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बरेली कैंट में खिचड़ी पॉलिटिक्स: 2027 से पहले सपा के दो चेहरों की शांत लेकिन गहरी सियासी चाल, एक हैं अनीस बेग तो दूसरे राजेश अग्रवाल, भाजपा की हिन्दू पॉलिटिक्स का जवाब तो नहीं?

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नीरज सिसौदिया, बरेली
नया साल, मकर संक्रांति और खिचड़ी- उत्तर भारत की राजनीति में यह सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संदेश देने का माध्यम भी बन चुकी है। बरेली कैंट विधानसभा सीट पर इस बार मकर संक्रांति के मौके पर खिचड़ी भोज की चर्चा सामान्य धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन तक सीमित नहीं रही। इसके पीछे 2027 की शुरुआत में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की आहट साफ सुनाई दे रही है।


बरेली कैंट सीट पर इस “खिचड़ी पॉलिटिक्स” के केंद्र में दो नाम उभरकर सामने आए हैं- डॉ. अनीस बेग और समाजवादी पार्टी के पूर्व विधानसभा प्रत्याशी राजेश अग्रवाल। एक मुसलमान हैं, दूसरा हिंदू, लेकिन दोनों ही समाजवादी पार्टी के टिकट के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। खास बात यह है कि दोनों नेताओं ने अपनी-अपनी शैली में खिचड़ी भोज के जरिए न सिर्फ जनता से संपर्क साधा, बल्कि अपने राजनीतिक इरादों का भी संकेत दिया।
मकर संक्रांति के मौके पर खिचड़ी भोज का आयोजन कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार बरेली कैंट में यह आयोजन खास तौर पर राजनीतिक मायनों में देखा जा रहा है। वजह साफ है- 2027 के चुनाव भले अभी दूर लगते हों, लेकिन टिकट की लड़ाई और जमीनी पकड़ मजबूत करने की कवायद अभी से शुरू हो चुकी है।


डॉ. अनीस बेग और राजेश अग्रवाल, दोनों ने अलग-अलग तरीके से खिचड़ी भोज का सहारा लिया। यह आयोजन सीधे तौर पर चुनाव प्रचार नहीं था, लेकिन संदेश साफ था—“हम मैदान में हैं और जनता के बीच हैं।”
डॉ. अनीस बेग ने खिचड़ी भोज को सिर्फ एक सामूहिक आयोजन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने आम जनता के बीच खिचड़ी बांटने के साथ-साथ बूथ स्तर पर भी खास ध्यान दिया। पुराना शहर क्षेत्र के बूथों पर खिचड़ी भोज का आयोजन कर उन्होंने कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों से सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश की।
डॉ. अनीस बेग का यह कदम सिर्फ संगठनात्मक मजबूती का संकेत नहीं था, बल्कि इसका एक सामाजिक संदेश भी था। पुराना शहर, जहां मिश्रित आबादी रहती है, वहां खिचड़ी भोज के जरिए उन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेश देने की कोशिश की। यह संदेश खास तौर पर उस समय महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब राज्य की राजनीति में धर्म आधारित ध्रुवीकरण की चर्चा आम है।
उनके समर्थकों का कहना है कि डॉ. अनीस बेग लगातार जमीनी स्तर पर सक्रिय रहे हैं और सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए लोगों से जुड़े रहते हैं। खिचड़ी भोज उसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के पूर्व विधानसभा प्रत्याशी और वरिष्ठ पार्षद राजेश अग्रवाल ने भी मकर संक्रांति के मौके पर खिचड़ी भोज का आयोजन किया। इसके अलावा वे कई अन्य कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। राजेश अग्रवाल की राजनीति का अंदाज़ हमेशा से अपेक्षाकृत संयमित और कम दिखावे वाला रहा है।
राजेश अग्रवाल को बरेली कैंट की राजनीति में एक अनुभवी चेहरा माना जाता है। वे सामाजिक और वैचारिक राजनीति पर ज्यादा जोर देते आए हैं। हालांकि, बदलते समय के साथ उन्होंने भी अपनी रणनीति में कुछ बदलाव किए हैं। सोशल मीडिया के इस दौर में उन्होंने वैचारिक राजनीति के प्रचार को भी अपनी सियासत का अहम हिस्सा बना लिया है।


उनके समर्थकों का मानना है कि राजेश अग्रवाल जमीन पर काम करने वाले नेता हैं और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता अनुभव और भरोसे पर आधारित है। खिचड़ी भोज उनके लिए भी जनता से जुड़ने का एक माध्यम बना, लेकिन उनका फोकस ज्यादा व्यापक सामाजिक संपर्क पर दिखा।
बरेली कैंट में इस खिचड़ी पॉलिटिक्स के कई मायने निकाले जा रहे हैं। एक नजरिए से इसे जमीनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। मकर संक्रांति जैसे पर्व पर आयोजन कर नेता आम लोगों तक आसानी से पहुंच बना लेते हैं, बिना सीधे चुनावी प्रचार के आरोप के।
दूसरा अहम पहलू यह है कि इसे भारतीय जनता पार्टी की हिंदू राजनीति के जवाब के तौर पर भी देखा जा रहा है। समाजवादी पार्टी लंबे समय से सामाजिक समरसता और साझा संस्कृति की राजनीति का दावा करती रही है। ऐसे में हिंदू-मुस्लिम दोनों चेहरों का खिचड़ी जैसे सांस्कृतिक आयोजन के जरिए सामने आना, एक संतुलित राजनीतिक संदेश देता है। खिचड़ी, जो खुद कई चीजों के मेल से बनती है, इस राजनीति का प्रतीक भी मानी जा रही है—सामाजिक विविधता और एकता का प्रतीक।
डॉ. अनीस बेग और राजेश अग्रवाल—दोनों ही समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। यही वजह है कि उनकी राजनीतिक गतिविधियों को सिर्फ चुनावी चश्मे से नहीं देखा जा रहा। दोनों नेताओं की पहचान समाजसेवक के तौर पर भी रही है, जिसने उन्हें जनता के बीच एक अलग भरोसा दिलाया है।


डॉ. अनीस बेग चिकित्सा और सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे हैं, जबकि राजेश अग्रवाल लंबे समय से सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हैं। खिचड़ी भोज के आयोजन को उनके समर्थक इसी सामाजिक जुड़ाव का विस्तार मानते हैं। समाजवादी पार्टी के लिए बरेली कैंट सीट हमेशा से अहम रही है। यह सीट सामाजिक विविधता और राजनीतिक संतुलन की परीक्षा भी मानी जाती है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने यह चुनौती होगी कि वह किस तरह दोनों नेताओं के बीच संतुलन बनाता है।
एक ओर डॉ. अनीस बेग हैं, जो बूथ स्तर पर सक्रियता और साम्प्रदायिक सौहार्द के संदेश के साथ सामने आए हैं। दूसरी ओर राजेश अग्रवाल हैं, जिनके पास चुनावी अनुभव, संगठनात्मक समझ और वैचारिक राजनीति की मजबूत पकड़ है। पार्टी के लिए यह फैसला आसान नहीं होगा, क्योंकि दोनों ही अपने-अपने तरीके से पार्टी की रणनीति में फिट बैठते हैं। हालांकि अभी 2027 के चुनाव में समय है, लेकिन बरेली कैंट में खिचड़ी पॉलिटिक्स ने यह साफ कर दिया है कि सियासी तैयारी शुरू हो चुकी है। टिकट की दौड़ भले खुलकर सामने न आई हो, लेकिन ऐसे आयोजनों के जरिए नेता अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।
फिलहाल, यह कहना जल्दबाजी होगी कि किसका पलड़ा भारी है। इतना जरूर है कि डॉ. अनीस बेग और राजेश अग्रवाल—दोनों ने यह दिखा दिया है कि वे सिर्फ दावेदार नहीं, बल्कि सक्रिय खिलाड़ी हैं।


बरेली कैंट विधानसभा सीट पर मकर संक्रांति के मौके पर हुई खिचड़ी पॉलिटिक्स सिर्फ एक पर्व का आयोजन नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों की भूमिका है। डॉ. अनीस बेग और राजेश अग्रवाल—दो अलग पहचान, दो अलग रणनीतियां, लेकिन लक्ष्य एक ही। समाजवादी पार्टी के लिए यह दौर संकेतों को समझने और संतुलन साधने का है। आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि खिचड़ी की यह सियासत किस दिशा में जाती है और 2027 की तस्वीर में किसका रंग ज्यादा गहरा होगा।

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