या 3,82,903 थी यानी पुनरीक्षण के दौरान करीब 99,379 नाम कम हुए।
इसके बाद पिछले कुछ महीनों में मतदाता सूची में करीब दस हजार नए नाम जुड़ने की बात राजनीतिक स्तर पर कही जा रही है। इसे भाजपा की ओर से तेजी से वोट बनवाने की कवायद के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि इन नए नामों का पार्टीवार संबंध आधिकारिक आंकड़ों से प्रमाणित नहीं है, इसलिए इसे राजनीतिक हलकों के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
मौजूदा राजनीतिक आकलनों में कैंट में करीब 1.15 लाख मुस्लिम मतदाता, लगभग 1.65 लाख हिन्दू मतदाता और शेष अन्य धर्मों के मतदाता बताए जा रहे हैं। अगर इन आंकड़ों को आधार माना जाए तो कैंट आज भी मुस्लिम बहुल नहीं, बल्कि हिन्दू बहुल विधानसभा क्षेत्र है। यही वह बुनियादी तथ्य है जिसे आगामी चुनाव की राजनीति में नजरअंदाज करना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होगा।
कैंट की मौजूदा मतदाता संरचना का एक और दिलचस्प पहलू SIR के दौरान सामने आया है। राजनीतिक हलकों में यह दावा किया जा रहा है कि ऐसे मुस्लिम परिवारों ने भी कैंट की मतदाता सूची में अपने नाम जुड़वाए हैं जो मूल रूप से कैंट क्षेत्र के रहने वाले हैं, लेकिन पिछले कई दशकों से मुंबई, कोलकाता, दिल्ली और देश के दूसरे शहरों के अलावा विदेशों में जाकर बस चुके हैं। इनके परिवारों की संख्या करीब तीन से पांच हजार बताई जा रही है।
इस दावे को एनआरसी और सीएए को लेकर पैदा हुई आशंकाओं से भी जोड़ा जा रहा है। यानी जिन परिवारों का मूल संबंध कैंट से है, उन्होंने अपने मतदाता अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए SIR के दौरान नाम दर्ज कराने की कोशिश की। हालांकि ऐसे मतदाताओं में से कितने वास्तव में विधानसभा चुनाव के दिन कैंट आकर मतदान करेंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषण में करीब 15 हजार मुस्लिम मतदाताओं के मतदान के लिए वापस नहीं आने की संभावना की चर्चा भी हो रही है। अगर ऐसा होता है तो राजनीतिक आकलन के स्तर पर मुस्लिम वोटों की वास्तविक मतदान संख्या करीब एक लाख के आसपास रह सकती है। लेकिन यह एक अनुमान है, अंतिम चुनावी मतदान का आंकड़ा नहीं।
यहीं से आगामी चुनाव के लिए सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या सिर्फ मुस्लिम मतदाताओं का एकजुट समर्थन किसी प्रत्याशी को कैंट में जीत दिलाने के लिए पर्याप्त होगा? पिछले तीन चुनावों के आंकड़े इस सवाल का सीधा जवाब नहीं देते, लेकिन इतना जरूर बताते हैं कि दूसरे स्थान पर रहने वाले प्रत्याशियों के सामने भी भाजपा ने उल्लेखनीय बढ़त कायम की है। 2012 में अंतर 18,949, 2017 में 12,664 और 2022 में 10,768 वोट रहा।
इसलिए सपा के सामने कैंट में सिर्फ प्रत्याशी का सवाल नहीं है, बल्कि सामाजिक आधार का सवाल भी है। अगर पार्टी किसी मुस्लिम चेहरे को मैदान में उतारती है तो उसके सामने गैर-मुस्लिम मतदाताओं में व्यापक समर्थन हासिल करने की चुनौती होगी। वहीं सिर्फ हिन्दू चेहरा उतार देना भी अपने आप में पर्याप्त नहीं होगा। चुनावी जमीन पर ऐसे उम्मीदवार की जरूरत होगी जिसकी राजनीतिक और सामाजिक मौजूदगी लंबे समय से दिखाई देती हो और जो केवल चुनावी मौसम में जनता के बीच दिखाई देने वाला चेहरा न हो।
कैंट की राजनीति का एक बड़ा फर्क यही है। यहां केवल जातीय या धार्मिक गणित से चुनावी तस्वीर पूरी नहीं होती। उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़, संगठन की ताकत, बूथ प्रबंधन, स्थानीय सामाजिक रिश्ते और लंबे समय से जनता के बीच मौजूदगी भी महत्वपूर्ण कारक बनते हैं।
2022 का चुनाव इसका उदाहरण भी रहा। भाजपा ने संजीव अग्रवाल को पहली बार विधानसभा चुनाव में उतारा था। उनके सामने सपा ने सुप्रिया ऐरन को प्रत्याशी बनाया, जो पहले कांग्रेस की उम्मीदवार घोषित हुई थीं और बाद में सपा में शामिल होकर उसी सीट से चुनाव लड़ीं। उस समय भाजपा के भीतर भी टिकट को लेकर राजनीतिक समीकरणों की चर्चा थी और संजीव अग्रवाल के सामने पार्टी के भीतर स्थापित चेहरों की विरासत तथा संगठनात्मक समीकरणों को साधने की चुनौती थी। इसके बावजूद उन्होंने 98,931 वोट हासिल कर 10,768 वोट से जीत दर्ज की।
आज स्थिति 2022 जैसी नहीं है। संजीव अग्रवाल के पास करीब साढ़े चार साल का विधायक के रूप में कार्यकाल है। यानी अब वह कैंट के मतदाताओं के लिए नए चेहरे नहीं हैं। 2022 में जिस प्रत्याशी को पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ना था, अब वही चेहरा अपने पिछले कार्यकाल, संगठनात्मक अनुभव और क्षेत्र में बनी राजनीतिक पहचान के साथ चुनाव मैदान में होगा।

इसका मतलब यह नहीं कि चुनाव का परिणाम पहले से तय है। लोकतांत्रिक चुनाव में मतदाता का फैसला अंतिम होता है और मौजूदा आंकड़े भविष्य के नतीजे की गारंटी नहीं देते। लेकिन इतना जरूर है कि कैंट को सिर्फ मुस्लिम मतदाताओं की संख्या देखकर पढ़ना राजनीतिक रूप से अधूरा विश्लेषण होगा।
दरअसल, कैंट की असली कहानी परिसीमन से पहले की राजनीतिक विरासत और परिसीमन के बाद बदले चुनावी भूगोल के बीच का अंतर है। जिस सीट पर साबिर परिवार की तीन पीढ़ियों ने राजनीतिक पहचान बनाई, उसी सीट पर 2012 के बाद लगातार तीन चुनावों में भाजपा ने जीत दर्ज की। दूसरी ओर साबिर परिवार की सक्रिय विधानसभा राजनीति का केंद्र भोजीपुरा बन गया, जहां शहजिल इस्लाम 2022 में सपा के टिकट पर विधायक बने और आज भी भोजीपुरा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

इसलिए 2027 की कैंट की लड़ाई को केवल ‘मुस्लिम बनाम हिन्दू’ के पुराने फ्रेम में देखना शायद पर्याप्त नहीं होगा। असली सवाल यह है कि क्या कोई विपक्षी उम्मीदवार मौजूदा मतदाता संरचना में धार्मिक पहचान से आगे जाकर पर्याप्त व्यापक सामाजिक समर्थन बना सकता है? क्या वह भाजपा के संगठनात्मक नेटवर्क का सामना करने के लिए बूथ स्तर पर वैसी ही मशीनरी खड़ी कर सकता है? और क्या उसके पास ऐसा व्यक्तिगत जनाधार है जो चुनावी मौसम के बाहर भी दिखाई देता हो?
कैंट कोई ऐसी सीट नहीं है जहां सिर्फ एक समीकरण जोड़कर चुनावी तस्वीर पढ़ी जा सके। 2012 से 2022 तक के नतीजे बताते हैं कि परिसीमन के बाद इस सीट की जमीन बदल चुकी है। अब 2027 के चुनाव में असली परीक्षा इस बात की होगी कि कौन सा राजनीतिक दल बदली हुई इस जमीन को सबसे बेहतर तरीके से पढ़ता है और कौन सा उम्मीदवार अपने सामाजिक आधार को विधानसभा के कुल मतदाताओं के व्यापक समर्थन में बदल पाता है।




