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बरेली कैंट विधानसभा सीट : भाजपा को हराने के लिए सपा को चाहिए भगवा दल के वोटों में सेंध लगाने वाला चेहरा, 2022 में संजीव अग्रवाल को मिले 98,931 वोट, बाकी 14 प्रत्याशियों के कुल वोट भी उनसे कम रहे, कैंट सीट के इतिहास में पहली बार हुआ था ऐसा, सिर्फ राजेश अग्रवाल और डॉ. अनीस बेग ही दे सकते हैं भाजपा को टक्कर, जानिये क्या है वजह?

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नीरज सिसौदिया, बरेली

बरेली कैंट विधानसभा सीट पर आगामी चुनाव की तैयारी के बीच समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल उम्मीदवार के चयन का है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव के नतीजे बताते हैं कि भाजपा के संजीव अग्रवाल ने न केवल समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी सुप्रिया ऐरन को हराया था, बल्कि बाकी सभी प्रत्याशियों को मिले वोटों का कुल योग भी उनके मतों से कम रहा था।
बरेली कैंट विधानसभा सीट के चुनावी इतिहास में ऐसा संभवत: पहली बार हुआ था जब भाजपा उम्मीदवार को इतने वोट मिले जितने बाकी सभी उम्मीदवार और नोटा मिलकर भी हासिल नहीं कर पाए।
उस चुनाव में भाजपा के संजीव अग्रवाल को 98,931 वोट मिले थे, जबकि सपा की सुप्रिया ऐरन 88,163 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रही थीं। बहुजन समाज पार्टी के अनिल कुमार को 3,370 और कांग्रेस के मोहम्मद इस्लाम अंसारी को 2,280 वोट मिले थे। संजीव अग्रवाल ने 10,768 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। इस तरह वर्ष 2022 के चुनाव परिणाम भाजपा की बढ़त की तस्वीर साफ करते हैं। संजीव अग्रवाल को 98,931 वोट मिले थे, जबकि सपा की सुप्रिया ऐरन समेत भाजपा को छोड़कर मैदान में उतरे बाकी 14 उम्मीदवारों को कुल 96,550 वोट मिले। यानी सभी विपक्षी और अन्य उम्मीदवारों के वोट जोड़ने के बाद भी भाजपा प्रत्याशी 2,381 वोट आगे रहे। वहीं नोटा को लगभग साढ़े छह सौ वोट मिले थे। अगर इन वोटों को भी विपक्ष और अन्य उम्मीदवारों को मिले वोटों में जोड़ दिया जाए तो भी संजीव अग्रवाल को मिले वोटों की बराबरी नहीं की जा सकती। यह आंकड़ा बताता है कि कैंट सीट पर संजीव अग्रवाल और भाजपा का चुनावी आधार कितना मजबूत था जो वर्तमान में और भी ज्यादा मजबूत हो चुका है।
इन आंकड़ों के आधार पर कैंट सीट के चुनावी समीकरणों को लेकर एक अहम सवाल खड़ा होता है। क्या समाजवादी पार्टी केवल अपने पारंपरिक समर्थकों के सहारे भाजपा को चुनौती दे पाएगी या उसे ऐसे उम्मीदवार की जरूरत होगी, जो भाजपा के समर्थक मतदाताओं के बीच भी अपनी जगह बना सके? स्थानीय राजनीतिक चर्चा में राजेश अग्रवाल और डॉ. अनीस बेग के नाम इसी संदर्भ में सामने आते हैं। दोनों की राजनीतिक सक्रियता और जनसंपर्क के तरीके अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों के समर्थक अपनी-अपनी संभावनाओं को लेकर दावे करते हैं।
2022 के परिणाम भाजपा के मजबूत चुनावी आधार और विपक्ष के सामने मौजूद चुनौती को रेखांकित करता है। हालांकि, अलग-अलग प्रत्याशियों को मिले वोटों को जोड़कर यह मान लेना सही नहीं होगा कि चुनाव में वे सभी मत किसी एक विपक्षी उम्मीदवार को मिल जाते। मतदाताओं की पसंद प्रत्याशी, पार्टी, स्थानीय मुद्दों और चुनावी परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है।
बसपा का प्रदर्शन भी इस चुनाव में कमजोर रहा था। पार्टी के प्रत्याशी अनिल कुमार को केवल 3,370 वोट मिले, जो भाजपा के मुकाबले बहुत कम थे। इससे कैंट सीट पर बसपा की सीमित चुनावी हिस्सेदारी का संकेत मिलता है। लेकिन केवल एक चुनाव के परिणाम के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि बसपा का कोई वोट बैंक बचा ही नहीं है, उचित नहीं होगा। आगामी चुनाव में पार्टी की स्थिति का आकलन उसके संगठन, उम्मीदवार और मतदाताओं की प्रतिक्रिया के आधार पर ही किया जा सकेगा।

कैंट सीट पर समाजवादी पार्टी के लिए उम्मीदवार का चयन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2022 में सुप्रिया ऐरन भाजपा के मुकाबले 10,768 वोट पीछे रह गई थीं। ऐसे में पार्टी के सामने अपना पिछला प्रदर्शन सुधारने के साथ-साथ उन मतदाताओं तक पहुंचने की चुनौती होगी, जिन्होंने पिछले चुनाव में भाजपा का समर्थन किया था।
स्थानीय राजनीतिक आकलन में ऐसे चेहरे की जरूरत बताई जा रही है, जो केवल पार्टी के परंपरागत समर्थकों के बीच ही नहीं, बल्कि दूसरे वर्गों और भाजपा समर्थक मतदाताओं के बीच भी स्वीकार्यता रखता हो। इसी कसौटी पर राजेश अग्रवाल और डॉ. अनीस बेग की सक्रियता की चर्चा की जा रही है।

राजेश अग्रवाल

राजेश अग्रवाल के पक्ष में नगर निगम चुनाव का तर्क

राजेश अग्रवाल शहर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के पूर्व विधानसभा प्रत्याशी रह चुके हैं और कैंट सीट से टिकट के दावेदार माने जाते हैं। उनके समर्थक नगर निगम चुनाव में उनके प्रदर्शन को उनकी स्थानीय राजनीतिक पकड़ का उदाहरण बताते हैं। वह भाजपा विधायक के बूथ पर भी जीत हासिल करने में सफल रहे थे।
इस दावे को राजेश अग्रवाल की राजनीतिक सक्रियता और स्थानीय संपर्क के संदर्भ में देखा जा रहा है। बूथवार चुनावी आंकड़े इस प्रदर्शन की पुष्टि करते हैं, इसलिए यह उनके पक्ष में एक महत्वपूर्ण स्थानीय तथ्य हो सकता है। पिछले तीन दशक से चुनावी राजनीति में सक्रिय राजेश अग्रवाल के सामने चुनौती यह होगी कि वह अपनी स्थानीय पहचान को विधानसभा चुनाव के व्यापक दायरे में किस तरह ले जाते हैं। नगर निगम चुनाव और विधानसभा चुनाव का क्षेत्र, मुद्दे तथा मतदाताओं का व्यवहार अलग हो सकता है। इसलिए उनके पिछले प्रदर्शन को संभावित राजनीतिक ताकत के एक संकेतक के रूप में देखा जा सकता है, अंतिम निष्कर्ष के रूप में नहीं। लेकिन राजेश अग्रवाल ने पिछले कुछ समय में जिस तरह से आरएसएस और भाजपा कार्यकर्ताओं में अपनी पैठ बनाई है उससे उनकी संभावनाएं काफी प्रबल नजर आती हैं।

डॉ. अनीस बेग

डॉ. अनीस बेग ने भाजपा के प्रभाव वाले इलाकों में बढ़ाया संपर्क

डॉ. अनीस बेग का नाम भी कैंट सीट पर सपा की संभावित दावेदारी के संदर्भ में चर्चा में है। उनके समर्थकों के अनुसार, उन्होंने सुभाष नगर, मढ़ीनाथ, गंगापुर और कालीबाड़ी जैसे इलाकों में जनसंपर्क बढ़ाया है। इन क्षेत्रों में गरीब परिवारों के बीच उनकी सक्रियता और लोगों से व्यक्तिगत संपर्क को उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बताया जाता है।
डॉ. अनीस बेग बाल रोग विशेषज्ञ हैं और मैक्स तथा फहमी आईवीएफ से जुड़े हैं। उनके समर्थकों का मानना है कि चिकित्सा क्षेत्र में उनकी पहचान और स्थानीय स्तर पर लोगों से संपर्क, गरीब तबके की मदद, जलभराव प्रभावितों की मदद जैसे जनसेवा के कई कार्य उन्हें चुनावी राजनीति में मदद कर सकते हैं। हालांकि, इन इलाकों में उनके संपर्क का वास्तविक चुनावी प्रभाव कितना होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है। इसे समझने के लिए स्थानीय जनसमर्थन, बूथवार आंकड़ों और मतदाताओं की प्रतिक्रिया का आकलन करना होगा।

संजीव अग्रवाल, कैंट विधायक

संजीव अग्रवाल की मौजूदा स्थिति भी अहम

दूसरी ओर, भाजपा विधायक संजीव अग्रवाल के पास मौजूदा विधायक होने का अनुभव है। वर्ष 2022 में वह पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े थे और जीत हासिल की थी। उन्हें 98,931 वोट मिले थे, जो कुल पड़े मतों का लगभग आधे से भी अधिक था। विधायक के रूप में उनका पांच साल का कार्यकाल आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण कारक होगा। क्षेत्र में उनके कामकाज, स्थानीय समस्याओं के समाधान, मतदाताओं से संपर्क और सरकार के प्रति लोगों की धारणा का असर चुनावी परिणाम पर पड़ सकता है।

कैंट सीट का अगला चुनाव इसलिए दिलचस्प हो सकता है कि यहां मुकाबला केवल सपा और भाजपा के बीच वोटों के अंतर का नहीं, बल्कि उम्मीदवारों की सामाजिक स्वीकार्यता और स्थानीय संपर्क का भी होगा। समाजवादी पार्टी के लिए राजेश अग्रवाल और डॉ. अनीस बेग जैसे नामों पर विचार करते समय यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कौन पार्टी के समर्थक आधार को बनाए रखते हुए व्यापक मतदाता समूहों तक पहुंच बना पाता है। वहीं, भाजपा के लिए संजीव अग्रवाल को अपने पिछले प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती होगी। अंतिम तस्वीर उम्मीदवारों की घोषणा, चुनावी मुद्दों और मतदाताओं के रुख के साथ ही स्पष्ट होगी।

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