नीरज सिसौदिया, बरेली
बरेली में समाजवादी पार्टी की राजनीति इन दिनों एक नई करवट लेती नजर आ रही है। लंबे समय से गुटबाजी और खेमेबंदी से जूझ रही पार्टी के भीतर अब एकजुटता के संकेत दिखाई देने लगे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह बने हैं सपा के महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी, जिन्होंने हाल ही में आयोजित रोजा इफ्तार पार्टी के जरिए यह साबित कर दिया कि वे सिर्फ नाम के ही नहीं, बल्कि नेतृत्व के भी असली “सुल्तान” हैं।

सपा कार्यालय पर आयोजित यह रोजा इफ्तार पार्टी महज एक धार्मिक या सामाजिक आयोजन नहीं रही, बल्कि यह पार्टी की ताकत और एकजुटता का बड़ा प्रदर्शन बन गई। इस आयोजन में पार्टी के छोटे-बड़े लगभग सभी नेता शामिल हुए। खास बात यह रही कि हरिशंकर यादव, पूर्व महानगर अध्यक्ष फहीम साबिर और योगेश यादव जैसे वे नेता भी इस कार्यक्रम में पहुंचे, जो आम तौर पर ऐसे आयोजनों से दूरी बनाए रखते हैं। इतना ही नहीं, कई ऐसे नेता भी एक ही मंच पर दिखाई दिए जिन्हें राजनीति में एक-दूसरे का धुर विरोधी माना जाता है।

इस इफ्तार पार्टी में बहेड़ी से विधायक अता उर रहमान, भोजीपुरा से विधायक शहजिल इस्लाम, उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी सुल्तान बेग, वरिष्ठ नेता राष्ट्रीय सचिव और पूर्व सांसद वीरपाल सिंह यादव, पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद प्रवीण सिंह ऐरन सहित पार्टी के कई बड़े चेहरे मौजूद रहे। इसके अलावा समाजवादी पार्टी के पहले महानगर अध्यक्ष प्रोफेसर जाहिद खां से लेकर आखिरी महानगर अध्यक्ष (मौजूदा अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी से पहले) कदीर अहमद तक इस आयोजन में नजर आए। एक ही मंच पर इतने दिग्गज नेताओं की मौजूदगी अपने आप में बड़ा संदेश दे रही थी।

दरअसल बरेली जिले में पिछले कुछ समय से समाजवादी पार्टी के अंदर गुटबाजी की चर्चा लगातार हो रही थी। खासकर जब शिवचरण कश्यप जिला अध्यक्ष थे, तब पार्टी कई खेमों में बंटी हुई दिखाई देती थी। किसी कार्यक्रम में एक नेता आता था तो दूसरा नेता उससे दूरी बना लेता था। कई बार तो हालात ऐसे हो जाते थे कि पार्टी के कार्यक्रमों में ही अलग-अलग गुट नजर आते थे। यही वजह मानी गई कि अंततः शिवचरण कश्यप को जिला अध्यक्ष पद से हटाया गया।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शिवचरण कश्यप के कार्यकाल में गुटबाजी सिर्फ जिले तक सीमित नहीं रही, बल्कि महानगर संगठन में भी इसकी आहट सुनाई देने लगी थी। लेकिन इसी दौरान महानगर अध्यक्ष के रूप में शमीम खां सुल्तानी ने स्थिति को संभालने की कोशिश शुरू कर दी थी। उन्होंने संगठन को जोड़ने और नेताओं के बीच संवाद बढ़ाने की रणनीति अपनाई।

इस दिशा में पहला बड़ा कदम तब दिखाई दिया जब मासिक बैठकों का आयोजन शुरू हुआ। शिवचरण कश्यप ने जब बतौर जिला अध्यक्ष अपनी आखिरी मासिक बैठक बुलाई थी, तब कई बड़े नेता और जिला कमेटी के पदाधिकारी उसमें शामिल नहीं हुए थे। लेकिन इसके विपरीत जब शमीम खां सुल्तानी ने महानगर स्तर पर मासिक बैठक आयोजित की तो लगभग सभी प्रमुख नेता उसमें पहुंचे। यहां तक कि वे पदाधिकारी भी शामिल हुए जो पहले बैठकों से दूरी बनाए रखते थे।
इसके बाद संगठनात्मक गतिविधियों में भी सुल्तानी की सक्रियता साफ दिखाई देने लगी। एसआईआर के मुद्दे पर भी उन्होंने महानगर स्तर पर ऐसी सक्रियता दिखाई जो जिले में कहीं और देखने को नहीं मिली। उन्होंने महानगर में बीएलए सम्मेलन आयोजित कराए, जिनमें बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों ने भाग लिया। इन सम्मेलनों ने संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।

हालांकि सुल्तानी के सामने असली चुनौती अभी बाकी थी। जरूरत थी ऐसे आयोजन की, जो पूरे जिले के नेताओं को एक मंच पर ला सके और यह संदेश दे सके कि समाजवादी पार्टी बरेली में फिर से एकजुट हो रही है। इसी सोच के साथ उन्होंने रोजा इफ्तार पार्टी का आयोजन करने का फैसला किया।
यह आयोजन उनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। बरेली जिले की नौ विधानसभा सीटों के नेताओं को इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया। शहर और कैंट विधानसभा सीट से टिकट के दावेदारों में डॉक्टर अनीस बेग, राजेश अग्रवाल, इंजीनियर अनीस अहमद खां और संजीव सक्सेना जैसे नेता शामिल हुए।

इसी तरह शहर विधानसभा सीट से टिकट के प्रमुख दावेदार हसीव खान, पंडित दीपक शर्मा और अन्य नेताओं ने भी इस आयोजन में भाग लिया। बहेड़ी से विधायक अता उर रहमान, भोजीपुरा से विधायक शहजिल इस्लाम और उनके धुर विरोधी सुल्तान बेग की मौजूदगी ने कार्यक्रम को और भी महत्वपूर्ण बना दिया।
मीरगंज विधानसभा सीट से टिकट के दावेदार पूर्व विधायक शराफतयार खां, पूर्व जिला उपाध्यक्ष मनोहर पटेल और अन्य नेता भी इस आयोजन में पहुंचे। बिथरी चैनपुर विधानसभा क्षेत्र से आदेश प्रताप गुड्डू, नरेश सिंह सोलंकी, पीयूष वर्मा और डॉक्टर देवेंद्र यादव ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। ये सभी बिथरी विधानसभा सीट से टिकट के प्रमुख दावेदार हैं। साथ ही एक-दूसरे के राजनीतिक विरोधी भी हैं।
आंवला विधानसभा सीट से वरिष्ठ नेता डॉक्टर जीराज सिंह यादव और बीडी वर्मा सहित कई दावेदार कार्यक्रम में शामिल हुए। फरीदपुर से विजयपाल सिंह, नवाबगंज से भगवत सरन गंगवार और पुरुषोत्तम गंगवार समेत जिले की लगभग सभी सीटों से जुड़े नेता इस इफ्तार पार्टी में दिखाई दिए। ये सभी अपनी-अपनी विधानसभा सीट से टिकट के प्रमुख दावेदार हैं।

एक ही मंच पर इतने नेताओं की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि शमीम खां सुल्तानी भले ही जिला अध्यक्ष न हों पर जिले के संगठन को भी एकजुट करने की दिशा में गंभीरता से काम कर रहे हैं। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि जिस तरह से उन्होंने धुर विरोधी नेताओं को भी एक मंच पर लाने में सफलता हासिल की है, वह आसान काम नहीं था।
दरअसल बरेली की राजनीति में कई ऐसे नेता हैं जिनके बीच लंबे समय से राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और मतभेद रहे हैं। ऐसे नेताओं को एक साथ बैठाना और एक ही मंच पर लाना अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। लेकिन सुल्तानी की पहल ने यह कर दिखाया।

इस आयोजन के बाद उन लोगों की भी बोलती बंद हो गई जो अक्सर यह कहते थे कि बरेली जिले में समाजवादी पार्टी को दोबारा एकजुट करना संभव नहीं है। इफ्तार पार्टी में जिस तरह से हर गुट के नेता एक साथ दिखाई दिए, उससे यह संदेश गया कि पार्टी के भीतर संवाद और सहयोग की नई शुरुआत हो रही है।
सपा कार्यकर्ताओं के बीच भी इस आयोजन को लेकर काफी उत्साह देखा गया। कई कार्यकर्ताओं का कहना है कि लंबे समय बाद ऐसा लगा कि पार्टी फिर से एक परिवार की तरह दिखाई दे रही है। उनका मानना है कि अगर इसी तरह संगठनात्मक गतिविधियां जारी रहीं तो आने वाले चुनावों में इसका सकारात्मक असर भी देखने को मिल सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुल्तानी का यह आयोजन सिर्फ एक इफ्तार पार्टी नहीं था, बल्कि यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी था। इसके जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि संगठन में सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने की क्षमता उनमें मौजूद है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बरेली में आयोजित यह रोजा इफ्तार पार्टी समाजवादी पार्टी के लिए सिर्फ एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि यह संगठन की एकता और ताकत का बड़ा प्रतीक बनकर सामने आई। और इस पूरी कहानी के केंद्र में रहे महानगर अध्यक्ष शमीम खां सुल्तानी, जिन्होंने अपने नेतृत्व और राजनीतिक सूझबूझ से यह दिखा दिया कि वे वाकई में नेतृत्व के सच्चे “सुल्तान” हैं।





