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इमरान मसूद की ताजपोशी के साथ ही बरेली कैंट विधानसभा सीट पर मजबूत हुए नवाब मुजाहिद हसन खां, सपा के टिकट के दावेदारों की उम्मीदों पर फिर सकता है पानी, शहर की जगह कैंट सीट पर दावा करने की तैयारी में कांग्रेस, नवाब मुजाहिद बोले- पूरी मजबूती से लड़ेंगे और जीतेंगे, पढ़ें कैसे बदल रही है बरेली की सियासत?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष पद पर लोकसभा सदस्य इमरान मसूद की ताजपोशी के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की रणनीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। इसका असर बरेली की राजनीति पर भी दिखाई देने लगा है। खासतौर पर बरेली कैंट विधानसभा सीट पर आने वाले दिनों में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की राजनीति का नया समीकरण बन सकता है। माना जा रहा है कि वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में यदि सपा और कांग्रेस का गठबंधन होता है तो कांग्रेस बरेली कैंट विधानसभा सीट पर अपना दावा मजबूती से पेश कर सकती है। ऐसा हुआ तो कैंट से टिकट की तैयारी कर रहे समाजवादी पार्टी के कई नेताओं की उम्मीदों को बड़ा झटका लग सकता है।
दरअसल, कांग्रेस के लिए कैंट सीट का अपना राजनीतिक महत्व है। वर्ष 2017 में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ था और बरेली की कैंट विधानसभा सीट कांग्रेस के खाते में गई थी। उस चुनाव में कांग्रेस ने नवाब मुजाहिद हसन खां को मैदान में उतारा था। वह भाजपा के मुकाबले करीब 12 हजार वोटों के अंतर से चुनाव हार गए थे। इसके बावजूद उन्होंने इस सीट पर कांग्रेस की मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई थी। यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर कैंट सीट को दोबारा अपने खाते में लेने की चर्चा तेज हो गई है।

इमरान मसूद से नजदीकी की वजह से मजबूत हुई दावेदारी

नवाब मुजाहिद हसन खां की दावेदारी को सबसे बड़ा सहारा इमरान मसूद की नजदीकी से मिलता दिखाई दे रहा है। इमरान मसूद जब पिछले दिनों बरेली दौरे पर आए थे, तब उन्होंने सार्वजनिक रूप से नवाब मुजाहिद हसन खां के टिकट की पैरवी करने की बात कही थी। उन्होंने खुद को नवाब मुजाहिद का वकील बताते हुए कहा था कि वह पार्टी नेतृत्व के सामने उनके टिकट के लिए अपनी बात रखेंगे।
इमरान मसूद ने यह भी संकेत दिया था कि कांग्रेस उन विधानसभा सीटों पर अपना दावा मजबूत तरीके से रख सकती है, जो वर्ष 2017 के सपा-कांग्रेस गठबंधन में कांग्रेस के हिस्से में आई थीं। बरेली कैंट भी इसी राजनीतिक समीकरण में शामिल रही है। ऐसे में अगर 2027 में एक बार फिर दोनों दलों के बीच सीटों का बंटवारा होता है तो कैंट सीट कांग्रेस के लिए स्वाभाविक दावेदारी वाली सीट बन सकती है।

शहर सीट पर सपा की सक्रियता सीमित

कांग्रेस के लिए बरेली शहर विधानसभा सीट की तुलना में कैंट पर दावा करना इसलिए भी आसान हो सकता है क्योंकि शहर सीट पर सपा की राजनीतिक सक्रियता फिलहाल सीमित नजर आ रही है। शहर सीट पर सपा के विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष हसीब खान को छोड़कर कोई बड़ा चेहरा खुलकर टिकट की तैयारी करता नजर नहीं आ रहा है।
हसीब खान ने जनवरी में पीडीए सम्मेलन आयोजित कर अपनी राजनीतिक सक्रियता जरूर दिखाई थी, लेकिन उसके बाद शहर विधानसभा क्षेत्र में ऐसा कोई बड़ा कार्यक्रम नहीं हुआ, जिससे अन्य दावेदारों की मजबूत मौजूदगी दिखाई दे। पिछले चुनाव में टिकट के लिए सक्रिय रहे मोहम्मद कलीमुद्दीन और अब्दुल कय्यूम खां उर्फ मुन्ना भी इस बार पहले की तरह सक्रिय नहीं दिखाई दे रहे हैं।
इसके विपरीत कैंट विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के कई संभावित दावेदार लगातार सक्रिय हैं। अलग-अलग स्तर पर पीडीए पंचायतें, सम्मेलन और दूसरे राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इससे साफ है कि सपा के भीतर कैंट सीट को लेकर टिकट की दौड़ काफी तेज है। ऐसे में यदि गठबंधन के तहत कांग्रेस इस सीट पर दावा करती है तो सपा के कई दावेदारों की राजनीतिक तैयारियों पर सीधा असर पड़ेगा।

बरेली कैंट में कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत हैं नवाब मुजाहिद

बरेली कैंट में कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत फिलहाल नवाब मुजाहिद हसन खां ही दिखाई देते हैं। वह लंबे समय से कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हैं और वर्ष 2017 में इसी सीट से चुनाव भी लड़ चुके हैं। इसके अलावा पिछले करीब डेढ़ साल से वह लगातार पार्टी नेतृत्व से संपर्क बनाए हुए हैं और दिल्ली के कई दौरे कर चुके हैं।
राजनीतिक तौर पर किसी विधानसभा सीट पर टिकट की दावेदारी सिर्फ संगठनात्मक पद या पार्टी के भीतर सक्रियता से तय नहीं होती। चुनावी जमीन, पिछले चुनाव का प्रदर्शन, पार्टी नेतृत्व से संबंध और क्षेत्र में पहचान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन सभी पहलुओं को देखें तो कैंट सीट पर मुजाहिद हसन खां की दावेदारी कांग्रेस के दूसरे संभावित नेताओं की तुलना में मजबूत दिखाई देती है।

कैंट को लेकर कांग्रेस की रणनीति बदल सकती है

इमरान मसूद को प्रदेश कांग्रेस में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने के बाद कांग्रेस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने पुराने राजनीतिक आधार को दोबारा मजबूत करने की कोशिश कर सकती है। ऐसे में वह उन सीटों पर अधिक जोर दे सकती है जहां उसके पास मजबूत उम्मीदवार और चुनाव लड़ने का पुराना आधार मौजूद है। बरेली कैंट सीट भी इसी रणनीति का हिस्सा बन सकती है। शहर विधानसभा सीट पर लंबे समय से भाजपा का प्रभाव रहा है। परिसीमन से पहले और बाद दोनों दौर में यहां भाजपा मजबूत रही है। मौजूदा समय में भी भाजपा विधायक और वन राज्यमंत्री अरुण कुमार सक्सेना की स्थिति मजबूत है। ऐसे में कांग्रेस के लिए शहर सीट पर सपा के मुकाबले खुद को बेहतर विकल्प के तौर पर पेश करना आसान नहीं होगा।
इसके उलट कैंट सीट पर कांग्रेस के पास वर्ष 2017 का चुनावी आधार और नवाब मुजाहिद हसन खां जैसा जाना-पहचाना चेहरा मौजूद है। यही वजह है कि कांग्रेस गठबंधन की बातचीत में कैंट सीट को अपने पक्ष में रखने की कोशिश करेगी।

‘मौका मिला तो कैंट जीतेंगे’

नवाब मुजाहिद हसन खां खुद भी कैंट सीट को लेकर पूरी तरह तैयार नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस कैंट विधानसभा सीट पर पूरी मजबूती से अपना दावा पेश करेगी। उन्होंने कहा कि उनकी चुनावी तैयारी पूरी है और अगर पार्टी हाईकमान उन्हें मौका देता है तो वह पूरी मजबूती के साथ चुनाव लड़ेंगे और कैंट सीट जीतेंगे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और सपा मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो गठबंधन को इसका फायदा मिलेगा और प्रदेश में सरकार बनाने की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया जा सकेगा।

अब सपा के दावेदारों की नजर सीट बंटवारे पर

इमरान मसूद की नई जिम्मेदारी के बाद बरेली की कैंट विधानसभा सीट पर राजनीतिक तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। एक तरफ सपा के कई नेता लंबे समय से टिकट की तैयारी में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस पुराने गठबंधन के आधार और नवाब मुजाहिद हसन खां के चेहरे के सहारे कैंट सीट पर अपना दावा मजबूत करने की तैयारी में है।
ऐसे में आने वाले महीनों में सपा और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे की बातचीत बरेली की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगी। अगर कैंट सीट कांग्रेस के खाते में जाती है तो सपा के कई दावेदारों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी। वहीं अगर सीट सपा के हिस्से में रहती है तो टिकट की दौड़ और भी दिलचस्प हो सकती है। फिलहाल इमरान मसूद की ताजपोशी ने बरेली कैंट को 2027 की सियासत का एक अहम केंद्र जरूर बना दिया है।

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