नीरज सिसौदिया, बरेली
जिले की आंवला और बिथरी चैनपुर विधानसभा सीटों पर इस समय दो राजनीतिक परिवारों की अगली पीढ़ी की संभावित चुनावी एंट्री चर्चा का विषय बनी हुई है। आंवला में समाजवादी पार्टी के पूर्व राज्यसभा सांसद और करीब ढाई दशक तक बरेली के जिलाध्यक्ष रहे वीरपाल सिंह यादव के बेटे डॉ. देवेंद्र यादव की दावेदारी सामने है, तो बिथरी चैनपुर में पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप की बेटी कीर्ति कश्यप के नाम की चर्चा है। दोनों नए चेहरों के सामने राजनीतिक विरासत का लाभ लेने की चुनौती है, लेकिन दोनों सीटों के समीकरण एक जैसे नहीं हैं। आंवला में डॉ. देवेंद्र के लिए पारिवारिक और संगठनात्मक समर्थन की संभावनाएं दिखाई देती हैं, जबकि बिथरी में कीर्ति के सामने पार्टी के भीतर और बाहर कई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
आंवला में डॉ. देवेंद्र यादव की संभावित दावेदारी के पक्ष में सबसे बड़ा आधार उनके पिता वीरपाल सिंह यादव का लंबा राजनीतिक अनुभव है। बरेली की समाजवादी राजनीति में वीरपाल सिंह यादव की अपनी पहचान रही है। संगठन में उनकी पकड़ और पुराने कार्यकर्ताओं से उनके संबंध डॉ. देवेंद्र के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं।

इसके अलावा, मौजूदा भाजपा विधायक धर्मपाल सिंह के राज्यसभा जाने से विधानसभा सीट पर संभावित बदलाव की चर्चा भी राजनीतिक गतिविधियों को नई दिशा दे रही है। हालांकि, टिकट का अंतिम फैसला समाजवादी पार्टी का नेतृत्व करेगा और चुनावी मुकाबले की तस्वीर उम्मीदवारों की घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी।
जीराज यादव की नाराजगी कितनी बड़ी चुनौती?
डॉ. देवेंद्र यादव के सामने परिवार के भीतर से विरोध की आशंका की चर्चा जरूर है, लेकिन फिलहाल इसे उनकी दावेदारी के लिए बड़ी बाधा मानना जल्दबाजी होगी। उनके बहनोई डॉ. जीराज यादव ने कथित तौर पर नाराजगी जताई है। हालांकि, इस नाराजगी को दूर किए जाने की संभावना भी है। फिर भी, किसी रिश्तेदार की नाराजगी अपने आप में चुनावी नुकसान की गारंटी नहीं होती। उसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित व्यक्ति का क्षेत्र में कितना जनाधार है और वह अपने समर्थकों को किस दिशा में ले जा पाता है।

दरअसल, एक दौर था जब जीराज यादव मझगवां के ब्लॉक प्रमुख बने थे तो तत्कालीन सपा जिला अध्यक्ष वीरपाल सिंह यादव के रहमोकरम पर ही बन पाए थे। अब अगर जीराज यादव उन्हीं वीरपाल सिंह के पुत्र और अपने साले देवेंद्र यादव का विरोध करते हैं तो समाज में सीधा संदेश जाएगा कि जीराज यादव जब अपने रिश्तेदारों के नहीं हुए तो आम जनता के क्या होंगे?

डॉ. जीराज यादव का विधानसभा का चुनावी प्रदर्शन भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने आंवला सीट से पंडित राधा कृष्ण शर्मा को उम्मीदवार बनाया था। उस समय जीराज यादव निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे थे और उन्हें 5,382 वोट मिले थे। भाजपा के धर्मपाल सिंह को 88,956 वोट मिले थे, जबकि सपा प्रत्याशी आरके शर्मा को 70,532 वोट हासिल हुए थे। धर्मपाल सिंह ने 18,424 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी।

इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि 2022 में जीराज यादव का व्यक्तिगत चुनावी प्रदर्शन मुख्य मुकाबले के मुकाबले सीमित रहा था। उनके सभी वोट सपा के खाते में चले जाते, तब भी उस चुनाव में भाजपा और सपा के बीच जीत-हार का अंतर समाप्त नहीं होता।
अगर जीराज यादव डॉ. देवेंद्र के समर्थन में आते हैं तो परिवार के भीतर एकजुटता का संदेश जाएगा। इसके विपरीत, यदि वह विरोध का रास्ता चुनते हैं तो उन्हें अपनी राजनीतिक उपयोगिता साबित करनी होगी। निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला उनके लिए जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि उन्हें न केवल मतदाताओं का समर्थन जुटाना होगा, बल्कि यह भी दिखाना होगा कि उनका प्रभाव पिछले चुनाव की तुलना में बढ़ा है। दूसरी ओर, वीरपाल सिंह यादव के पुराने संगठनात्मक संबंध डॉ. देवेंद्र के लिए सहारा बन सकते हैं।
डॉ. देवेंद्र के पक्ष में एक और संभावित पहलू उनके परिवार के राजनीतिक रिश्ते हैं। पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव उनके ससुर हैं। ऐसे में उनके समर्थन की संभावना को भी उनकी दावेदारी के संदर्भ में देखा जा रहा है। यदि परिवार के वरिष्ठ नेता एक मंच पर आते हैं तो डॉ. देवेंद्र को संगठन और स्थानीय संपर्कों के स्तर पर लाभ मिल सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक असर टिकट मिलने और चुनावी अभियान शुरू होने के बाद ही सामने आएगा।

कीर्ति को अपनों और परायों दोनों से खतरा
आंवला के मुकाबले बिथरी चैनपुर की राजनीतिक तस्वीर अधिक जटिल दिखाई देती है। यहां कीर्ति कश्यप के नाम की चर्चा के साथ ही कई दूसरे नेताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। आंवला के सांसद नीरज मौर्य, समाजवादी पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष शिवचरन कश्यप और टिकट के दावेदारों में शामिल नरेश सोलंकी तथा आदेश यादव गुड्डू जैसे नेताओं के राजनीतिक हित इस सीट के समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं। इन नेताओं की ओर से कीर्ति का विरोध होगा या नहीं, यह अभी तय नहीं है, लेकिन टिकट की दौड़ में उनकी मौजूदगी मुकाबले को आसान नहीं रहने देती। जानकारों का मानना है कि नीरज मौर्य को अगर अपनी लोकसभा सीट को बचाना है तो कीर्ति कश्यप का हारना बेहद जरूरी हो जाता है। ऐसा नहीं हुआ तो आगामी लोकसभा चुनाव में आंवला संसदीय सीट से कीर्ति कश्यप के पिता धर्मेंद्र कश्यप इस सीट से सपा के उम्मीदवार होंगे।

वहीं, पूर्व सांसद और भाजपा नेता कुंवर सर्वराज सिंह और पूर्व विधायक राजेश मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल जैसे नेताओं की भूमिका पर भी नजर रहेगी। इन नेताओं के रुख का चुनावी प्रभाव उनकी वास्तविक सक्रियता, स्थानीय समर्थकों और पार्टी के साथ उनके संबंधों पर निर्भर करेगा। फिलहाल यह कहना कि वे किसी उम्मीदवार को हराने के लिए पूरी ताकत लगाएंगे, ठोस राजनीतिक घटनाक्रम के बिना अनुमान ही होगा। लेकिन इसकी प्रबल संभावनाएं हैं।
कीर्ति कश्यप के सामने एक अन्य चुनौती मौजूदा विधायक डॉ. राघवेंद्र शर्मा की स्थानीय पहचान है। बिथरी चैनपुर से भाजपा विधायक डॉ. राघवेंद्र शर्मा की छवि को लेकर समर्थकों और विरोधियों के बीच अलग-अलग राय हो सकती है, लेकिन किसी भी नए उम्मीदवार के लिए मौजूदा विधायक के जनसंपर्क, संगठन और क्षेत्र में किए गए कामों का सामना करना स्वाभाविक चुनौती है। यदि कीर्ति समाजवादी पार्टी से मैदान में उतरती हैं, तो उन्हें केवल अपने पिता की राजनीतिक विरासत के आधार पर नहीं, बल्कि स्थानीय मुद्दों और मतदाताओं से सीधे संवाद के जरिए भी अपनी जगह बनानी होगी।




