नीरज सिसौदिया, बरेली
उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की आठ सीटों के लिए हुए चुनाव में समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीतकर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाई, लेकिन बरेली-मुरादाबाद खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में सपा प्रत्याशी मोहम्मद दानिश अख्तर की करारी हार ने बरेली संगठन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस चुनाव में पार्टी की हार की वजह सिर्फ भाजपा प्रत्याशी की मजबूती या मतदाताओं का रुख नहीं रहा, बल्कि संगठन के भीतर तालमेल की कमी, बड़े नेताओं की उदासीनता और चुनावी तैयारियों में लापरवाही भी प्रमुख कारण बनकर सामने आई है। हैरानी की बात यह रही कि जिन नेताओं के कंधों पर जिले में पार्टी को मजबूत करने की जिम्मेदारी है, उनमें से कई मतदान से लेकर मतगणना तक कहीं नजर नहीं आए।
आंवला सांसद नीरज मौर्य, बहेड़ी विधायक अता उर रहमान और भोजीपुरा विधायक शहजिल इस्लाम जैसे बड़े नेताओं ने इस चुनाव को अपेक्षित गंभीरता नहीं दी। इनमें से कोई भी मतदान के दिन प्रमुख मतदान केंद्रों पर पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाने नहीं पहुंचा। मतगणना के दौरान भी इन नेताओं की गैरमौजूदगी चर्चा का विषय बनी रही। हाल ही में जिला महासचिव बनाए गए राजकुमार पाल भी पूरे चुनाव के दौरान सक्रिय नजर नहीं आए। शहजिल इस्लाम की ओर से एक बैठक जरूर आयोजित की गई, लेकिन उसके बाद चुनावी अभियान में उनकी कोई खास सक्रियता दिखाई नहीं दी। इसके उलट दूसरे जिलों के सांसद और विधायक बरेली पहुंचकर अपने प्रत्याशियों और संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ खड़े दिखाई दिए।
महानगर के पदाधिकारियों ने संभाली चुनाव की कमान
इस पूरे चुनाव में बरेली महानगर के समाजवादी नेताओं और पदाधिकारियों की भूमिका सबसे ज्यादा सक्रिय रही। महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी के नेतृत्व में महानगर महासचिव पंडित दीपक शर्मा, महानगर उपाध्यक्ष राजेश अग्रवाल, शहर विधानसभा अध्यक्ष क्षेत्र हसीब खान, कैंट विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष हरिओम प्रजापति, जोन प्रभारी शम्यून खान, हुरिया रहमान, महिला सभा अध्यक्ष स्मिता यादव और पार्षद दल के नेता गौरव सक्सेना समेत कई पदाधिकारी लगातार मैदान में डटे रहे। इन नेताओं ने शिक्षकों से संपर्क करने, मतदाता सूची में नाम जुड़वाने और मतदान के दिन संगठन के कार्यकर्ताओं को सक्रिय रखने की कोशिश की।

तिलक इंटर कॉलेज मतदान केंद्र पर हसीब खान ने मोर्चा संभाला। वह मतदान की व्यवस्था और पार्टी के पोलिंग एजेंटों के साथ लगातार संपर्क में रहे। उन्होंने कुछ मतगणना एजेंट भी बनाए। कुछ देर के लिए पूर्व महापौर सुप्रिया ऐरन भी वहां पहुंचीं। वहीं, राजेश अग्रवाल ने चुनाव को ध्यान में रखते हुए पांच सितंबर से पांच अक्टूबर तक शिक्षक सम्मान माह चलाया। इस दौरान उन्होंने शहर के विभिन्न विद्यालयों में जाकर शिक्षकों को शॉल और प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया। उनका प्रयास शिक्षकों के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ाने और उन्हें संगठन से जोड़ने का था। दूसरी ओर, हसीब खान ने पोलिंग एजेंट और काउंटिंग एजेंट बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
डेढ़ हजार से अधिक फॉर्म भरवाए, लेकिन वोटर ही नहीं बन सके शिक्षक
चुनाव की तैयारियों में सबसे बड़ी लापरवाही मतदाता सूची तैयार कराने के स्तर पर सामने आई। पार्टी से जुड़े सूत्रों का दावा है कि महानगर के एक विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष ने करीब डेढ़ हजार से अधिक शिक्षकों के मतदाता पंजीकरण फॉर्म भरवाकर दिए थे, लेकिन उन पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई। नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में शिक्षक मतदाता सूची में शामिल ही नहीं हो सके। करीब 250 फॉर्म पार्टी कार्यालय में प्रधानाचार्य के हस्ताक्षरों के इंतजार में पड़े रहे। अगर इन फॉर्मों को समय रहते पूरा कराकर जमा कराया जाता तो पार्टी के पास अतिरिक्त शिक्षक मतदाताओं का समर्थन हासिल करने का अवसर हो सकता था।

सूत्र बताते हैं कि राजेश अग्रवाल की ओर से शिक्षक सम्मान माह के दौरान जिन शिक्षकों से संपर्क किया गया, उनमें से भी कई के वोट नहीं बन पाए। यह स्थिति बताती है कि पार्टी के कुछ नेता और कार्यकर्ता जमीन पर मेहनत तो कर रहे थे, लेकिन संगठन के दूसरे स्तर पर उस मेहनत को चुनावी परिणाम में बदलने की व्यवस्था नहीं बन सकी। शिक्षक एमएलसी चुनाव में मतदाता सूची ही सबसे महत्वपूर्ण आधार होती है। ऐसे में समय रहते अधिक से अधिक शिक्षकों का पंजीकरण नहीं करा पाना सपा के लिए बड़ा नुकसान साबित हुआ।
फरीदपुर में चंद्रसेन सागर ने दिखाई सक्रियता
जिले में फरीदपुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत पड़ते भुता ब्लॉक के पूर्व ब्लॉक प्रमुख चंद्रसेन सागर की सक्रियता भी चर्चा में रही। उन्होंने शिक्षकों से संपर्क करने के साथ मतदान के दिन कुआंडाडा और भुता ब्लॉक के मतदान केंद्रों पर मतदाता सूची में गड़बड़ी पकड़ी।


उन्होंने डबल वोट पड़ने की आशंका सामने आने पर हस्तक्षेप किया और निर्वाचन अधिकारी को लिखित शिकायत भी दी। इससे मतदान प्रक्रिया में पार्टी की ओर से निगरानी की भूमिका सामने आई।
इसके विपरीत, चुनाव के अंतिम चरण में संगठन की तैयारियों को लेकर गंभीर सवाल उठे। सूत्रों का दावा है कि मतगणना से एक दिन पहले रात करीब 11 बजे तक चुनाव प्रभारी संजीव सक्सेना काउंटिंग एजेंटों की व्यवस्था पूरी नहीं कर पाए थे। इसके बाद उनके लखनऊ चले जाने की बात भी सामने आई। मतगणना जैसे महत्वपूर्ण चरण में एजेंटों की समय पर नियुक्ति नहीं होना संगठनात्मक तैयारी पर सवाल खड़े करता है।
हाईकमान तक पहुंची शिकायतें, होगी हार की समीक्षा
दानिश अख्तर को उम्मीदवार बनाकर समाजवादी पार्टी ने शिक्षक राजनीति में अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश की थी, लेकिन चुनाव परिणाम ने संगठन की तैयारियों की कमजोरियां उजागर कर दीं। पार्टी के भीतर चर्चा है कि हाईकमान जिले के सांसद, विधायकों और पदाधिकारियों की भूमिका से नाराज है। एमएलसी चुनाव में हार के कारणों की समीक्षा के लिए बैठक बुलाए जाने की तैयारी है। इसमें चुनाव के दौरान सक्रियता, मतदाता पंजीकरण, पोलिंग एजेंटों की नियुक्ति और मतगणना की व्यवस्था जैसे मुद्दों पर जवाब मांगा जा सकता है।
इस हार का असर आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर भी पड़ सकता है। बरेली जिले में समाजवादी पार्टी पहले ही कई सीटों पर मजबूत संगठन खड़ा करने की चुनौती से जूझ रही है। ऐसे में अगर चुनाव के समय बड़े नेता जिम्मेदारी से दूरी बनाए रखते हैं और सक्रिय कार्यकर्ताओं की मेहनत को संगठनात्मक सहयोग नहीं मिलता है तो पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दानिश अख्तर की हार ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बरेली में सपा के बड़े नेता सिर्फ पदों तक सीमित रह गए हैं या फिर चुनावी मैदान में भी अपनी जिम्मेदारी निभाने को तैयार हैं।




